भारतीय राजनीति के सामने आज सबसे बड़ी चुनाैती यह है कि वह वर्ग और पहचान के प्रश्नाें काे परस्पर विराेधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए सवालाें के रूप में समझे. पिछले कुछ दशकाें में राजनीति का बड़ा हिस्सा या ताे जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र जैसी पहचानाें के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है, या फिर आर्थिक मुद्दाें काे इन सामाजिक वास्तविकताओं से अलग करके देखने की काेशिश करता रहा है. जबकि भारत की सामाजिक संरचना में वर्ग और पहचान इस तरह गुंथे हुए हैं कि उन्हें अलगअलग समझना वास्तविकता काे खंडित करना है. यह प्रश्न आज इसलिए और महत्वपूर्ण हाे गया है, क्याेंकि भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था, दाेनाें तेजी से बदल रहे हैं.
नव-उदारवादी आर्थिक नीतियाें ने विकास के नए अवसर पैदा किए हैं, लेकिन असमानताओं के नए रूप भी सामने आए हैं. स्थायी राेजगार की जगह अस्थायी और अनुबंध आधारित काम बढ़ा है. गिग और प्लेटफाॅर्म अर्थव्यवस्था के विस्तार ने लाखाें युवाओं काे राेजगार ताे दिया है, लेकिन उनके सामने असुरक्षा, अनिश्चितता और सामाजिक सुरक्षा के अभाव जैसी चुनाैतियां भी खड़ी कर दी हैं. डिलीवरी कर्मी, कैब चालक और एप-आधारित सेवा प्रदाता आज ऐसे श्रम संसार का हिस्सा हैं, जिसे पारंपरिक वर्गीय श्रेणियाें में पूरी तरह नहीं समझा जा सकता.
गरीबी का प्रश्न भी केवल आय का प्रश्न नहीं है. देश के सबसे गरीब तबकाें में दलिताें, आदिवासियाें और पिछड़े समुदायाें की हिस्सेदारी आज भी असंगत रूप से अधिक है.
भूमि स्वामित्व के आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में दलित परिवार भूमिहीन हैं या बहुत कम भूमि के मालिक हैं. इसका अर्थ है कि आर्थिक विषमता का चेहरा अक्सर सामाजिक विषमता से जुड़ा हुआ है. गरीबी और सामाजिक बहिष्कार एक-दूसरे काे लगातार पुनरुत्पादित करते हैं.
इसी प्रकार बेराेजगारी केवल आर्थिक संकट नहीं है. एक बेराेजगार युवा की पीड़ा उसकी जाति या धर्म नहीं पूछती, लेकिन राेजगार पाने की संभावना, शिक्षा की गुणवत्ता, सामाजिक नेटवर्क और अवसराें तक पहुंच उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से प्रभावित हाेती है. यही कारण है कि समान आर्थिक संकट विभिन्न सामाजिक समूहाें काे अलगअलग रूपाें में प्रभावित करता है.
भारतीय राजनीति में ऐसे क्षण अवश्य आए हैं, जब वर्ग और पहचान के इस अंतर्संबंध काे समझने की गंभीर काेशिश हुई. डाॅ. भीमराव आंबेडकर ने जाति काे केवल सामाजिक अपमान का प्रश्न नहीं माना, बल्कि आर्थिक संसाधनाें, राजनीतिक शक्ति और अवसराें के असमान वितरण से भी जाेड़ा. उन्हाेंने राजनीतिक लाेकतंत्र के साथ सामाजिक और आर्थिक लाेकतंत्र की आवश्यकता पर बल दिया. इसी प्रकार डाॅ. राममनाेहर लाेहिया ने सामाजिक न्याय काे आर्थिक न्याय से जाेड़ने का प्रयास किया. कर्पूरी ठाकुर और बाद के मंडल आंदाेलन ने भी यही संदेश दिया कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक अवसराें काे अलग नहीं किया जा सकता.
फिर भी इन धाराओं की अपनी सीमाएं रहीं. सामाजिक न्याय की राजनीति ने वंचित समूहाें की भागीदारी बढ़ाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, लेकिन कई बार उसका ध्यान प्रतिनिधित्व तक सीमित रह गया. दूसरी ओर, वामपंथी राजनीति ने वर्गीय प्रश्नाें काे केंद्र में रखा, लेकिन भारतीय समाज की जातिगत संरचना काे हमेशा पर्याप्त गंभीरता से नहीं समझा. परिणामस्वरूप दाेनाें धाराएं अपनी-अपनी सीमाओं में बंधी रहीं.
आज की परिस्थितियां इन सीमाओं से आगे बढ़ने की मांग करती हैं. कृषि संकट, बेराेजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य के बढ़ते निजीकरण तथा आय और संपत्ति की बढ़ती असमानता ने भारतीय लाेकतंत्र के सामने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं. इनका उत्तर केवल पहचान की राजनीति में नहीं मिल सकता, लेकिन केवल आर्थिक विकास की भाषा में बात करके जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्रीय असमानताओं काे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
यही वह बिंदु है, जहां विपक्ष काे अपने राजनीतिक विमर्श की पुनर्रचना करनी हाेगी. उसे ऐसी भाषा और ऐसा कार्यक्रम विकसित करना हाेगा, जिसमें सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय एक-दूसरे के पूरक बन सकें. राेजगार की चर्चा केवल नाैकरियाें की संख्या तक सीमित न रहे, बल्कि यह भी देखा जाए कि उन तक वंचित समुदायाें की पहुंच कैसी है और उनमें सामाजिक सुरक्षा कितनी है. शिक्षा और कृषि जैसे क्षेत्राें में भी यही दृष्टिकाेण अपनाना हाेगा.
गिग और प्लेटफाॅर्म वर्कर्स के प्रश्नाें काे नई राजनीति के केंद्र में लाना हाेगा.
- प्राे. मनाेज कुमार झा