मनाेवैज्ञानिक ताे अहंकार काे विकसित करने की बात करते हैं. मैं ताे अहंकार काे शून्य करने की बात करता हूं. मनाेवैज्ञानिक निश्चित ही अहंकार काे विकसित करने की बात करेंगे. सभी मनाेवैज्ञानिक नहीं; बुद्ध नहीं करेंगे, कृष्ण नहीं करेंगे, महावीर नहीं करेंगे. फ्रायड करेगा, एरिक्सन करेगा.करेगा, उसका कारण है. क्याेंकि फ्रायड या एरिक्सन के लिए अहंकार से ऊपर काेई और सत्य नहीं है. ताे जाे आखिरी सत्य है, उसकाे विकसित किया जाना चाहिए. महावीर, बुद्ध या कृष्ण के लिए अहंकार आखिरी सत्य नहीं है, केवल बीच की सीढ़ी है. निरहंकार आखिरी सत्य है. अहंकार नहीं, ब्रह्म आखिरी सत्य है.अहंकार सिर्फ सीढ़ी है. इसलिए बुद्ध या महावीर या कृष्ण कहेंगे, अहंकार काे विकसित भी कराे और विसर्जित भी कराे.सीढ़ी पर चढ़ाे भी और सीढ़ी काे छाेड़ाे भी.
आओ भी उस पर, जाओ भी उस पर से.उठाे भी उस तक, पार भी हाे जाओ. चूंकि मन के पार भी सत्ता है, इसलिए मन का जाे आखिरी सत्य है-अहंकार-वह पार की सत्ता के लिए छाेडने का पहला कदम हाेगा.अगर मैं अपने घर से आपके घर में आना चाहूं ताे मेरे घर की आखिरी दीवार छाेड़ना ही आपके घर में प्रवेश का पहला कदम हाेगा. मन की आखिरी सीमा अहंकार है.अहंकार से ऊपर मन नहीं जा सकता.चूंकि पश्चिम का मनाेविज्ञान मन काे आखिरी सत्य समझ रहा है, इसलिए अहंकार के विकास की बात उचित है.उचित कह रहा हूं सत्य नहीं.
सीमा के भीतर बिलकुल ठीक है बात. लेकिन जिस दिन पश्चिम के मनस-शास्त्र काे एहसास हाेगा, और एहसास हाेना शुरू हाे गया है. जुंग के साथ दीवार टूटनी शुरू हाे गई है. और अनुभव हाेने लगा है किअहंकार के पार भी कुछ है.लेकिन अभी भी अहंकार के पार का जाे अनुभव हाे रहा है पश्चिम के मनाेविज्ञान काे, वह अहंकार के नीचे हाे रहा है-बिलाे ईगाे; बियांड ईगाे नहीं हाे रहा है. अहंकार के पार भी कुछ है-मतलब अचेतन, चेतन से भी नीचे-अति चेतन नहीं, सुपर कांशस नहीं, चेतन के भी आगे नहीं. लेकिन यह बड़ी शुभ घड़ी है.अहंकार के पार ताे कम से कम कुछ है, नीचे ही सही. और अगर नीचे है ताे ऊपर हाेने की बाधा कम हाे जाती है. और अगर हम अहंकार के पार नीचे भी कुछ स्वीकार करते हैं, ताे आज नहीं कल ऊपर भी स्वीकार करने की सुविधा बनती है.
मनाेविज्ञान ताे कहेगा, अहंकार काे ठीक से इंटिग्रेटेड, क्रिस्टलाइज्ड, अहंकार काे ठीक शुद्ध, साफ, संश्लिष्ट हाे जाना चाहिए. यही इडिविजुएशन है, यही व्यक्तित्व है. कृष्ण नहीं कहेंगे. कृष्ण कहेंगे, उसके आगे एक कदम और है. संश्लिष्ट, एकाग्र हुए अहंकार काे किसी दिन समर्पित हाे जाना चाहिए, वह आखिरी कदम है अहंकार की तरफ से.लेकिन ब्रह्म की तरफ वह पहला कदम है. निश्चित ही बूंद अपने काे खाे दे सागर में, ताे सागर हाे सकती है. और अहंकार अपने काे खाे दे सागर में, ताे ब्रह्म हाे सकता है.लेकिन खाेने के पहले हाेना ताे चाहिए, बूंद भी हाेनी ताे चाहिए. अगर बूंद ही न हाे, भाप हाे, ताे सागर में खाेना मुश्किल है. क्याेंकि भाप सीधी सागर में नहीं कूद सकती, कितना ही उपाय करे, आकाश की तरफ उड़ेगी, सागर में कूद नहीं सकती. बूंद कूद सकती है. ताे पश्चिम का मनाेविज्ञान बूंद बनाने तक है, कृष्ण का मनाेविज्ञान सागर बनाने तक है.