इबाेला महामारी काे राेकने हेतु व्यवस्था काे न्यायपूर्ण बनाना हाेगा

    05-Jun-2026
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कांगाे नदी दुनिया की विशाल और गहरी नदियाें में गिनी जाती है. इसके एक किनारे पर कांगाे गणराज्य की राजधानी ब्राजाविल बसी है, ताे दूसरी तरफ कांगाे लाेकतांत्रिक गणराज्य की राजधानी किंशासा. दुनिया में यह अनाेखा दृश्य कहीं और नहीं मिलता, जहां दाे राष्ट्रीय राजधानियां एक-दूसरे के ठीक सामने स्थित हाें. किंशासा की ऊंची इमारतें पहली नजर में किसी आधुनिक वैश्विक महानगर का आभास देती हैं, लेकिन यह दुनिया के सबसे गरीब, संघर्षरत और अस्थिर देशाें में से एक की राजधानी भी है. इसी देश और इसके पड़ाेसी युगांडा में एक बार फिर इबाेला महामारी उभरी है, जिसके कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घाेषित किया है.
 
इबाेला के वैश्विक महामारी बनने की अभी आशंका नहीं है. यह गंभीर बीमारी ताे है, लेकिन यह एक से दूसरे इंसान में तभी फैलती है, जब पहले वाले व्य्नित में इसके लक्षण माैजूद हाें. इसीलिए भारत या अन्य अप्रभावित देशाें काे तत्काल काेई बड़ा खतरा नहीं है, किंतु बड़ा सवाल यह है कि महामारी से निपटने की तैयारी, वैश्विक सहयाेग व स्वास्थ्य सुरक्षा पर लगातार चर्चा के बावजूद इबाेला राेग बार-बार क्यों लाैट आता है? इसका उत्तर सिर्फ चिकित्सा विज्ञान में नहीं, बल्कि राजनीति, अर्थव्यवस्था और वैश्विक असमानताओं में भी छिपा है. कांगाे लाेकतांत्रिक गणराज्य प्राकृतिक संसाधनाें, खनिजाें व दुर्लभ धातुओं से अत्यंत समृद्ध देश है. दुनिया की आधुनिक तकनीकी व इले्नट्राॅनिक अर्थव्यवस्था जिन खनिजाें पर निर्भर है, उनमें से कई का स्राेत यही क्षेत्र है. मगर इस संपदा की कीमत स्थानीय समाज और पर्यावरण चुका रहे हैं.
 
खनन, जंगलाें की कटाई और प्राकृतिक आवासाें के लगातार बढ़ते अतिक्रमण ने मनुष्याें व जंगली जीवाें के बीच की दूरी काे कम कर दिया है. नतीजतन, मनुष्य ऐसे राेगजनकाें के संपर्क में आ रहे हैं, जाे पहले केवल वन्य- जीवाें तक सीमित थे. वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि पर्यावरण विनाश और संसाधनाें का अनियंत्रित दाेहन नई महामारियाें के उभरने के बड़े कारण बन सकते हैं.इबाेला उसी व्यापक संकट का हिस्सा है.अफ्रीका के कई देश पिछले दशकाें में नए संक्रमणाें और उभरती बीमारियाें के केंद्र रहे हैं. इबाेला इनमें से सबसे भयावह बीमारियाे में से एक है. यह ऐसी बीमारी बन चुकी है, जिसके कारण सबसे अधिक बार वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घाेषित करना पड़ा है.
 
हालांकि, सवाल यह भी है कि यदि दुनिया हर बार इसके कारण स्वास्थ्य आपातकाल घाेषित करती है, ताे फिर इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं निकालती? कारण यह है कि संकट आने पर वैश्विक स्वास्थ्य संस्थाएं तेजी से सक्रिय हाे जाती हैं, लेकिन संकट काे स्थायी रूप से राेकने के लिए वे आवश्यक निवेश नहीं करतीं. जिन देशाें में बार-बार इबाेला महाराेग फैलाता है, वहां स्वास्थ्य व्यवस्थाएं पहले से लचर हैं. प्रयाेगशालाएं सीमित हैं. स्वास्थ्यकर्मियाें की भारी कमी है. ग्रामीण क्षेत्राें तक स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच पा रहीं. और, कई क्षेत्राें में जातीय संघर्ष व राजनीतिक अस्थिरता बनी रहती है. ऐसे में, जब इबाेला महामारी फैलाती है, तब दुनिया अचानक चिंतित उठती है. अंतरराष्ट्रीय टीमें पहुंचती हैं, फंड जारी किए जाते हैं, पर जैसे ही संक्रमण कम हाेता है, दुनिया का ध्यान हटने लगता है. कुछ वर्षाें बाद यही चक्र फिर से चलता है- स्वास्थ्य आपातकाल, अस्थायी सक्रियता और विस्मृति.
 
यह केवल इबाेला की कहानी नहीं है. यह वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था की उस प्रवृत्ति काे दर्शाता है, जिसमें गरीब देशाें काे प्रभावित करने वाली बीमारियाें काे तब तक गंभीरता से नहीं लिया जाता, जब तक कि वे अमीर देशाें की सीमाओं में नहीं पहुंच जातीं. ‘मंकी पाॅ्नस’ इसका हालिया उदाहरण है. वर्षाें तक यह बीमारी अफ्रीकी देशाें में सीमित रूप से फैलती रही, पर जैसे ही 2022 में इसके मामले यूराेप और उत्तर अमेरिका में दिखने लगे, अंतरराष्ट्रीय चिंता अचानक बढ़ गई. प्रश्न यह नहीं है कि मंकी पाॅ्नस काे गंभीरता से क्यों लिय गया? प्रश्न यह है कि दुनिया तब तक क्यों प्रतीक्षा करती रही, जब तक बीमारी अमीर देशाें तक नहीं पहुंच गई? इबाेला राेग वैश्विक स्वास्थ्य शासन की संस्थागत सीमाओं काे भी उजागर करता है. इसके लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की अ्नसर निंदा की जाती है, पर असल समस्या कहीं गहरी है. दुनिया यह अपेक्षा ताे करती है कि डब्ल्यूएचओ वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा का नेतृत्व करे, पर उसे पर्याप्त संसाधन और श्नित देने की पहल नहीं करती.
 
डब्ल्यूएचओ का बड़ा हिस्सा दुनिया के अमीर देशाें की स्वैच्छिक फंडिंग पर निर्भर है. उन देशाें की प्राथमिकताएं समय और नई सरकाराें के साथ बदलती रहती हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन चेतावनी दे सकता है, समन्वय कर सकता है, तकनीकी मदद दे सकता है, पर देशाें काे दीर्घकालिक निवेश के लिए बाध्य नहीं कर सकता.यह बहस तब और अहम हाे जाती है, जब महामारी संधि, राेगजनक साझा करने व भविष्य की तैयारी पर चर्चा हाे रही हाे. कई निम्न और मध्यम आय वाले देश अब पूछने लगे हैं कि यदि वे राेगजनकाें और जैविक नमूनाें की मार झेलते हैं, ताे ्नया उन्हें वै्नसीन, तकनीक और उत्पादन क्षमता तक समान पहुंच मिल सकेगी? काेविड-19 ने बताया था कि संकट के समय वैश्विक समानता के दावे कितने कमजाेर पड़ जाते हैं.इसी बीच, वैश्विक स्वास्थ्य वित्त-पाेषण में बढ़ती अनिश्चितता ने व्यवस्थागत संवेदनशीलता काे और उजागर किया है. अमेरिका सहित कई देशाें द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमाें में आर्थिक कटाैती ने साफ किया है कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा कुछ चुनिंदा देशाें और फाउंडेशनाें पर निर्भर है. -चंद्रकात लहारिया