वर्ल्डकप में अप्रत्याशित उलटफेर, दिग्गजों के पसीने छूटे

फीफा वर्ल्ड कप पर सतीश मिश्र का विशेष लेख

    21-Jun-2026
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हिंदी के प्रसिद्ध महाकवि बिहारी का एक अत्यंत लोकप्रिय दोहा है: देखन में छोटे लगै, घाव करै गंभीर. आज दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल के सबसे बड़े रंगमंच यानी वर्ल्ड कप फुटबॉल पर ये पंक्तियां पूरी तरह से सटीक बैठती है. फीफा ने फुटबॉल की इसी लोकप्रियता को भुनाने के उद्देश्य से इस बार परंपरागत 32 टीमों वाले वर्ल्ड कप को बढ़ाकर 48 टीमों का कर दिया. टीमें बढ़ीं तो मैच बढ़े. अधिक स्टेडियमों और आयोजकों की संख्या भी बढ़ी, लेकिन परंपरावादी फुटबॉल प्रेमियों को यह बदलाव पसंद नहीं आया. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि लोगों को लगा कि जब टीमें बढ़ेंगी तो कई ऐसे छोटे और अनजाने देश क्वालीफाई कर टूर्नामेंट में उतरेंगे, जिससे टूर्नामेंट का स्तर और प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है. जब इटली, रूस, चीन और कैमरून जैसे दिग्गज देशों की जगह कुराकाओ, कांगो, केप वर्दे, बोस्निया-हर्जेगोविना और जॉर्डन जैसे देशों ने वर्ल्ड कप के ड्रॉ में जगह बनाई तो कई फुटबॉल पंडितों ने नाक-भौं सिकोड़ी. कुछ लोगों ने तो ऐसी प्रतिक्रिया दी जैसे किसी फाइव-स्टार होटल में जाकर प्लेट में भर्ता परोस दिया गया हो. इन तथाकथित फुटबॉल विशेषज्ञों ने सभी मैचों के एकतरफा होने की भविष्यवाणी भी कर दी. उनका कहना था कि गोलों की झड़ी लग जाएगी. बड़ी टीमें इन नौसिखियों को अच्छा सबक सिखाएंगी. उनका मानना था कि इन छोटी टीमों को वर्ल्ड कप में जगह देना बकरियों को बाघ के जंगल में छोड़ने जैसा है. लेकिन अब पहले चरण के मैच खत्म होने के बाद मामला पूरी तरह उल्टा हो गया है. बकरियों ने बाघों को कान पकड़कर जमीन पर बिठा दिया है. ब्राजील, अर्जेंटीना, जर्मनी, फ्रांस और इंग्लैंड आगे की पंक्ति में सोफे पर बैठने वाले देशों की तरह थे. बाकी टीमें जुलूस में पीछे चलने वाले कार्यकर्ताओं जैसी थीं. उनका काम बस इतना था कि आना, हारना, फोटो खिंचवाना और घर लौटने के लिए विमान पकड़ लेना. लेकिन इस साल इन कार्यकर्ताओं ने सीधे ताज को ही हिला दिया है. इस बार के वेिश कप के सबसे बड़े दावेदार स्पेन का जब केप वर्दे जैसी छोटी-सी टीम से सामना हुआ तो अनुमान लगाया जा रहा था कि स्कोरलाइन 6-0 होगी, 8-0 होगी या फिर 10-्‌0‍. लेकिन हुआ इसके ठीक उलट्. मैच खत्म होने पर दोनों टीमों का स्कोर 0-0 था. केप वर्दे ने स्पेन को इतना परेशान कर दिया कि दूसरे वेिश युद्ध के बाद शायद पहली बार स्पेनिश प्रशंसकों को इतिहास से डर लगा होगा. उस देश की आबादी मुंबई के किसी एक उपनगर जितनी भी नहीं है, लेकिन जिस तरह से वे स्पेन के सामने डटे रहे, उससे लगा कि यह मैच स्पेन बनाम केप वर्दे नहीं, बल्कि स्पेन बनाम उसके अपने अहंकार का था. इसी तरह कांगो का खेल देखते हुए एक पल के लिए भी नहीं लगा कि क्या यह टीम पुर्तगाल के खिलाफ खेल रही है या पुर्तगाल की परीक्षा ले रही है. उसके खिलाड़ियों ने तो रोनाल्डो को पूरी तरह घेरकर लगभग दर्शक बना दिया था. पहले बड़ी टीमों के खिलाड़ी छोटी टीमों को ऐसे देखते थे जैसे कोई व्यवसायी अपने ऑफिस बॉय को देखता है. आज वही ऑफिस बॉय अपनी कंपनी खोल चुका है और व्यवसायी के ऑर्डर छीन रहा है. एक जमाना था जब इन छोटी टीमों का इस्तेमाल गोल अंतर बढ़ाने के लिए किया जाता था. ब्राजील को आत्मवेिशास चाहिए? चलो, एक छोटी टीम ले आओ. स्पेन का फॉर्म खराब हो गया है? कोई बात नहीं, छोटी टीम के खिलाफ चार गोल कर लो और फॉर्म वापस पा लो. लेकिन आज इस दवा के साइड इफेक्ट होने लगे हैं. बड़ी टीमों का फॉर्म सुधरने के बजाय उनका ब्लड प्रेशर बढ़ने लगा है. ग्लोबलाइजेशन ने फुटबॉल में इतना बड़ा बदलाव किया है कि अब अफ्रीकी, कैरिबियाई और एशियाई खिलाड़ी हर दिन यूरोपीय क्लबों में बड़ी टीमों के खिलाफ खेल रहे हैं. इसलिए वे ब्राजीलियन, स्पेनिश या फ्रेंच जर्सी देखकर उत्साहित नहीं होते. पहले जर्सी देखकर उनके घुटने कांपते थे. अब जब वे जर्सी देखते हैं तो पूछते हैं, क्या मुझे इसके बदले यह मिल सकती है? मुझे लगता है कि अगले वर्ल्ड कप से पहले ब्राजील, अर्जेंटीना, फ्रांस और जर्मनी को एक नया संगठन बनाना चाहिए, बड़ी टीमों की सुरक्षा के लिए एक फोरम. उनकी मांगें भी बिल्कुल जायज होंगी, हमें इन छोटे देशों से मत भिड़ाइए, कांगो के खिलाफ खेलते समय अतिरिक्त खिलाड़ी दीजिए, कुराकाओ के खिलाफ दिन के बजाय रात में मैच कराइए या जॉर्डन के खिलाफ खेलते समय मानसिक सहयोग के लिए एक मनोवैज्ञानिक उपलब्ध कराइए.  
 
  खेल नाम से बड़ा होता है !

 इसकी वजह यह है कि यहां सिर्फ गोल नहीं हो रहे हैं, यहां गद्दियां हिल रही ह्‌ैं‍. यहां इतिहास पसीना बहा रहा है. अब फुटबॉल में अमीर-गरीब, बड़े-छोटे, पुराने-नए का कोई अंतर नहीं रह गया है. क्रिकेट में जब कोई छोटी टीम किसी बड़ी टीम को हरा देती है तो हम उसे आज भी अपसेट या शॉक कहते ह्‌ैं‍. फुटबॉल में अब वह शॉक नहीं रहा. उसे नॉर्मल कहा जाता है, और यही इस वर्ल्ड कप की सबसे बड़ी बात है. क्योंकि यहां खेल नाम से बड़ा है, और अब केप वर्दे, कांगो, कुराकाओ और जॉर्डन जैसे देश दुनिया को यही बात बता रहे हैं कि छोटा बच्चा समझ के हमको ना आंख दिखाना रे.