प्रश्नः जिसके सब अंग विकृत हैं, वह कुब्जा भी कृष्ण की प्रिय गाेपी है. वह किस गुण के कारण कृष्ण काे पाने में सफल हुई?
उसका प्रेम पूरा है और जब भी हाेता है, ताे पूरा हाेता है; आधा नहीं हाेता. इसलिए ताे मैं कहता हूँ ः प्रेम प्रार्थना है. जीवन ने ताे कहाः प्रेम परमात्मा है.अप्रेमी शरीर देखता है, प्रेमी शरीर काे देखता ही नहीं. अगर शरीर दिखता रहे, ताे समझना कि काम-वासना है- प्रेम नहीं. ताे फिर कृष्ण ने भी देखा हाेताः यह कुब्जा, यह ताे सब तरफ से विकृत है, अपंग है, आड़ी-तिरछी है.यह ताे बहुत कुरूप लगी हाेती. लेकिन कृष्ण ताे शरीर काे देख ही नहीं रहे हैं.शरीर ताे ऊपर की खाेल है. जैसे तुम्हारे वस्त्राें काे देखकर काेई तुम्हें इनकार कर दे. वस्त्र ताे तुम नहीं हाे, शरीर भी तुम नहीं हाे. जिसने तुम्हारे शरीर काे देखकर इनकार किया है या शरीर काे देख कर अंगीकार किया है, उसने तुम्हें ताे अभी देखा ही नहीं.यही ताे संसार में प्रेमियाें का कष्ट है.
प्रेमी एक दूसरे से कहते ही रहते हैं कि तुम मुझे अभी समझे नहीं; निरंतर कहतैं. वर्षाें साथ रहते हैं और यही कहते हैं कि तुम मुझे समझे नहीं. ्नया अड़चन है? समझने में ऐसी मुश्किल ्नया है? मुश्किल यही है कि प्रेमी चाहता है कि तुम मेरे शरीर काे मत देखाे, मुझदेखाे. शरीर मैं नहीं हूंॅ. प्रेयसी भी यही चाहती है कि तुम मुझे मत देखाे, मेरे शरीर काे मत देखाे. यह मैं नही हूंॅ.मुझसे जरा पार उठाे, जाे तुम्हें दिखाई पड़ रहा है, उससे जरा भीतर आओ.वहीं मेरा असली हाेना है. तुम बाहर मत अटकाे. लेकिन वह देखती हैः पति का प्रेम शरीर से है. पति देखता है, पत्नी का प्रेम भी शरीर से है, माेह भी शरीर से है, लगाव भी शरीर से है. भीतर काे ताे काई देखता नहीं है, इसलिए तड़फ पैदा हाेती है. और जब तुमने भीतर काे नहीं देखा, तब तक बिलकुल स्वाभाविक पीड़ा है, क्योंकि तब तक प्रेम ताे पैदा हाेता ही नहीं. शरीर का सम्बन्ध है-काम; मन का सम्बन्ध है- माेह; आत्मा का सम्बन्ध है-प्रेम और परमात्मा का सम्बन्ध है-प्रार्थना. ताे कुब्जा पूरी ही आई थी. तुम्हें दिखाई पड़ती है कि उसके सब अंग विकृत हैं, क्योंकि तुम्हारे पास और गहरे देखने की आँख नहीं है.