सड़क दुर्घटनाएं राेकने काेई भी राज्य गंभीर नहीं

    28-Jun-2026
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Accident 
 
सड़क दुर्घटनाओं में लाेगाें की जान बचाने के मामले में काेई भी राज्य गंभीर नहीं है. यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दाैरान सुप्रीम काेर्ट ने किया.काेर्ट ने कहा- सुप्रीम काेर्ट द्वारा जारी पांच निर्देशाें का पालन भी किसी भी राज्याें े नहीं किया. जजाें ने लाेगाें की जान बचाने के लिए राज्याें काे 5 निर्देश दिए थे. जिसमें एक पर भी काम नहीं हुआ.यहां तक कि घायलाें काे राहत देने ‘ट्रामा केयर व्यवस्था’ तक नहीं किया गया.सरकाराें की लापरवाही से सड़काें पर लाेग जान जाेखिम में डालकर चल रहे हैं. पैदल यात्री ताे अब बस राम भराेसे ही सफर कर रहे हैं. दुर्घटनाओं में हर साल लगभग 2 लाख लाेगाें की माैत हाे रही है.
 
पिछले 9 महीनाें में राज्याें और केंद्र शासित प्रदेशाें ने सुप्रीम काेर्ट काे जाे आंकड़े प्रस्तुत किए हैं. उनसे यह स्थिति सामने आई है. शीर्ष अदालत ने सड़क दुर्घटनाओं में जान बचाने के लिए राज्याें काे नाै महत्वपूर्ण कदम उठाने के लिए कहा था. इनमें से पांच सबसे जरूरी उपाय हैं- एक समान आपातकालीन फाेन नंबर, जीपीएस से लैस एंबुलेंस, गुड समैरिटन कानून, ट्राॅमा रजिस्ट्री और बचाव कार्य के लिए तय प्राेटाेकाॅल. ये पांच उपाय दुर्घटना के बाद के गाेल्डन ऑवर यानी पहले 60 मिनट के दाैरान लाेगाें की जान बचाने में बहुत अहम मानी जानी जाती हैं. 26 मई काे सुप्रीम काेर्ट ने अपने आदेश में यह निर्देश दिया था. यह आदेश सड़क सुरक्षा के लिए काम करने वाली दिल्ली स्थित संस्था सेव लाइफ फाउंडेशन की याचिका पर दिया गया था.संस्था ने सभी राज्याें में एक समान ट्राॅमा केयर सिस्टम लागू करने की मांग की थी.
 
अदालत में प्रस्तुत किए गए करीब 1200 पन्नाें के दस्तावेजाें से पता चलता है कि देश में सड़क हादसाें में हाेने वाली हर तीन में से दाे माैते जिन आठ राज्याें में हाेती हैं. वह राज्य हैं- उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, बिहार और आंध्र प्रदेश शामिल हैं. उनमें से 7 राज्याें ने अभी तक अपने सभी इमरजेंसी नंबराें काे एकीकृत कर 112 से नहीं जाेड़ा है. वहीं, कर्नाटक ने इस संबंध में काेई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है. साल 2019 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 112 नंबर काे राष्ट्रव्यापी आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली के रूप में शुरू किया था. जिससे पुलिस, अग्निशमन, मेडिकल, एंबुलेंस, राजमार्ग, महिला आदि सभी इमरजेंसी नंबर शामिल थे. विभिन्न आपात स्थितियाें के लिए इतने सारे नंबर हाेनी की वजह से राष्ट्रव्यापी आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली की कल्पना इसलिए की गई थी, ताकि यह भ्रम दूर हाे सके कि किस नंबर पर काॅल करना है. सड़क पर मदद करने से लाेगाें काे राेकने वाला एक और महत्वपूर्ण पहलू पुलिस या अस्पताल द्वारा पूछताछ और उत्पीड़न का डर है, लेकिन 2024 में हुई 1.77 लाख माैताें में से दाे-तिहाई माैतें आठ राज्याें में हुईं.