दाे मित्राें के महत्वपूर्ण डायलाॅग से गीता अनूठी

    07-Jun-2026
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Osho 
 
कृष्ण और अर्जुन के बीच जाे संबंध है, वह गुरु और शिष्य का नहीं, दाे मित्राें का है. दाे मित्राें का संबंध और गुरु शिष्य के संबंध में बड़े फर्क हैं. और इसीलिए कृष्ण गुरु की भाषा में नहीं बाेल रहे हैं, एक मित्र की भाषा में बाेल रहे हैं. वे सभी बातें अर्जुन काे कह रहे हैं, जैसे वे अर्जुन काे परसुएड कर रहे हैं, ुसला रहे हैं, राजी कर रहे हैं. उसमें आदेश नहीं है, उसमें आज्ञा नहीं है. एक मित्र एक दूसरे मित्र काे राजी कर रहा है, समझा रहा है.उसमें कृष्ण ऊपर खड़े हाेकर अर्जुन काे आज्ञा नहीं दे रहे हैं, साथ खड़े हाेकर अर्जुन से चर्चा कर रहे हैं. यह दाे गहरे मित्राें के बीच संवाद है.
 
निश्चित ही, कृष्ण गुरु हैं और अर्जुन शिष्य है, लेकिन उनके बीच संबंध दाे मित्राें का है. इस मित्रता के संबंध के कारण गीता में जाे वार्तालाप है, जाे डायलाग है, वह न कुरान में है, न बाइबिल में है; वह न धम्मपद में है,न जेन्दअवेस्ता में है डायलाग, वार्तालाप, दाे मित्र निकट से बातें कर रहे हैं. न अर्जुन काे भयभीत हाेने की जरूरत है कि वह गुरु से बाेल रहा है, न गुरु काे जल्दी है कि वह मार्ग पर लगा दे अर्जुन काे. दाे मित्राें की चर्चा है. इस मित्रता की चर्चा से जाे नवनीत निकलेगा, उसका बड़ा मूल्य हैं.गहरे में ताे अर्जुन शिष्य है, उसे इसका काेई पता नहीं. वह पूछ रहा है, प्रश्न कर रहा है, जिज्ञासा कर रहाहै, वे शिष्य के लक्षण हैं. लेकिन वे लक्षण अचेतन हैं.
 
अर्जुन ऐसे ही पूछ रहा है, जैसे एक मित्र से मुसीबत में सलाह ले रहा है. उसे पता नहीं कि वह शिष्य हाेने के रास्ते पर चल पड़ा. सच ताे यह है कि जाे उसने पूछा था, उसने कभी साेचा भी न हाेगा कि उसके परिणाम में जाे कृष्ण ने कहा, वह कहा जाएगा.अर्जुन ने ताे इतना ही पूछा था कि मेरे प्रियजन हैं, संबंधी है, मित्र है, नाते-रिश्तेदार है, सभी मेरे परिवार के लाेग हैं, इस तरफ भी, उस तरफ भी. हम सब बंटकर खड़े हैं, एक बड़ा कुटुंब. उस तरफ मेरे गुरु हैं, पूज्य भीष्म हैं. यह सब संघर्ष पारिवारिक है; यह हत्या अकारण मालूम पड़ती है. ऐसे राज्य काे पाकर भी मैं क्या करूंगा, जिसमें मेरे सभी संबंधी और मित्र नष्ट हाे जाएं? ताे ऐसा राज्य ताे त्याग देने याेग्य लगता है.अर्जुन के मन में वैराग्य का उदय हुआ है. वह उदय भी माेह के कारण ही हुआ है. अगर वह वैराग्य माेह के कारण न हाेता, ताे कृष्ण काे गीता कहने की जरूरत न हाेती; अर्जुन विरागी हाे गया हाेता. जाे वैराग्य माेह के कारण पैदा हाेता है, वह वैराग्य है ही नहीं. वह केवल वैराग्य की भाषा बाेल रहा है. इस दुविधा के कारण गीता का जन्म हुआ.