भीलवाड़ा, 15 जून (आ.प्र.) वर्तमान समय में जहां अधिकांश आयोजन भौतिक उपलब्धियों, सामाजिक प्रतिष्ठा और सांसारिक विषयों के इर्द-गिर्द केंद्रित होते जा रहे हैं, वहीं धर्म आराधना और जाप जैसे आध्यात्मिक उपक्रम मनुष्य को कर्मबंधन से मुक्त करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं. यह विचार श्रमणसंघीय युवाचार्य महेंद्र ऋषिजी म.सा. ने रविवार, 14 जून को यशकंवर चैरिटेबल ट्रस्ट, यश विहार द्वारा आयोजित नवकार महामंत्र जाप के अवसर पर व्यक्त किए. यह जानकारी सुनील चापलोत ने दी. जाप में उपस्थित श्रद्धालुओं, ट्रस्ट पदाधिकारीयों एवं आयोजन से जुड़े सभी श्रद्धालुओं की अनुमोदना करते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि, आज के युग में सफल आयोजनों की कोई कमी नहीं है, लेकिन अधिकांश आयोजन सांसारिक विषयों से जुड़े होते हैं. ऐसे कार्यक्रमों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सहभागिता मनुष्य के लिए कर्मबंधन का कारण बनती है. जीव केवल स्वयं कर्म नहीं करता, बल्कि करवाने और अनुमोदना करने के माध्यम से भी कर्मों का बंध करता है. मन, वचन और काया से होने वाली कृत, कारित और अनुमोदित प्रवृत्तियां जीव को कर्मों से जोड़ती हैं. यही कारण है कि सामाजिक, पारिवारिक और सामुदायिक गतिविधियों में भी अनजाने में कर्मों का संचय होता रहता है. कर्मबंधन केवल कार्य करने से नहीं, बल्कि उस कार्य के प्रति मन में उत्पन्न होने वाले अहंकार, आसक्ति और आत्मप्रशंसा से भी गहरा होता है. युवाचार्य ने कहा कि, संसार में रहते हुए सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों से पूर्णतः बचना संभव नहीं है. प्रत्येक व्यक्ति को विभिन्न अवसरों और आयोजनों में जाना पड़ता है, किंतु उन अवसरों पर बंधे कर्मों की निर्जरा के लिए धर्मसभा, स्वाध्याय, जाप और साधना का आश्रय लेना आवश्यक है. जब बड़ी संख्या में लोग धर्म आराधना के लिए एकत्रित होते हैं, तब वह केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि सामुदायिक कर्मनिर्जरा का एक महोत्सव बन जाता है. उन्होंने कहा, नवकार महामंत्र जाप भी उसी प्रकार का एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक उपक्रम है, जहां श्रद्धा, भक्ति और आत्मचिंतन के माध्यम से कर्मों का क्षय होता है. नवकार महामंत्र आत्मशुद्धि का एक गहन आध्यात्मिक विज्ञान है. व्यक्ति जितनी अधिक श्रद्धा, प्रसन्नता और एकाग्रता के साथ जाप करता है, उसे उतना ही अधिक कर्मनिर्जरा का लाभ प्राप्त होता है. इस अवसर पर हितमित भाषी हितेंद्र ऋषिजी, मेवाड़ गौरव रवींद्र मुनिजी, एवं उप प्रवर्तिनी दिव्यज्योतिजी, महासती सुचेताजी, साध्वी पियूषदर्शनाजी तथा राजस्थान प्रवर्तनी यशकंवरजी की सुशिष्याएं महासती ज्ञानकंवरजी, यशोदिप्ती मधुकंवरजी, मणिप्रभाजी, साध्वी पुष्पलताजी, साध्वी सुप्रभाजी सहित साधु-साध्वीवृंद ने नवकार महामंत्र जाप करवाया.
चातुर्मास स्वाध्याय, संयम व साधना का स्वर्णिम अवसर युवाचार्यश्री महेंद्र ऋषिजी ने कहा कि, शीघ्र ही चातुर्मास का पावन अवसर आने वाला है. चातुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्म परिष्कार, स्वाध्याय, संयम और साधना का विशेष कालखंड है. सभी धर्मप्रेमियों को चाहिए कि वे अधिकाधिक धर्म आराधना, प्रवचन श्रवण, जाप, स्वाध्याय और साधु-साध्वी के सान्निध्य का लाभ लेकर अपने जीवन को आध्यात्मिक ऊंचाइयों की ओर अग्रसर करें.