यह केवल एक क्राइम स्टोरी नहीं है. यह हमारे समय की कहानी है. उस पीढ़ी के गुणों और अवगुणों से जुड़ी कहानी है, जिससे मैं स्वयं भी बहुत दूर नहीं हूं. दया मुझे हमारी स्थिति पर आ रही है. यह निस्संदेह एक जघन्य अपराध है. हत्या के लिए कोई तर्क नहीं हो सकता, कोई औचित्य नहीं हो सकता. लेकिन हर अपराध के पीछे एक कहानी होती है. एक ऐसी कहानी, जो नैतिकता और अनैतिकता की बहस से भी पहले शुरू होती है. एक ऐसी कहानी, जहां से उस सोच का जन्म होता है, जो अंततः किसी को इतना बड़ा अपराध करने तक ले जाती है. मुझे लगता है कि उस कहानी को समझना भी उतना ही जशरी है. हमारी नई पीढ़ियां बेहद स्मार्ट, मॉडर्न और टेक्नोसैवी हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समझती हैं. लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सीखते-सीखते कहीं ह्यूमन इंटेलिजेंस पीछे छूटती जा रही है. वे दुनिया के किसी भी कोने से जुड़ सकते हैं, लेकिन अपने ही घर में संवाद स्थापित नहीं कर पा रहे. हजारों लोगों के सामने अपनी तस्वीर साझा कर सकते हैं, लेकिन अपने माता-पिता के सामने अपना सच नहीं रख पा रहे. इस जनरेशन के लिए स्वार्थ, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद सर्वो परि हैं. अपना छोटा-सा गेन, किसी दूसरे का बड़ा लॉस बन जाए - इसकी चिंता कम दिखाई देती है. निर्णय के परिणाम क्या होंगे - इस पर विचार कम दिखाई देता है. और सबसे खतरनाक बात यह है कि कई बार गलती के बाद रिमोर्स भी दिखाई नहीं देता. मैं ठीक हूं, मेरी जिंदगी है, मेरी चॉइस है - यह सोच अपनी जगह सही है. लेकिन किसी भी चॉइस की सीमा वहां समाप्त हो जाती है जहां वह किसी दूसरे की जिंदगी को प्रभावित करने लगती है. मैं युवाओं के साथ काम करती हूं. उनकी बातें सुनती हूं. उनके डर, उनकी उलझनें, उनके निर्णय और उनकी चुप्पियां देखती हूं. मुझे आज की पीढ़ी से शिकायत नहीं है. लेकिन उसकी कुछ प्रवृत्तियां निश्चित रूप से चिंताजनक हैं. और फिर बार-बार मेरे मन में वही प्रश्न आता है. क्या उस लड़की में इतना साहस था कि वह किसी को मौत के घाट उतार दे, लेकिन इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह अपने माता-पिता से कह पाती - मैं यह शादी नहीं करना चाहती..? क्या वह अपने होने वाले पति से नहीं कह सकती थी कि उसके मन में संशय है..? क्या वह दोनों परिवारों के सामने खड़ी होकर अपनी असहमति व्यक्त नहीं कर सकती थी..? यदि नहीं, तो फिर हमें केवल उस लड़की को नहीं, अपने समाज को भी आईने में देखने की आवश्यकता है. क्योंकि यह केवल एक लड़की की विफलता नहीं है. यह शायद संवाद की सामूहिक विफलता है. आज कई घर सुंदर इमारतों में बदल गए हैं, पर उनके भीतर संवाद की खिड़कियां छोटी होती जा रही हैं. हम बच्चों से कहते हैं - सफल बनो. सम्मान कमाओ. परिवार की प्रतिष्ठा का ध्यान रखो. लेकिन हम बहुत कम कहते हैं - अगर कभी जीवन के किसी मोड़ पर तुम्हें ना कहना हो, तो निडर होकर कहना. उस समय हमारी प्रतिष्ठा से बड़ा तुम्हारा निर्णय होगा. किसी विवाह को रोक देना पाप नहीं है. किसी निर्णय पर पुनर्विचार करना चरित्रहीनता नहीं है. गलत विवाह से बेहतर है टल गया विवाह. दुखद विवाह से बेहतर है देर से हुआ विवाह. और कई बार विवाह न होना भी उस विवाह से बेहतर है जो किसी की मानसिक शांति, स्वतंत्रता या जीवन छीन ले. पिछले कुछ वर्षों से मैं बीजेएस के माध्यम से युवाओं और परिवारों के साथ काम कर रही हूं. विवाह, जीवनसाथी चयन, पीढ़ियों के बीच संवाद और रिश्तों के बदलते स्वरूप पर कार्यक्रम बना रही हूं और संचालित कर रही हूं. इन कार्यक्रमों में मैंने एक बात बार-बार देखी है. आज का युवा इस बात से नहीं डरता कि माता-पिता नाराज हो जाएंगे. उसे इस बात का डर होता है कि शायद उसे सुना ही नहीं जाएगा. और दूसरी ओर माता-पिता भी अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, लेकिन कई बार उनकी अपेक्षाओं की आवाज इतनी ऊंची हो जाती है कि बच्चों की वास्तविक इच्छाएं उसमें दब जाती हैं. यहीं से दरारें शुरू होती हैं. मैं माता-पिता से भी यही कहती हूँ - अपने बच्चों की इच्छाएं जानिए. उनके निर्णयों को सुनिए. कई बार बच्चों को सलाह की नहीं, सुने जाने की आवश्यकता होती है. सच कुछ रिश्ते रोक सकता है, लेकिन झूठ कई जिंदगियां तोड़ सकता है. और जब संवाद की छोटी-छोटी दरारों को समय रहते नहीं भरा जाता, तो वही दरारें कभी-कभी ऐसी खाइयों में बदल जाती हैं.
संवाद की मृत्यु उससे बहुत पहले हो चुकी होती है
यदि हमारे घरों में बच्चों को अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों पर खुलकर बोलने का साहस नहीं मिल रहा, तो हमें रुककर सोचना होगा. हमें अपने बच्चों को केवल जीवनसाथी चुनना नहीं सिखाना है, बल्कि स्वयं को समझना भी सिखाना है. हमें उन्हें यह भरोसा देना है कि उनका सच, चाहे कितना भी असुविधाजनक क्यों न हो, सुना जाएगा. क्योंकि आखिरकार हत्या किसी एक क्षण में होती है. लेकिन संवाद की मृत्यु उससे बहुत पहले हो चुकी होती है. सबसे अधिक, मुझे वह ना दिखाई देती है जो शायद समय पर कह दी जाती, तो आज दो जिंदगियां बच सकती थीं. क्योंकि कई बार एक ईमानदार ना सबसे बड़ा सामाजिक उत्तरदायित्व होती है.
कोई सुन भी लेता तो...
एक ना जो वक्त पर कह दी गई होती, कई जिंदगियां यूं न ढह गई होतीं... घरों में अगर संवाद की खिड़कियां खुली होतीं, तो जिंदगी आज इस मुहाने पर न होती... डर की चुप्पी से रिश्ते कब संभलते हैं, बात होती... तो शायद कोई और बात होती... चलो, दिए जलाने हैं तो अभिव्यक्ति के जलाएं, जहां ना कहना भी कोई बड़ी बात न होती... ये कैसा जमाना है जहां हर कोई बोलता है, कोई सुन भी लेता तो क्या बात होती...
- कोमल जैन (एमडी) भारतीय जैन संगठन