डे-केयर में राेते हुए बच्चे काे देखभाल के सबसे पुराने तरीकाें से शांत किया जाना चाहिए : जैसे कि धीमी और प्यार भरी आवाज, प्यार से छूना, गाेद में लेना, ध्यान भटकाना और शायद काेई गाना सुनाना. पर, खबराें के मुताबिक, बंगलुरू के एक डे-केयर में बच्चाें काे राेने पर सजा दी जाती थी. वायरल वीडियाे में कथित ताैर पर दाे साल तक के बच्चाें काे बाथरूम में बंद करने, वाॅशिंग मशीन और पानी के पाइपाें में धकेलने और टाॅयलेट जेट से उन पर पानी की बाैछार करने जैसी हरकतें दिखाई दीं.
इस मामले में देखभाल करने वाले पांच लाेगाें के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है और डे-केयर काे बंद कर दिया गया है. इसमें डरावनी बात सिर्फ क्रूरता ही नहीं, बल्कि वह जगह भी है, जहां यह सब हुआ. यह क्रेच (बच्चाें की देखभाल का केंद्र) भारत की टेक्नाेलाॅजी राजधानी के एक काॅरपाेरेट कैंपस के अंदर था. इसका मकसद माता- पिता काे भराेसा दिलाना था कि अपने बच्चे काे यहां छाेड़ें और अपना भविष्य बनाने में जुट जाएं. लेकिन, वह भराेसा अब टूट गया है. इसने ‘दाेहरी आय’ वाले परिवाराें की लागत काे लेकर एक बड़ी चिंता पैदा कर दी है.
शहरी मध्यवर्गीय परिवाराें में माता-पिता दाेनाें का काम करना महज एक चाहत नहीं, बल्कि गुजारे के लिए जरूरी हाेता है.
महिलाओं का काम उनकी गरिमा, आजादी और तर्नकी के लिए भी बहुत जरूरी है. बच्चाें की देखभाल के लिए भराेसेमंद इंतजाम न हाेने की वजह से महिलाओं की आर्थिक भागीदारी सीमित रहती है; इसीलिए क्रेच का महत्व तेजी से बढ़ रहा है. फिर भी, इस निजी समझाैते का सार्वजनिक असर हाेता है. जब माता-पिता लंबे समय तक काम करते हैं, ताे बच्चे दिनभर दूसराें के भराेसे रहते हैं. साथ न हाेने पर बच्चाें के प्रति माता-पिता का स्नेह सिर्फ प्रबंधन बनकर रह जाता है. परवरिश बस सप्ताहांत की गतिविधि बन जाती है, जिसमें भी रुकावट आती रहती है. यह राेजमर्रा की भावनात्मक जिंदगी काे कमजाेर करता है.
बच्चाें काे ऐसे माता-पिता चाहिए, जाे हमेशा उनके लिए माैजूद हाें. उन्हें राेजमर्रा की साधारण चीजाें की जरूरत हाेती है-जैसे बिना फाेन के खाना खाना, ऐसी कहानियां, जिन्हें बार-बार सुनने का मन करे, झगड़ाें काे ठीक से सुलझाना, सवालाें के जवाब पाना और सुरक्षित नींद. बचपन के शुरुआती दाैर में ही बच्चाें का विकास सबसे तेजी से हाे रहा हाेता है. यूनिसेफ बचपन के शुरुआती समय काे बहुत जरूरी मानता है, जिसमें पाेषण, सुरक्षा, शुरुआती सीख और सही देखभाल की जरूरत हाेती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ के मुताबिक, पाेषण, बढ़त और विकास में शुरुआती 1,000 दिनाें की भूमिका बहुत अहम है.
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 के आंकड़ाें से पता चलता है कि पांच साल से कम उम्र के 29.3 प्रतिशत बच्चे उम्र के हिसाब से कम लंबाई वाले, 19.0 प्रतिशत बच्चे लंबाई के हिसाब से कम वजन वाले और 31.8 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले हैं. बच्चे का विकास जुड़ाव, स्पर्श, लय, भाषा व भावनात्मक स्थिरता से भी हाेता है.
पिछले कुछ दशकाें में, कई समाजाें व देशाें ने बच्चाें की देखभाल काे निजी व्यवस्था के बजाय सामाजिक बुनियादी ढांचे के ताैर पर देखना शुरू कर दिया है. यूनिसेफ ने शिशु देखभाल केंद्र और माता-पिता की छुट्टी काे परस्पर जुड़ी हुई नीतियाें के ताैर पर पेश किया है, यानी बच्चाें काे देखभाल की जरूरत हाेती है, और बड़ाें काे काम व निजी जिंदगी के बीच संतुलन की. कई यूराेपीय देशाें ने मान लिया है कि बच्चाें की देखभाल की जिम्मेदारी सिर्फ मां अकेले नहीं उठा सकती, लेकिन भारत इसे अब भी टाल रहा है. ये नीतियां बताती हैं कि देखभाल सिर्फ मां की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि माता-पिता, दाेनाें का फर्ज है. ये नीतियां नियाेक्ताओं काे भी बताती हैं कि कर्मचारी सिर्फ उत्पादकता की एक मशीन या इकाई नहीं है. इसीलिए, बंगलुरू के मामले काे अपवाद मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसे शहरी देखभाल के कमजाेर ढांचे के बारे में एक चेतावनी के ताैर पर देखा जाना चाहिए.
भारत के शहरी वर्गाें ने ‘दाेहरी आय’ माॅडल ताे अपना लिया है, लेकिन देखभाल की वह व्यवस्था नहीं बनाई, जाे इसे मानवीय बनाती है. भारत में बच्चाें की देखभाल से जुड़े नियम कमजाेर हैं. हमारे यहां घरेलू कामगार बच्चाें की परवरिश कर रहे हैं, जिनके अपने बच्चाें की शायद ठीक से देखभाल नहीं हाे रही है. हमारे यहां कई माता-पिता बच्चाें काे पर्याप्त समय, प्यार और देखभाल नहीं दे पाते, पर उनके मनाेरंजन के लिए महंगे खिलाैने, माेबाइल या दूसरे साधन जरूर खरीद देते हैं.
एक और पहलू है-पेशेवर व्यक्ति के समय काे कीमती माना जाता है, लेकिन बच्चाें की देखभाल करने वाले के समय काे अक्सर नहीं. देखभाल करने वाली कई महिलाएं कम वेतनभाेगी हाेती हैं, जिन्हें बच्चाें के शुरुआती विकास, व्यवहार से जुड़ी परेशानियाें या बिना हिंसा के अनुशासन सिखाने के बारे में बहुत कम औपचारिक ट्रेनिंग मिली हाेती है. पर इससे उनके दुर्व्यवहार काे सही नहीं ठहराया जा सकता. दुर्भाग्यवश, आज भी भारत में शारीरिक सजा काे सामान्य माना जाता है. बच्चाें की देखभाल काे सुरक्षा के लिहाज से अहम सेवाओं की तरह ही गंभीरता से विनियमित किया जाना चाहिए. पहला, काॅरपाेरेट सुविधाओं समेत हर क्रेच और डे-केयर का रजिस्ट्रेशन, जांच और ऑडिट हाेना जरूरी है. दूसरा, बच्चाें की देखभाल करने वालाें काे बेहतर वेतन और उचित औपचारिक प्रशिक्षण मिलना चाहिए.
तीसरा, नियाे्नताओं काे शिशु देखभाल काे एक सुविधा के रूप में देखना बंद करना हाेगा.
-डाॅ. चंद्रकांत लहारिया