अगर काेई यह पूछे कि युद्ध,आपदाओं और नफरताें के दाैर में आखिर भाईचारे का अर्थ ्नया रह गया है. ताे आप ्नया जवाब देगे? गंगा-जमुनी तहजीब का बिखरना हर पल तकनीक से जुड़ी दुनिया के लिए काेई अच्छा संकेत नहीं है. यह सामूहिक दुख का प्रश्न है. अब कुछ एकल दुख की बात करें. खासकर उनके लिए, जाे सीबीएसई से लेकर जेईई की परीक्षा में चूक गए हैं. ऐसे में, वे भला अपना दुख किससे जाहिर करें? ्नया समाज में प्रेम और साैहार्द की हिमायत करने वाले नायक अकेले पड़ते जा रहे हैं? इसका जवाब है. शायद हां.जाे जिंदगी से लेकर ्नलासरूम तक की परीक्षा तक में विफल रहे हैं, वे भी ताे अकेले ही हाेते जा रहे हैं,अपने फाेन में कई-कई जीबी की मेमाेरी लिए यह सभी अपने मन का दुख किससे कहें? यह सारे प्रश्न किसी विराेधाभास का संकेत नहीं कर रहे, बल्कि पूछ रहे हैं कि हमारे पास हजाराें कांटै्नट्स हाेते हैं, पर मुश्किल घड़ी में हम किसी काे पुकार नहीं पाते और काेई बचाने नहीं आता.
सब जगह मनुष्य अकेला ही दिख रहा है. ताे फिर किसे अपना माना जाए? काैन हमारे सुख-दुख का साथी बने? आपने कभी ध्यान दिया है कि हमारे फाेन में हजाराें नंबर हाेते हैं, पर हम बात काेई दस-बीस से ही करते हैं. ऐसा क्यों? जब सी मुश्किल में या खुशी के जश्न में किसी काे फाेन करना हाेता है, ताे उन्हीं दस-बीस नंबराें से हमारी बातचीत हाेती है और अगर हम अपने आप से कुछ बुनियादी प्र्रश्न पूछ बैठें, ताे फिर वह कांटै्नट लिस्ट और कम हाे जाती है.हाल ही में, मैंने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के शीर्ष नेतृत्व की पढ़ाते हुए कुछ प्रश्न किए. वे प्रश्न कुछ इस प्रकार के थे. वे काैन लाेग हैं. जिनका आप आदर करते हैं? वे काैन लाेग हैं, जाे आपकाे आदर देते हैं? मुसीबत में आप किन लाेगाें काे फाेन करना चाहेंगे? अपने मन की बात आप किन से कहते हैं? ऐसे कितने लाेग हैं, जाे आपसे अपने सुख-दुख बांट सकते हैं? यह जीवन आप किसके लिए जी रहे हैं? आपकी सफलता और उपलब्धि से कितने लाेग खुश हाेते हैं?
ऐसे ही कुछ और प्रश्न! अंत में हुआ यह कि वह संख्या दहाई तक भी नहीं पहुंची. अगर मनुष्य हाेने का मतलब मिलजुल कर रहना है. ताे फिर सुख-दुख के भाव काे महसूस करने और बांटने के लिए सिर्फ कुछेक लाेग ही क्यों? जुड़ना ही मनुष्यता है और किसी के लिए सहानुभूति रखना, उसके हालात काे महसूस करना ही जीवन की अत्यावश्यकता भी. खासकर उस व्नत, जब दुनिया नए तरीकाें से लगातार लड़ना सीख रही है और सारे संप्रेषण (कम्युनिकेशन) के संसाधन उस भेद काे ही बढ़ाने में लगे हुए हैं. विशेषरूप से तब, जब परिणाम से आकलन करती दुनिया में युवाओं काे सब कुछ जीतने काे कहा जाता है.लेकिन, उस जीत और हार काे काेई कैसे संप्रेषित करें? हमें सिखाया ताे यह जाता है कि यह युग संप्रेषण का है और इससे बड़ी याेग्यता और कुछ भी नहीं. अगर हम संचार नहीं कर पाते, ताे फिर सारी याेग्यता बेमानी है. डिजिटल युग में मैसेजेस और मेल्स से जुड़ी जनता पूछना चाहती है कि आखिर संबंधाें का तात्पर्य ्नया हाेता है? हम अपनी खुशी बहुत कम लाेगाें से इसलिए बांट पाते हैं.
हमें यह यकीन नहीं हाेता कि हमारी खुशी उस व्य्नित काे भी प्रफुल्लित करेगी, क्योंकि किसी की सफलता किसी और के लिए तुलना का कारण बन जाती है. यह तुलनात्मक भाव किसी काे किसी की प्र्रशंसा करने से एक राेक देता है.हम यह न भूलें कि किसी के गुणाें काे सम्मान देना सिर्फ एक मानवीय गुण नहीं, बल्कि वह एक ऐसी विशिष्टता भी है, जाे किसी शेन वार्न काे सचिन की प्रशंसा करने से नहीं राेक सका. जब सगे-संबंधियाें में ‘हमारे परिवार’ का भाव नहीं रह जाता, ताे फिर का जश्न भी फीका रह जाता है.जहां तक दुख के भावाें की अभिव्य्नित है, ताे इसके लिए भी दरवाजे बंद ही रहते हैं. काेई समाज भले ही जुड़ने की वकालत करे, लेकिन व्य्नित अपने सुखाें और दुखाें के साथ अकेला है. चाहे वह घर में हाे. ऑफिस में या भीड़ के बीच-उसकी उपयाेगिता सिर्फ बाजार के मापदंडाें तक ही रह गई है.
जीवन जैसे कृष्ण की तरह उससे बार-बार यही कह रहा है कि सभी के साथ हाे, पर किसी के साथ नहीं.इसलिए लिप्त रहकर भी निर्लिप्त रहाे.अगर असली रिश्ताें की संख्या दहाई भी पार नहीं कर पाई. ताे मनुष्य के उस सामाजिक संप्रेषण और सराेकार का ्नया हाे? इन सारे प्रश्नाें का जवाब सिर्फ और सिर्फ उस आत्म-ज्ञान में है. जाे भावनात्मक और आध्यात्मिक मेधा से प्राप्त हाेता है. हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि अपनाें की संख्या तभी बढ़ती है. जब समाज दूसराें की खुशी का जश्न मनाता है और उनके दुखाें पर माैन भी हाेना जानता है. यह संख्या तभी बढ़ेगी.जब कृतज्ञता का भाव हमें जीवन जीने का रास्ता दिखाए. जब उनमें से कई आपकी सफलता काे अपना मानें और विफलता में आपकाे निराश न हाेने दें.समाज से सारी नफरत दफन हाे जाए. ्नया यह संभव है? मुझे ताे लगता है कि संभव है. - नन्दितेश निलय