शिवाजीनगर, 24 जून (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क) भौतिक सुख-सुविधाओं और संपन्नता के बावजूद आज घरों में आपसी संवाद काफी कम हो गया है. पैसा और समृद्धि प्रचुर मात्रा में है, आधुनिक सुविधाएं भी भरपूर हैं, लेकिन इसके बाद भी घर के सदस्यों के बीच बातचीत और संवाद कम होने पर समाज की महिलाओं ने गहरी चिंता और दुख व्यक्त किया है. केतन अग्रवाल हत्याकांड के बाद, इस तरह के संवेदनशील विषय समाज के सभी स्तरों पर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं. इस चर्चा में मुख्य रूप से परिवार की भूमिका, बेटा-बेटियों के साथ माता-पिता का संवाद, घर का खुला माहौल और बच्चों को मिलने वाले संस्कारों को लेकर समाज की महिलाओं ने अपनी राय और विचार साझा किए. दै. ‘आज का आनंद’ के पाठकों के लिए इस चर्चा के मुख्य अंश....
प्यार के साथ कान भी खींचने की अथॉरिटी होनी चाहिए
पेरेंट्स को बच्चों से बचपन से ही दोस्त जैसा व्यवहार करना चाहिए. उनके साथ ज्यादा कठोर नहीं रहना चाहिए. हम घर का ऐसा माहौल बनाएं कि हम हर बात खुलकर साझा कर सकें. जिससे कि अगर वो बच्चे खुलेपन से हमसे बात करेंगे ना, तो वो कभी भी हमसे चोरी नहीं करेंगे. हमें लगेगा कि भाई ठीक है, जो बच्चे कर रहे हैं वो बिल्कुल ठीक है. उसमें हमें भी थोड़ा उनके साथ एडजस्ट करना चाहिए. अगर जो वो कर रहे हैं, अगर हमें ऐसा लगता है कि वो उनके लिए उचित नहीं है फिर हमें उनको समझाना चाहिए. हमारी इतनी शक्ती होनी चाहिए कि हम अपने बच्चों को उनकी गलती पे कान भी खींच सकें. अगर हम उनको प्यार करना जानते हैं, तो कान भी खींचने की अथॉरिटी होनी ही चाहिए. बहुत कम लोग ऐसे हैं कि जो बच्चों से बात नहीं करते हैं. लेकिन, वैसे तो आजकल तो बहुत खुल के, पर काफी एकदम से खुलापन हैं सभी लोगों में. आजकल तो कोई ऐसा बहू-बेटी में कोई अंतर नहीं समझते हैं लोग. बच्चों में भी बिल्कुल खुलेपन से सब चलता है. पर किसी-किसी घर में बड़ों को भी बदलाव करना चाहिए अपने आपको. अभी जो हुआ है वो भविष्य में ना हो. वर्तमान में संस्कार नहीं मिल रहे हैं. संस्कारों की बहुत कमी है. उसका कारण यही है कि आजकल मां-बाप को ही संस्कार नहीं हैं, वो बच्चों को क्या देंगे..? मां-बाप ने ही पहले देखना चाहिए, सीखना चाहिए कि घर में कैसे रहना है. अगर मां-बाप ही बच्चों के सामने झगड़ा करेंगे, फालतू बातें करेंगे, गलत काम करेंगे, उन्होंने खुद ही पहले डिसिप्लिन में रहना बहुत जरूरी है, ये बेहद महत्वपूर्ण है. मोबाईल तो बहुत ज्यादा बतंगड़ बना रहा है. इसलिए हमें अपने बच्चों पे बचपन से ही ध्यान रखना बहुत जरूरी है. वो कहां जाते हैं, किसके साथ बात करते हैं, उनके साथ, उनके पैरेंट्स के साथ हमको रिश्ता रखना चाहिए. क्योंकि संगत का असर भी बहुत गलत पड़ता है बच्चों के ऊपर. पहले अगर बड़े ही पहले संस्कार सीखेंगे, तो ही तो हम सिखाएंगे ना बच्चों को..? हमें ही पता नहीं है राम कौन था और सीता कौन थी, तो हम बच्चों को क्या बताएंगे भाई..?
- गीता जयप्रकाश गोयल, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता
शिक्षा के साथ संस्कार देना हमारा प्रथम कर्तव्य
प्रभुश्री राम की जीवन संगिनी सिया (सीता) आज भी पूजनीय है. उनके आदर्श हमारे जीवन में रिश्तों की मर्यादा को अनन्य साधारण महत्व देते हैं. लेकिन बदलती हुई जीवन शैली में आधुनिक सिया के पास विज्ञान-तंत्रज्ञान आधुनिक जीवन शैली हर तंत्र अमर्याद है. एक क्लिक पर दुनिया की जानकारी उपलब्ध है. किंतु आज भी प्रश्नचिन्ह है कि क्या यही हमारी प्रगति है.. हमारा विकास है..? सच देखा जाए तो प्रगति के साथ-साथ आधुनिक सिया के पास तनावपूर्ण जीवन शैली है. पारिवारिक संबंधों के प्रति अवेिशास है. रिश्तों के प्रति ईर्ष्या, स्वार्थी वृत्ति है. स्नेह और त्याग जैसी वृत्ति का अभाव है और अमानवीय मूल्य के प्रति उसे आकर्षण है, जिसके जीवन में महत्वपूर्ण रिश्तों के प्रति धोखा दगाबाजी और क्रूरता है. श्री राम जी के सिया के पास स्वसंरक्षण के लिए मांत्रिक सामर्थ्य था. आधुनिक सिया के पास तांत्रिक सामर्थ्य है किंतु नैतिक मार्गदर्शन के अभाव में वह उसका दुरुपयोग कर रही है. हमारी आने वाले पीढ़ी को कितना ही हम आधुनिक तंत्रज्ञान प्रदान कर ले साथ में संस्कार, संस्कृति मूल्य की सीख देना उन्हें प्रदान करना नितांत जरूरी है. पारिवारिक संवाद, एक दूसरे के प्रति वेिशास की भावना, एक दूसरे के विचारों को समझना, सत्य को अपनाना भी जरूरी है. शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों को देना, समझाना हमारा प्रथम कर्तव्य है. आज आसमान में हम उड़ान ले सकते हैं, अंतराल में जा सकते हैं, कुशलता से कदमों को रख सकते हैं. लेकिन हकीकत तो यही है की घरौंदे आसमान में नहीं बल्कि जमीं पर बनाए जाते हैं. किसी माता-पिता और परिवार के घर आंगन को वीरान करके हम अपना आशियाना नहीं बना सकते. - नीता अग्रवाल, अध्यक्ष अग्रवाल फेडरेशन महिला समिति
संयुक्त परिवार में संस्कार अच्छे मिलते हैं
इस मामले में तो मतलब वो लड़की भी बोल सकती थी ना लड़के को कि भाई मैं तुमसे शादी नहीं करना चाहती. उसे इतना बड़ा स्टेप नहीं उठाना चाहिए था. जितनी छूट हम लड़कियों को देते हैं, वो थोड़ा ज्यादा हो रहा है. जितना हम पैम्परिंग कर रहे हैं बच्चों को, वो ज्यादा हो रहा है. जो न्यूक्लियर फैमिली का जो सिस्टम है ये बहुत गलत है. फैमिली मतलब संयुक्त परिवार होना चाहिए, जिससे बच्चों को संस्कार अच्छे मिलते हैं. आजकल बच्चे इतने फॉरवर्ड हो गए हैं, कि वो बहुत उम्र से पहले चीजें समझने लगे हैं. तो उनको हम लोग ही गाइड कर सकते हैं. उनके पेरेंट्स इतने बिजी होते हैं, दादा-दादी होते हैं घर में, तो वो लोग गाइड भी कर सकते हैं बच्चों को. पैरेंट्स को इस बात पे ध्यान रखना चाहिए कि अपनी बेटी क्या कर रही है..? उसको थोड़ा तो प्यार से समझाइये या डांट के समझाइये. डांट के तो आजकल चलता ही नहीं है, क्योंकि बच्चे फिर गलत कदम उठा लेते हैं. थोड़ा सा प्यार से समझा के या जिससे वो समझना चाहते है, उन्हें समझाना जरुरी है. - अनिता सुशील जैन, अग्रवाल समाज महिला मंडल, निगडी प्राधिकरण
घर में वेिशास और संवाद का खुला माहौल होना चाहिए
इस मामले में लड़की ने जो किया, वह गलत किया. अगर शादी करनी ही नहीं थी, तो पहले ही साफ-साफ बता देना चाहिए था. उस लड़के की बलि क्यों चढ़ने दी..? और अगर इतना ही सब था, अफेयर था ही, तो उसे डरने जैसी क्या बात थी..? अफेयर करते समय वह नहीं डरी, सगाई यानी शादी तय होते समय नहीं डरी, पहाड़ पर ले जाते समय नहीं डरी, फिर वहां जाकर इतना बड़ा कांड कर दिया. बिल्कुल गलत किया. एक मासूम लड़के की हत्या हो गई..! उसमें उस लड़के का क्या दोष है..? आजकल माता-पिता के पास भी समय नहीं है. पिता भले ही दिनभर बाहर रहते हों, लेकिन मां का यह कर्तव्य है कि वह घर पर, बच्चों पर थोड़ा ध्यान दे. बेटियों को कैसे संभालना है, उसकी कौन सहेलियां हैं, वह बाहर क्या कर रही है..? आजकल की माताओं को खुद पार्टियों से फुर्सत नहीं मिलती.पहले माता-पिता का एक डर होता था, एक मर्यादा होती थी.मुझे लगता है कि बच्चों पर इतना भी बंधन नहीं होना चाहिए, उन्हें आजादी मिलनी चाहिए. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे मनमर्जी बर्ताव करें. माता और पिता दोनों को ही बच्चों के साथ दोस्ती का, एक मित्र जैसा रिश्ता रखना चाहिए.
- विजया सुभाषचंद्र लड्डा, अध्यक्षा, महेश महिला सामाजिक संस्था
मां को अपनी बेटी की सहेली बनना बेहद आवश्यक
एक मंगेतर की हत्या सुनकर बहुत दुख हुआ. मन को धक्का सा लगा. कई सवाल मन में आए कि ये ऐसा क्यों हुआ ऐसा क्यों किया..? पहली बात ऐसा होना नहीं चाहिए था. क्या लड़की के परिवार वालों को उसकी बातें पता नहीं थीं..? ये एक सवालिया निशान है. परिवार को किसी के बेटे की जान बचानी चाहिए थी. परिवार को पता है तो सगाई नहीं करनी थी. और परिवार को पता नहीं था, तो उस लड़की के संस्कार में कमी थी. लड़की को उससे शादी नहीं करनी थी तो बता देती और छोड़ देती. किसी की जिंदगी बर्बाद नहीं करनी थी, किसी के बेटे को खत्म नहीं करना था. ये आपको अधिकार नहीं था. ऐसा करने से आपको भी कुछ नहीं मिला. एक मां-बाप का बेटा खो गया है. उनपे क्या बीतेगी. ये सोचना था. पाश्चात्य संस्कृति में पैरेंट्स, बच्चे सब संस्कार भूल गए हैं. अंधाधुंध, चमचमाती दुनिया में संस्कार कहीं खो गए हैं. मां को अपनी बेटी के साथ बचपन से संस्कार देना चाहिए. बेटी को दोस्त बनाकर रखना चाहिए. ये मां की जिम्मेदारी होती है. आज क्या नई घटना घटित हुई..? यह भी पूछें. ऐसे में बेटी जशर हर बार अपनी मां से शेयर करेगी. बचपन से अगर मां सहेली बन गई तो वो किसी दोस्त को नहीं बताएगी पर मां को हर बात जरूर बताएगी. पहले बचपन से बेटियों को ज्यादा संस्कार दिए जाते थे. घर का काम ज्यादा सिखाया जाता था. पढ़ाई कम होने के बावजूद वो अपने परिवार को संभाल लेती है. शादी भी अपने पसंद से नहीं होती थी. घर में दादा-दादी की चलती थी. आज जमाना बहुत बदल गया. खानपान बदल गया, पर क्या रिश्ता बदलता है..? नहीं, रिश्तों को संजोके रखना होता है. आज शिक्षा ही सब कुछ है, ऐसा सोचने वाली लड़कियां घर परिवार नहीं संभाल सकती. एजुकेशन जरूरी है, पर संस्कार भी जरूरी हैं. मैं सभी से आह्वान करना चाहती हूं कि थोड़े से पहले के कल्चर में रहना सीखेें तो सुखी रहेंगे.
- पुष्पा कटारिया, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता
बेटे-बेटियों की इच्छा जानना बेहद जरूरी
केतन अग्रवाल का यह विषय बेहद गंभीर है. मुझे लगता है कि माता-पिता या अभिभावकों को बेटे या बेटियों की इच्छा के खिलाफ जाकर शादी तय नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह खतरनाक साबित हो सकता है. एक अच्छे घर का लड़का चला गया. उस परिवार और माता-पिता को क्या-क्या सहना पड़ रहा होगा, यह मैं समझ सकती हूं क्योंकि मैं भी एक मां हूं. इस तरह की घटना हमारे समाज में दोबारा नहीं होनी चाहिए. इसके लिए बस इतनी ही सावधानी बरतनी होगी कि माता-पिता बच्चों की मर्जी के खिलाफ जाकर कोई फैसला न लें. अब लड़के-लड़कियां सेल्फ-डिपेंड (आत्मनिर्भर) हो गए हैं. पहले लड़के- लड़कियों को इतना एक्सपोजर भी नहीं मिलता था. अब लड़के-लड़कियों से उनकी इच्छा पूछना बहुत जरूरी है, क्योंकि अब समय बदल रहा है. संस्कार भी दिए जाते हैं. लेकिन ना तो हम पूरी तरह से वेस्टर्न हो गए हैं, और ना ही हम पूरी तरह से अपनी संस्कृति को संभाल पा रहे हैं. यह जो बीच की स्थिति है ना, यह बहुत ही अजीब हो गई है. सोशल मीडिया भी इसकी एक बड़ी वजह है ही. आखिर माता-पिता भी कितना ध्यान रखेंगे..? अब लड़के बाहर जाएंगे, लड़कियां भी बाहर जाएंगी. बस, उनके साथ लगातार बातचीत करते रहना चाहिए. उनसे पूछते रहना चाहिए कि उनके दोस्त कौन हैं, उनसे थोड़ा मिलना-जुलना, वे कैसे हैं. जितना संभव हो सके, उतना करते रहना चाहिए. क्योंकि अब इतना पीछे जाना भी संभव नहीं है. आजकल एक-एक, दो-दो बच्चे होते हैं. फिर हम उनकी सारी इच्छाएं पूरी करते हैं. यह भी एक मुद्दा हो सकता है. कि आजकल उन्हें सब कुछ दिया जाता है, लेकिन पता नहीं वे इसका गलत फायदा उठाते हैं या क्या. हम सभी को मिलकर इसका थोड़ा विरोध करना चाहिए. क्योंकि, आज एक परिवार, एक बेटा चला गया है. समाज को इसका संज्ञान लेकर आगे इस पर कुछ विचार करना चाहिए.
- अमिता अग्रवाल, ट्रस्टी, श्री महालक्ष्मी मंदिर