प्रश्न - ’दिल का जिगसॉ’ की आयडिया क्या है..? जो परंपरागत तरीके से वधू-वर सम्मेलन होते हैं, उससे ये कैसे अलग है..? उत्तर - बीजेएस 40 सालों से परिचय सम्मेलन, वधूवर सम्मेलन कराता आ रहा था. अभी 2 साल पहले हमने ’बीजीएस 2.0’ की शुरुआत की, जहां पे हमने समझा कि आज समाज की परेशानियां बदल चुकी हैं. आज की पीढ़ी अलग तरीके से सोचती है, अलग तरीके से चीजों को देखती है. इसमें जब हमने शादी के विषय को देखा, तो जाना की शादी करने के लिए आज के पीढ़ी की जो विचार प्रक्रिया है, वो बिलकुल बदल चुकी है.उस चीज को ध्यान में रखते हुए हमने एक अनूठा कार्यक्रम बनाया, जिसका नाम है ’दिल का जिगसॉ’. यह इसलिए अलग है क्योंकि इस कार्यक्रम में लड़के-लड़कियां एक- दूसरे से सिर्फ मिलते नहीं हैं बल्कि वे एक्टिविटीज् के माध्यम से एक-दूसरे को जानते-पहचानते हैं. पर्सनालिटी, लाईफस्टाईल, अप्रोच, माईंडसेट, व्हॅल्यूज, बिलीफ्स, फॅमिली, कौन कितना एक्सप्रेसिव है, मायनस पॉईंट्स क्या हैं, निगोशिएबल्स क्या है, कॉम्प्रोमाइजेस, कम्पॅटिबिलिटी इ. यानी कि हर वो चीज जो आज के लोग बारीकी से देखते हैं. पहले के समय में लोग शादी तय करते हुए सिर्फ उंचाई, वजन, पृष्ठभूमि देखते थे, लेकिन आज की पीढ़ी देखती है कि वाइब (vibe) मैच होती है या नहीं. यह वाईब मैच कराने के लिए जितना अभ्यास जरुरी था वह करते हुए मैंने इस कार्यक्रम की रचना की है. इस कार्यक्रम में पूरे दिन में, 9 घंटे में, 25 लड़के और 25 लड़कियां एक-दूसरे को इन सारे पॅरामीटर्स के ऊपर जान जाते हैं.
प्रश्न - ये वाइब मैच करना क्या होता है..? एक्टिविटिज् के माध्यम से यह कैसे जाना जा सकता है..?
उत्तर - वाइब मैच करना मतलब जैसे फ्रिक्वेन्सी मैच करना. जब हम रेडिओ का बटन घुमाते हैं और एक फ्रिक्वेन्सी लगती है तो मनपसंद गाना आ जाता है. वैसे ही फ्रिक्वेन्सी को हम समझते हैं. जब दो लोग, जिनको एक-दूसरे के साथ रहके सही में अच्छा लग रहा है, उनकी ऊर्जा, कोई पैरामीटर मैच कर जाती है, उस चीज को हम वाइब बोलते हैं. एक दूसरे की ओर एट्रैक्ट होना, पर्सनालिटी, नेचर, फैमिली जैसी कोई एक चीज जिससे उसके होने की खूबसूरती बन गई, उस चीज को हम वाईब बोलते हैं.
प्रश्न -मतलब 9 घंटे के पूरे प्रोग्राम में जो कई एक्टिविटिज् होती है, उन सभी एक्टिविटिज् में वाईब मैच किए जाते हैं..?
उत्तर - जो इन 9 घंटों में होता है, वो सब यही है. मेरी जो स्पेशलायझेशन है वो अडल्ट लर्निंग में है. मैं पिछले 10 सालों से इसी पे काम करती हूं. जब हम बड़ों को पढ़ाते हैं, उसको अँड्रागोजी कहते हैं. मैं अँड्रागोजी में स्पेशलाइहूं और इसमें इनोव्हेशन मेरा कोर फोर्टे है. डिझाइएक टेक्निक है, जहां मैंने स्टॅनफोर्ड से उसके के उसको अप्लाय किया है. तो मैं 10 सालों कंपनी के साथ, 500 से ज्यादा कंपनीयों के किया, जहां पे मैं अडल्ट लर्निंग कराती थी. तो ’दिल का जिगसॉ’ कार्यक्रम में आनेवाले होते हैं. उनसे हम बात करते हैं. एक मजेदार बक आज तक हमें किसीने नहीं बताया कि शादी कैकरते हैं. हर चीज के लिए कोर्सेस हैं, लेकिन शादी कैसे करते हैं, किससे करते हैं, इसका कोई कोर्स ही नहीं है.तो हमें बस खुद ही सोचना है. तो ये सारी बात ध्यान में रखते हुए एक ऐसा कार्यक्रम बनाया जहां पर हम लोगों को ये सिखा पाएं. यहां बहुत महत्वपूर्ण चीज ये है कि आपको ये जरूर समझ में आ जाएगा कि मुझे लाईफ में पार्टनर चाहिए कैसा.
प्रश्न - शादी के बारे में समाज की परंपराएं, रीति रिवाज को ध्यान में रखते हुए और नई पीढ़ी की सोच के अनुसार आपने जिस कार्यक्रम की अवधारणा की है, क्या हम इसे माईंडसेट ब्रेकिंग कह सकते हैं..?
उत्तर - इस कार्यक्रम में सीखना ही है. क्योंकि इसकी जो रचना है वह ऐसी है कि हम माईंडसेट ब्रेकिंग से शुरुआत करते हैं. आज अगर हम देखेंगे तो शादी को लेके एक माईंडसेट बना हुआ है. माईंडसेट कहां से आता है..? हमारा माईंडसेट बॉलीवूड से या पेरेंट्स से आता है. अक्सर हमने देखा है कि शादी करने का मतलब मम्मी को डजस्टमेंट करनी पड़ेगी. एक ऐसा घर जहां लड़ाई होगी. लेकिन मुझे नहीं चाहिए की मेरी आजादी छिन जाए. एक लड़का क्यों चाहेगा कि वो 25 साल की लड़की को घर पे लाके उसका पालन-पोषण करे..? और आज की तारीख में एक लड़की क्यों चाहेगी कि वो 25 बरस पुराने को घर में संभाले..? आज की पीढ़ी स्वतंत्र है. उनके नजरिये से शादी के बारे में पुराने जो पॅरामीटर्स हैं, वो काफी गलत चल रहे हैं. इसलिए हम इस कार्यक्रम में सबसे पहले माईंडसेट ब्रेक करते हैं, कि जो आपको लग रहा है कि शादी ऐसी होती है, वैसी होती वगैरा वगैरा. तो शादी ऐसी नहीं होती है. दो परिवारों की शादी आप अपनी बना सकते हो. बच्चों को लगता है कि पेरेंट्स जबर्दस्ती करते हैं शादी के लिए. लेकिन पेरेंट्स का क्या स्वार्थ है इसमें..? तो हम सहभागी युवा-युवतियों से पूछते हैं कि यार, बिना बात के पेरेंट्स तुमपे प्रेशर बना रहे हैं, उनका क्या स्वार्थ है..? तो अंत में निकल के आता है कि उनको एक ही चीज चाहिए कि जब हम मर जाएं ना, तो कोई हो. जो तुम्हारे साथ रहे. तो वहां से उनका फर्स्ट माईंडसेट ब्रेक होता है.
प्रश्न - आपने आज की पीढ़ी की मानसीकता की बात की. लेकिन युवक-युवतियां मनपसंद व्यक्ती के साथ डेटिंग करते हैं.. उसके बारे में भी बात होती है..?
उत्तर - ये कार्यक्रम मुझे लगता है इसलिए जरुरी है क्योंकि शादी करने का जो निर्णय है वो नहीं ले पाते बच्चे, इसलिए उसको टालते रहते हैं. वे डेटिंग करते रहते हैं एक लड़का, फिर दूसरा, फिर तीसरा, फिर चौथा ऐसे असमंजस में रहते हैं.कब तक करोगे डेटिंग..? एक लिमिट है ना..! कभी तो सेटल होना पड़ेगा, वरना अकेले रह जाओगे. तो फिर क्यों ना ऐसा पार्टनर ढूंढ लें जिसके साथ पूरी लाईफ डेट करने में मजा आए. तो फिर वहां से एक माईंडसेट ब्रेक होता है. मन में विचार आता है कि ’अरे ये इंसान इतना इम्पॉर्टंट है, हमें ना इतने घंटे चाय पीनी है, इतने बार ट्रिप पे जाना है, इतनी रातें इस इंसान के साथ इम्पॉटइंसान.’ कि सोचें कि क्या-क्या देखना पड़ेगा उसके अंदर. तो फिर इंट्रोडक्शन शुरू करते हैं. इसके लिए हमने एक पूरा चार्ट बनाया है. कार्यक्रम के माध्यम से यह समझने की कोशिश होती है कि शादी में मेरा कितना स्टेक इन्व्हॉल्व्ड है और मेरे पेरेंट्स का कितना स्टेक इन्व्हॉल्व्ड है. कुछ ऐसे सवाल जो जब आप मेरे मुंह से सुनें, तो आपको मेरा इंटेलिजन्स, इंटेलेक्चुअल लेवल, मेरा स्पॉन्टेनिटी, मेरा डिसीजन मेकिंग सब समझ में आए. कार्यक्रम में सम्मिलित हुए उन 25 में से कोई एक बंदा जिसका इंटेलिजन्स, ह्युमर या सार्काझम बहुत अच्छा है, वो जल्दी पकड़ लेता है कि बाकी 25 में से कौन से वाले का सार्काझम या ह्युमर या पर्सनालिटी मेरे लेव्हल की है.
प्रश्न - आपने बताया कि पूरा कार्यक्रम लगभग 8-9 घंटे चलता है. उसमें जो एक्टिविटीज होती है, उसका स्वरुप कैसा होता है..?
उत्तर - मैं पहले किसी भी टॉपिक को मॉडल के जरिये समझाती हूं, ताकि वो लोग सोचना शुरू कर दें कि ’अरे यार, मैं बहुत अग्रेसिव हूं, ये मेरेको तो पता है लेकिन किसी और को नहीं पता.’ तो पहले वो थोड़ा सीख लेते हैं. इसे ’एक्सपीरियंशियल लर्निंग’ भी कह सकते हैं. यहां एक-दूसरे के लाईफस्टाईल के बारे में बातें की जाती है. मैं उनको ये समझाना चाहती हूं कि जो आप चाहते हैं ना, शादी कर रहे हैं, आप उसको कमिट करें. अक्सर आप देखते होंगे जो शादियां टूट जाती हैं, वो इसलिए होती हैं क्योंकि हमने कुछ अपने दिमाग में बनाया हुआ है. हम अपने आपको पोट्रे कुछ और कर रहे होते हैं. जिससे लोगों को एक-दूसरे में पता लगता है कि किसकी जिंदगी बहुत सादी है, कौन इस चीज के लिए तैयार है. इस सेगमेंट में जैसे आप कोर्ट रूम देखते हैं वैसे मैं एक ’कचहरी’ बनाती हूं और वैल्यूज तथा एक्सपीरियंसेज या लाइफ में डिसीजंस के बारे में बातें होती है.
प्रश्न - आपने कोर्ट और कचहरी की बात की.. क्या इस एक्टिविटिज् में जिंदगी के बारे में कुछ ऐसे भी जटिल सवाल होते हैं..? उत्तर -बिलकुल होते हैं. कोई सवाल इतने जटिल होते हैं कि सामने वाली जो लड़कियां बैठी हैं, उनको एक बार में समझ में आए कि उनमें से कौन सा लड़का उनके स्टाइल का है. ऐसे सवालों के जवाब बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. उसकी मैच्योरिटी, अप्रोच, इंटरेस्टिंग लेवल तक समझ में आती है. जिससे वह एक-दूसरे के बारे में यह जान सकते हैं कि किसके साथ जिंदगी अच्छे से बिताई जा सकती है.
प्रश्न - अलग अलग एक्टिविटिज् के दौरान आपका क्या अनुभव रहा है कि आज की पीढ़ी कुल मिलाकर शादी के बारे में क्या क्या सोचती हैं..?
उत्तर - आज की जनरेशन सोचती है कि मेरे लिए कोई ऐसा लाइफ पार्टनर आए जो मेरी चीजें मैच कर सकती है. ’आय वॉन्ट समवन हु इज हैविंग मेरे जैसा इंटेलिजेंस.’ बियॉन्ड बैंक बैलेंस. किसी के लिए इंटेलेक्चुअल लेवल बहुत मैटर करता है कि मैं बात कर पाऊं. आज के लोग चाहते हैं वो बैठ के बात कर पाएं, उनकी कॉन्वर्सेशन स्टाइल्स मैच करनी चाहिए. आज के लोगों को घूमना पसंद है. उनको लगता है यार कोई ऐसा होना चाहिए जो मेरे साथ ट्रेवल कर पाए, मेरी पार्टीज में, मेरे तरीके के गैदरिंग में बैठ पाए. आज के लोगों को स्मार्टनेस पसंद है कि जब मैं अपने पार्टनर के साथ घूमूं, उसको मैं फ्लॉन्ट करूं तो वो मेरे को प्राउड हो. ऐसा बिल्कुल नहीं है कि उनको पैसा नहीं चाहिए. मतलब लड़कियों को पैसा नहीं चाहिए या लड़के सुंदर लड़कियां नहीं चाहते ऐसा बिल्कुल नहीं है. लेकिन अल्टीमेटली उनको चूज करने के लिए मिले जो बेहतर निर्णय लेने वाले लोग हों. लड़कियों को लगता है कि मेरे से ऊपर स्टैंडर्ड तो हो, लेकिन बाकी मेरी इंडिपेंडेंस मुझे मिल जाए.
प्रश्न - आपने पिछले दो सालों में जिनसे बातें की हैं, जो युवक-युवतियां कार्यक्रम में सम्मिलित हुए हैं, उनकी प्रतिक्रिया कैसी होती है..?
उत्तर -ये कार्यक्रम एक्सक्लुझिव्हली क्रिएट किया गया है. उन्हें ऐसा महसूस होता है की मेरे साथ जो हो रहा है ना, वो कुछ है, मेरा माईंडसेट चेंज हो रहा है, मुझे कुछ बहुत अच्छा जानने को मिल रहा है. मुझे 25 लोगों को जानने के लिए मिल रहा है. ये 25 लोग छोड़ो, लेकिन मैं जिंदगी में जिससे शादी करूंगा या करुंगी मुझे उसके बारे में सारी चीजें पता चल जाएंगी की मेरे क्या निगोशिएबल्स हैं, क्या नॉन- निगोशिएबल्स हैं, वगैरा वगैरा.
प्रश्न - शादी तय करते समय हमारे समाज में पुराने जमाने से कुंडली मिलान चलता आ रहा है.. क्या इस पीढ़ी में भी कुंडली का महत्व बना हुआ है.. या वे इससे परे सोचते हैं..?
उत्तर -इसके लिए हमने नये जमाने की एक कुंडली भी बनाई है. इसमें छत्तीस ऐसे पॅरामीटर्स जो, जिसमें से एक भी मिल गया ना तो मैं उनको बोलती हूं ’आप आप शादी कर लोगे सामनेवाले से’. या फिर अरेंज मॅरेज में तो एक इसमें से कोई भी पैरामीटर मैच कर लो, तो भी आपको सामनेवाला पसंद आ जाएगा.
प्रश्न - बुजुर्गों को हमेशा ऐसा लगता है की नई पीढ़ी के पास अनुभव की कमी है. आप जब ‘दिल का जिगसॉ’ के माध्यम से युवाओं से बातें करती हैं, तो क्या आपको वैसाही दिखता है या आपका विमर्श कुछ अलग है..?
उत्तर - मेरा अभी तक का जो अनुभव रहा है, मुझे लगता है की ये जनरेशन बहुत ही मॅच्युअर है. हो सकता है कि उन्होंने जिंदगी में वो सब नहीं देखा है जो पेरेंट्स ने देखा हुआ है, लेकिन ये जनरेशन काफी समझदार है. उनको क्लॅरिटी है. ‘इफ दे वॉन्ट टू डू, दे आर क्लियर’. ‘इफ दे डोंट वॉन्ट, दे आर क्लियर’. आज की जनरेशन हेझिटंट नहीं है. वो अपफ्रंट हैं, अपने अप्रोच के साथ. उनको जिंदगी का अनुभव थोड़ा कम होगा, मगर जिंदगी से उन्हें क्या चाहिए इसके बारे में बहुत स्पष्ट हैं. और यह कार्यक्रम इसी पर आधारित है कि उन्हें अपनी जिंदगी में जैसा पार्टनर चाहिए, वे इसे ठीक से समझें. ये जरूर होता है की कुछ, कुछ इंटरॅक्शन्स के बाद, कुछ अनुभवों के बाद उन्हें ऐसा लगता है कि ’ये तो हमने कभी सोचा ही नहीं’, ’इतना तो हमें पता ही नहीं था’. वो बोलते हैं ’ये तो हमें किसीने बताया ही नहीं कभी, हमारे पेरेंट्स ने कभी ये चीज तो बोली ही नहीं.’ वो सिर्फ शादी-शादी, शादी-शादी बोलते रहते थे, लेकिन यहां हम एक-दूसरे से भी सीखते हैं.
आप दिनभर के कार्यक्रम में उपस्थित रहने वाले लडके-लडकियों से बातें करती हैं, मगर कई बार समस्याएं पेरेंट ्स की तरफ से भी होती हैं. क्या उनसे भी बातें की जाती हैं?
बिलकुल. क्योंकि कई बार शिकायतें ऐसी होती हैं कि शादी के निर्णयों में पेरेंट्स अपनी थोपते हैं, लेकिन लडके-लडकियों को वो चाहिये नहीं होता. स बोलते हैं ’ये बहुत अच्छा लड़का है’, उन्हें वो नहीं चाहिये होता. तो शादी की उम्र बढ़ती जाती है. इस सबसे बहुत बेहतर है की पेरेंट्स को थोड़ा बॅकसीट पे रखें, बच्चों को इनेबल करें, उनको ं की शादी में आपको क्या ढूंढना चाहिये, और उनको वो हक आप शादी में चूज करें. कार्यक्रम के अंत में हम सभी पेरेंट्स ुलाते हैं. दो घंटे उनसे भी बातचीत होती है, जहां पर सारे बच्चे भी अनुभव बताते हैं की ’आज के दिन में हमने क्या समझा..?’ तो हैं. पेरेंट्स का माईंडसेट भी बदलता है.
आज की पीढ़ी के लिए पै सा बहुत ज्यादा मैटर नहीं करता
कुछ सवाल जवाबों के माध्यम से यह बातें भी होती है. लेकिन पैसे की बात ज्यादा नहीं होती है. मैंने लड़के-लड़कियों को देखा है कि वो देख के ही डिसाइड कर लेते हैं कि शायद इन दो-तीन लोगों से बहुत ज्यादा जो फर्क है कि मतलब कोई 1 करोड़ की पार्टी है और कोई 5 करोड़ की पार्टी है, वो उनके है. आज के बच्चों के लिए वो मैटर नहीं करता है. वो पेरेंट्स के लिए मैटर करता है. वो इन बच्चों के लिए रता है.
जिंदगी में पार्ट नर ढूंढने के लिए मदद ‘दिल का जिगसॉ’ कार्यक्रम इस दृष्टी से अहम है की जब हम शादी के बारे में सोचते हैं और लेकिन हमें कोई नहीं बताता है की हमें कैसा पार्टनर ढूंढना चाहिये, उसमें क्या कार्यक्रम आपको ये बता देता है की आपको जिंदगी में कैसा पार्टनर ढूंढना नर में क्या-क्या देखना चाहिये. कई पेरेंट्स बोलते हैं की ’शादी के लिए लड़का तो कुछ पता नहीं है.’ बता देते हैं ना..! क्योंकि स्मार्ट तो वो ज्यादा व ज्यादा हो सकता है, लेकिन जरुरी नहीं है ादा हो. तो जब उन्हें शादी करनी है और अपनी है, तो उन्हें बता देते हैं ना, फिर वो ताकि वो ेहतर निर्णय ले पाएं.