कात्रज घाट परिसर में बड़े पैमाने पर मेडिकल बायाेवेस्ट फेंके जाने की शिकायत के बाद पुणे शहर में बायाेमेडिकल कचरा प्रबंधन का गंभीर मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है.निजी अस्पतालाें, पैथाेलाॅजी लैब और क्लीनिकाें से निकलने वाले मेडिकल कचरे के संकलन और निपटान की प्रक्रिया में बड़ी खामियां हाेने का आराेप डाॅक्टर संगठनाें और निजी अस्पतालाें की ओर से लगाया जा रहा है.पुणे शहर में करीब 700 से 800 निजी अस्पताल और क्लीनिक, जबकि मनपा के करीब 70 अस्पताल कार्यरत हैं. इन सभी स्थानाें से प्रतिदिन लगभग 5 से 6 टन बायाेमेडिकल कचरा उत्पन्न हाेता है. नियमानुसार इस कचरे काे एकत्र कर कैलास श्मशानभूमि स्थित इन्सिनरेटर में वैज्ञानिक तरीके से नष्ट किया जाना आवश्यक है. लेकिन वास्तव में इस प्रक्रिया की कार्यक्षमता पर कई गंभीर सवाल खड़े हाे रहे हैं.
शहर में हाल ही में शामिल किए गए गांवाें और उपनगराें में बड़ी संख्या में छाेटे-बड़े क्लीनिक शुरू हुए हैं. इनमें से कई क्लीनिकाें का आधिकारिक पंजीकरण नहीं हाेने की जानकारी सामने आई है. अस्पताल अथवा क्लीनिक का पंजीकरण करते समय बायाेमेडिकल वेस्ट प्रबंधन के लिए अलग से पंजीकरण कराना अनिवार्य है, लेकिन कई स्थानाें पर इस नियम की अनदेखी की जा रही है. इसके कारण इन स्थानाें का मेडिकल कचरा खुले में या अनाधिकृत जगहाें पर फेंके जाने की आशंका जताई जा रही है.
केवल अस्पतालाें से ही नहीं, बल्कि घरेलू उपचाराें से निकलने वाला मेडिकल कचरा भी चिंता का विषय बन गया है. विभिन्न बीमारियाें से ग्रस्त मरीजाें के डायपर, इंजेक्शन की सुइयां, सलाइन की बाेतलें और अन्य मेडिकल सामग्री सीधे घरेलू कचरे के साथ फेंकी जा रही हैं.
इससे संक्रामक बीमारियाें के फैलने का खतरा बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है.मनपा के स्वास्थ्य विभाग ने बायाेमेडिकल कचरा संकलन के लिए पाॅस्काे नामक निजी संस्था काे 30 वर्षाें के लिए ठेका दिया है. यह कंपनी क्लीनिकाें से लगभग 3,300 रुपये और अस्पतालाें से बेड की संख्या के अनुसार 7 हजार रुपये से अधिक शुल्क वसूलती है. लेकिन नियमित शुल्क चुकाने के बावजूद कचरा संकलन की सेवा संताेषजनक नहीं हाेने का आराेप डाॅक्टराें द्वारा लगाया जा रहा है. दक्षिण पुणे क्षेत्र में डेढ़ से दाे हजार क्लीनिक और अस्पताल हाेने के बावजूद केवल 15 से 20 कलेक्शन पाॅइंट उपलब्ध हैं. साथ ही कचरा संकलन करने वाला वाहन संबंधित स्थान पर महज 2 से 3 मिनट ही रुकता है, जिसके कारण कई अस्पताल समय पर कचरा जमा नहीं कर पाते हैं.