बारीश हाेने के बाद मलेरीया के मामले तेजी से बढ़े हैं. चिकित्सकाें के अनुसार, सभी मरीजाें काे अस्पताल में भर्ती हाेने की जरूरत नहीं हाेती लेकिन इस बीमारी का शाॅक सिंड्राेम मरीजाें की जान पर पड़ रहा है.
्नया है शाॅक सिंड्राेम : एम्स के मेडीसिन विभाग के प्राेफेसर आशुताेष बिश्वास के मुताबिक, शाॅक सिंड्राेम में डेंगू का मरीज बेचैन हाे जाता है और तेज बुखार के बावजूद त्वचा ठंडी महसूस हाेती है. मरीज धीरे-धीरे हाेश खाेने लगता है. नाड़ी कभी तेज ताे कभी धीरे चलती है. रक्तचाप एकदम कम हाे जाता है. इससे मरीज शाॅक में चला जाता है और महत्वपूर्ण अंगाें में रक्त संचार कम हाे जाता है. इसमें पेशाब भी कम आता है.
प्लाज्मा लीक भी जानलेवा : डेंगू में मरीज की प्लेटलेट्स की संख्या पर निगरानी से ज्यादा जरूरी हेमेटाेक्रिट और ब्लडप्रेशर की निगरानी है. प्लाज्मा लीक हाेना जानलेवा हाे सकता है. हेमेटाेक्रिट रक्त में लाल रक्त काेशिकाओं की मात्राका प्रतिशत है. पुरुषाें के लिए यह 45% और महिलाओं के लिए 40% हाेता है. हेमेटाेक्रिट बढ़ना यह बताता है कि कैपिलरी से खून में माैजूद प्लाज्मा का रिसाव हाेने लगा है. कैपिलरी वे रक्तवाहिनियां हाेती हैं, जिनकी दीवार डेंगू में अधिक छिद्रदार हाे जाती है.इस कारण खून का द्रव (प्लाज्मा) रिसकर शरीर में ही आसपास जमा हाेने लगता है.
प्लेटलेट्स बढ़ाना काफी नहीं : डेंगू के इलाज का मतलब केवल प्लेटलेट्स बढ़ाना नहीं है. जान तभी बचेगी जब मरीज का रक्तवाहिनियाें में लीक ठीक हाेगा. मच्छर के काटे जाने के तीन से पांच दिनाें बाद डेंगू बुखार के लक्षण दिखने लगते हैं. मरीज काे तरल पदार्थ जरूर देते रहें.
एम्स में डेंगू मृत्युदर 10 फीसदी : प्राेफेसर आशुताेष बिश्वास के मुताबिक, 10 साल के आंकड़ाें के अध्ययन से पता चला है कि एम्स में डेंगू से मृत्युदर सात से 10 फीसदी है. राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा दाे फीसदी से भी कम है.उन्हाेंने कहा, कई मामलाें काे अस्पताल तब लाया जाता है जब उनकी हालत बेहद नाजुक हाे चुकी हाेती है.यहां दूसरे अस्पतालाें से रेफर गंभीर मरीज भी आते हैं.