जजाें के हजाराें पद खाली, ताे कराेड़ाें केसाें का निपटारा कैसे?

    08-Jun-2026
Total Views |
 

thoughts 
 
न्याय में विलंब सबसे बड़ा अन्याय है. इससे जनता के संवैधानिक अधिकाराें का संगठित हनन हाेता है. साेशल मीडिया में ट्रेंडिंग काॅकराेच विवाद की जड़ में न्यायिक व्यवस्था की बदहाली के प्रति लाेगाें की निराशा और गुस्सा झलक रही है. ऐसे में, झारखंड और दुसरे राज्याें से जुड़े मामले में सुप्रीम काेर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ का फैसला उम्मीद बढ़ाता है. अनुच्छेद 142 के तहत जारी गाइडलाइंस के अनुसार हाईकाेर्ट में सुनवाई के बाद सुरक्षित मामलाें में जजाें काे तीन महीने के भीतर फैसला देना हाेगा.चीफ जस्टिस ने जिस दिन यह फैसला सुनाया, उसी दिन जस्टिस मनाेज मिश्रा ने दाेहरे हत्याकांड के मामले में ऑर्डर रिजर्व रखने के 15 महीने बाद लिखित फैसला जारी किया है.
 
आवारा कुत्ताें के मामले में 109 दिन बाद और बिहार में एसआईआर मामले में सुनवाई खत्म हाेने के 118 दिन बाद सुप्रीम काेर्ट के फैसले आये हैं, वर्ष 2015 की रिपाेर्ट के अनुसार सुप्रीम काेर्ट के 487 फैसलाें में से 38 फीसदी मामलाें में आदेश रिजर्व रखने के एक महीने के बाद लिखित फैसला आया. गाैरतलब है कि 2जी घाेटाले में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा के मामले में 433 दिन बाद लिखित फैसला आया था.संविधान के अनुसार किसी भी व्य्नित काे 48 घंटे से ज्यादा बेवजह हिरासत या जेल में रखना गलत है. इसलिए जमानत के मामलाें की सुनवाई और फैसलाें में विलंब से लाेगाेंं के संवैधानिक अधिकाराें का उल्लंघन हाेने के साथ जेलाें में भीड़ भी बढ़ रही है. जिला अदालताें में कुल 4.92 कराेड़ मामले लंबित हैं.
 
जिनमें 3.8 कराेड़ आपराधिक मामले हैं. इन मामलाें में जेलाें में बंद अधिकांश आराेपी गरीब और अशिक्षित हैं. जबकि अभियाेजन की तरफ से पुलिस सरकारी खर्चे पर मुकदमे लड़ती है. सुप्रीम काेर्ट के नये फैसले के अनुसार सिविल और क्रिमिनल, दाेनाें तरह के मुकदमाें में तीन महीने के भीतर लिखित फैसला जारी हाेना चाहिए. जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन या अधिकतम अगले दिन सुनाकर उसे हाईकाेर्ट की वेबसाइट पर अपलाेड किया जाना चाहिए. काेर्ट का आदेश जेल प्रशासन तक तुरंत पहुंचे, जिससे आराेपी की उसी दिनरिहाई हाे सके. सुप्रीम काेर्ट ने 25 साल पहले अनिल राय बनाम बिहार सरकार और उसके बाद अनेक अन्य फैसलाें से लिखित फैसला जारी करने की समय-सीमा निर्धारित की थी. सुप्रीम काेर्ट और हाईकाेर्ट के चीफ जस्टिस काॅन्फ्रेंस की 1989-90 की रिपाेर्ट में कहा गया था कि सुनवाई खत्म हाेने के छह सप्ताह के भीतर लिखित फैसला जारी हाेना चाहिए.
 
सिविल प्राेसिजर काेड (सीपीसी) के अनुसार सुनवाई खत्म हाेने के 30 दिन के भीतर आदेश जारी हाेना चाहिए.विशेष मामलाें में यह अवधि 60 दिन हाे सकती है. पुरानी सीआरपीसी में इस बारे में स्पष्ट प्रावधान नहीं थे. लेकिन नये भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस)के अनुसार सुनवाई खत्म हाेने के 45 दिन के भीतर आदेश जारी हाेना चाहिए. नये क्रिमिनल कानून के अनुसार सरकार का यह दावा है कि मुकदमाें का फैसला तीन साल के भीतर हाे जायेगा. लेकिन मुकदमाें के बढ़ते बाेझ और जजाें की टिप्पणियाें से यह साफ है कि अदालतें जल्द न्याय देने की संवैधानिक जिम्मेदारी काे पूरा करने में विफल हाे रही हैं. जमानत के फैसलाें में विलंब से अनुच्छेद-21 में मिले संवैधानिक अधिकाराें का हनन हाेता है. संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम काेर्ट के फैसले बाध्यकारी हाेते हैं.
 
दिवानी और फाैजदारी कानूनाें में स्पष्ट प्रावधानाें के बावजूद संवैधानिक अदालताें में फैसलाें में विलंब के मामलाें का बढ़ना चिंताजनक है. सुप्रीम काेर्ट के पूर्व जज संजय किशन काैल ने कहा था कि अदालताें में लंबी बहस की वजह से मुकदमाें का बाेझ बढ़ रहा है. इस साल सुप्रीम काेर्ट ने एसओपी के माध्यम से मानक प्रक्रिया निर्धारित की है. उसके तहत वकीलाें काे बहस के बिंदुओं का समरी नाेट देने के साथ सीमित समय में बहस पूरा करना जरूरी है. लेकिन हकीकत में भारी-भरकम चार्जशीट और लंबी बहस के बाद जजाें के जटिल फैसलाें से मुकदमाें का अंबार बढ़ रहा है. हाईकाेर्ट में 325 पद और जिला अदालताें में 4,721 जजाें के पद खाली हैं. इसलिए विविध आयाेग की रिपाेर्ट के अनुसार जजाें की संख्या बढ़ाने की बजाय रिक्त पदाें की भर्ती जरूरी है. पश्चिम बंगाल के चुनाव में मतदाता सूची से जुड़े लाखाें विवादाें के निपटारे के लिए सुप्रीम काेर्ट के आदेश के बाद जजाें की नियुक्ति हुई थी.
 
अब जमानत से जुड़े मामलाें में जल्द सुनवाई और फैसलाें के साथ बेगुनाह अंडरट्रायल्स की रिहाई के लिए छुट्टियाें के दाैरान जजाें काे विशेष न्यायिक अभियान चलाने की जरुरत है. सुप्रीम काेर्ट के पूर्व जज रवींद्र भट्ट के अनुसार न्याय में देरी से अदालताें के प्रति लाेगाें का भराेसा कमजाेर हाे रहा है. सुनवाई और फैसलाें में विलंब का खामियाजा अधिकांशत: कमजाेर वर्ग के लाेगाें काे भुगतना पड़ता है.न्यायिक फैसलाें में विलंब के पीछे न्याय काे प्रभावित करने वाले दूसरे कारण भी हाे सकते हैं. पंजाब-हरियाणा हाईकाेर्ट में फैसला जारी हाेने में विलंब के मामले में स्टेनाें की डायरी जब्त करने के लिए सुप्रीम काेर्ट ने आदेश दिया था. दिल्ली हाईकाेर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के बंगले में नाेटाें के बाेराें के जलने के बाद न्यायपालिका के प्रति लाेगाें का भराेसा कमजाेर हुआ है. - विराग गुप्ता, सुप्रीम काेर्ट के वकील