एक काल्पनिक स्थिति के बारे में साेचिए. सत्ताधारी सरकार जाे लाेगाें की बात सुनने की कला के लिए विशेष ताैर पर नहीं जानी जाती उसने ‘काॅकराेच जनता पार्टी’ की मांगाें काे गंभीरता से लिया है. कल्पना कीजिए कि संबंधित केंद्रीय मंत्री ने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ फिर पा ली और उन्हाेंने इस्तीफा दे डाला. कल्पना कीजिए कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (केंद्रीय परीक्षा एजेंसी) के अधिकारी ईमानदारी और निष्ठा से काम करने लगे हैं.कल्पना कीजिए कि बारंबार की पेपर लीक घटनाएं अतीत की बात हाे गई हैं और नीट जैसी मानकीकृत कर दी गईं परीक्षाएं सुचारु रूप से आयाेजित हाे रही हैं. क्या यह आवश्यक ताैर पर संकेत है कि ऐसी काल्पनिक परिस्थिति में शिक्षा के मुख्य चलन के साथ सब चीज़ें ठीक हाे जाएंगी? इसका साफ जवाब है ‘नहीं’.
असल में, हमें यह समझने के लिए गहराई में जाने की ज़रूरत है कि शिक्षा की माैजूदा संस्कृति में जाे बीमारी व्याप्त है, वह सिर्फ पेपर लीक हाेने या संबंधित अधिकारियाें की गैर-ज़िम्मेदाराना हरकत तक सीमित नहीं है.सर्वप्रथम, अब समय आ गया है कि हममें से कुछ लाेग खुलकर कहें कि नीट, जेईई या सीयूईटी जैसी एमक्यूएम-आधारित मानकीकृत परीक्षाओं का सिद्धांत ही सबसे अधिक समस्या है. असल में, मुझे यह कहने में काेई हिचकिचाहट नहीं है कि इन मानकीकृत परीक्षाओं की तैयारी करने की प्रक्रिया ही दिमाग काे एक खास सांचे में ढाल देती है, साेचने-समझने के दायरे काे सीमित कर देती है और आलाेचनात्मक साेच एवं रचनात्मक कल्पनाशीलता की क्षमता काे कुंद कर देती है. अगर आप ध्यान से देखें ताे, भाैतिकी का छात्र अपने स्कूल की भाैतिकी प्रयाेगशाला में इसलिए जाने से कतराता है क्याेंकि उसे काेचिंग सेंटर के ‘रणनीतिकार’ से पढ़ना औरओएमआर शीट पर जितनी जल्दी हाे सके ‘सही’ जवाब पर टिक लगाने की तकनीक सीखना ज़्यादा भाता है.
जब शिक्षा केवल मानकीकृत परीक्षाओं का प्रशिक्षण बनकर रह जाए ताे विद्यालय जाे कि गहन सीखने-सिखाने की जगह हाेते हैं धीरे-धीरे अप्रासंगिक हाे जाते हैं. वे सभी चीज़ें जाे स्कूली शिक्षा काे जीवंत और आनंदमय बना सकती थीं जैसे कि भाैतिकी और जीव-विज्ञान प्रयाेगशाला में विज्ञान के प्रयाेगाें से पैदा हाेने वाली जिज्ञासा; स्कूल लाइब्रेरी में नई किताबें पढ़ने और उन्हें छूने का बेपनाह आनंद; कक्षा में हाेने वाली गहन चर्चा और बहस; और खेल, संगीत व थिएटर का राेमांच सब अप्रासंगिक हाे जाते हैं. इसके बजाय, जाे बचता है वह है ‘डमी स्कूलाें’ की कठाेर सच्चाई, काेचिंग सेंटराें का दबाव और शारीरिक रूप से थके हुए एवं मानसिक रूप से आहत किशाेराें की बेचैनी, जिन्हें फुटबाॅल खेलने, काेई अच्छा उपन्यास पढ़ने या लंबी सैर पर जाने के लिए शायद ही काेई ‘फालतू’ समय मिल पाता है.
इसके अलावा, बार-बार हाेने वाली अभ्यास परीक्षाएं, जिनसे काेचिंग ‘गुरु’ लगातार छात्राें की ‘गति‘ और ‘काैशल’ मापते हैं, उनके बचपन के सुनहरे सालाें काे बर्बाद कर देते हैं. इसमें काेई हैरानी की बात नहीं है कि वे अपने माता-पिता के सामने अपनी ‘काबिलियत’ साबित करने की कभी न खत्म हाेने वाली चिंता में जीते हैं, मां-बाप के लिए बच्चाें के लिए ‘सफलता’ ही उनकी इज्जत का माेल बन जाती है.असल में, काेई भी समझदार शिक्षक और शिक्षाविद् यही कहेगा कि प्रशिक्षण का यह तरीका एक ऐसी मशीनी और बंधी-बंधाई साेच वाली मानसिकता बनाता है जाे बच्चाें में अस्पष्टताओं, जटिलताओं और बारीक बाताें काे समझने या उनके साथ जीने में पूरी तरह ना काम कर देती है.
सिर्फ इतना ही नहीं, इस बेचैन पीढ़ी काे कई तरह की मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं जैसे कि अवसाद, अकेलापन और आत्महत्या के ख्यालाें का सामना करना पड़ रहा.इस बीच, भारत का ‘स्याह’ शिक्षा तंत्र यानी काेचिंग फैक्टरियां चाेखा धंधा कर रहे हैं.दूसरी बात, भले ही सब कुछ विवादाें से मुक्त लगे, लेकिन सच ताे यह है कि नीट या जेईई जैसी मानकीकृत परीक्षाएं कभी भी निष्पक्ष नहीं हाेतीं. वर्गाें और जातियाें में बंटे हमारे जैसे समाज में, जहां सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक समृद्धि के आधार पर तमाम किस्म की असमानताएं माैजूद हैं, काेई भी मुक़ाबला निष्पक्ष नहीं हाे सकता. यह समझने के लिए किसी काे समाज विज्ञानी हाेने की ज़रूरत नहीं है कि ग्रामीण सरकारी स्कूल के किसी गरीब या निम्न-मध्यम वर्गीय लड़के के मुकाबले, किसी अमीर और ऊंचे रसूख वाले परिवार का बेटा जाे किसी ब्रांडेड काेचिंग सेंटर से खास ट्रेनिंग का खर्च उठा सकता है, वह मुक़ाबला पहले ही जीत चुका हाेता है.
-अविजित पाठक