माण, 29 जून (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क) मुलशी तहसील के माण स्थित सर्वे नंबर 47/1/ पर विकसित किए जा रहे येलोस्टोन स्काईस्क्रेपर्स एलएलपी के आवासीय प्रोजेक्ट को लेकर मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी के समक्ष पहुंच गया है. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि प्रोजेक्ट में वैध पर्यावरणीय मंजूरी के बिना निर्माण कार्य किया गया और इसके लिए 50 करोड़ से अधिक पर्यावरणीय मुआवजा लगाया जाना चाहिए. यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, वेस्टर्न जोन बेंच, पुणे में ओरिजिनल एप्लीकेशन नंबर 152 ऑफ 2025 के तहत सुनवाई में है. यह याचिका कल्पेश चंद्रकांत यादव ने यूनियन ऑफ इंडिया सहित कई अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ दाखिल की है. याचिकाकर्ता ने आवासीय प्रोजेक्ट में किए निर्माण कार्य की वैधता पर सवाल उठाकर कथित पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. याचिका के अनुसार, प्रोजेक्ट ने 30 अगस्त 2022 को मिली मूल पर्यावरणीय मंजूरी की सीमा से आगे जाकर निर्माण कार्य किया. आरोप है कि इसके लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन यानी EIA Notifi cation, 2006 के तहत जरूरी विस्तार मंजूरी पहले प्राप्त नहीं की गई थी. हालांकि, येलोस्टोन स्काईस्क्रेपर्स एलएलपी ने बाद में महाराष्ट्र की स्टेट एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेस्मेंट अथॉरिटी यानी डएखअअ से 21 मई 2026 को विस्तार पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त की. यह आवेदन 29 दिसंबर 2023 को गालिना कंसल्टेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से जमा किया गया था. याचिकाकर्ता का कहना है कि बाद में मिली विस्तार मंजूरी से पहले किए गए कथित निर्माण को अपने आप वैध नहीं माना जा सकता. याचिका में यह जांच करने की मांग की गई है कि क्या मूल मंजूरी की सीमा से अधिक निर्माण कार्य पूर्व पर्यावरणीय अनुमति के बिना किया गया था. मामले में प्रोजेक्ट के डिजाइन में किए गए बदलावों पर भी सवाल उठाए गए ह्ैं. ट्रिब्यूनल के समक्ष रखे गए दस्तावेजों के अनुसार, 13 दिसंबर 2023 को संशोधित स्वीकृत नक्शे और संशोधित कमेंसमेंट सर्टिफिकेट जारी किए गए थे. वहीं, 22 फरवरी 2024 को कुछ टॉवरों की बढ़ी हुई ऊंचाई के लिए संशोधित फायर सेफ्टी अनुमति दी गई थी. याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि क्या इन बदलावों को लागू करने से पहले पर्यावरणीय मंजूरी जरूरी थी. याचिका में निर्माण की वैधता को चुनौती देने के साथसाथ भारी पर्यावरणीय मुआवजे की मांग भी की गई है. याचिकाकर्ता का दावा है कि कथित उल्लंघन गंभीर हैं और पर्यावरणीय नियमों के तहत सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए्.दूसरी ओर, येलोस्टोन स्काईस्क्रेपर्स एलएलपी ने ट्रिब्यूनल में दाखिल अपने जवाब में सभी आरोपों से इन्कार किया है. डेवलपर का कहना है कि प्रोजेक्ट सक्षम प्राधिकरणों से मिली मंजूरियों के अनुसार ही विकसित किया गया है. कंपनी ने यह भी दलील दी है कि 21 मई 2026 को विस्तार पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के बाद याचिका निरर्थक हो जाती है और सभी निर्माण कार्य कानून के अनुरूप किए गए हैं.
दस्तावेजी प्रमाण पेश नहीं किए गए डेवलपर ने याचिकाकर्ता के लोकस स्टैंडी पर भी सवाल उठाया है. कंपनी के अनुसार, याचिकाकर्ता वडगांव शेरी में रहते हैं, जो प्रोजेक्ट स्थल से लगभग 26 किलोमीटर दूर है. डेवलपर ने यह भी आरोप लगाया है कि याचिकाकर्ता ने पुणे में बिल्डरों और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के खिलाफ कई इसी तरह की शिकायतें दाखिल की हैं. येलोस्टोन स्काईस्क्रेपर्स एलएलपी ने यह भी कहा है कि प्रोजेक्ट में Moving Bed Biofilm Reactor (MBBR) तकनीक पर आधारित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाया गया है. कंपनी का दावा है कि प्रोजेक्ट परिसर में कोई बोरवेल नहीं है, इसलिए सेंट्रल ग्राउंड वाटर अथॉरिटी से अनुमति की आवश्यकता नहीं है. डेवलपर ने 50 करोड़ से अधिक पर्यावरणीय मुआवजे की मांग का भी विरोध किया है. कंपनी का कहना है कि इस राशि को सही ठहराने के लिए कोई स्पष्ट गणना या दस्तावेजी प्रमाण पेश नहीं किए गए हैं.