मेडिकल साइंस और आयुर्वेद में बुनियादी भेद है

    14-Jul-2026
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पश्चिम के चिकित्साशास्त्र का नाम है- 'मेडिकल साइंस'. इसका मतलब होता है- औषधि-विज्ञान. पूरब में हमने जो औषधि-विज्ञान बनाया, उसको नाम दिया है आयुर्वेद. औषधि का नाम नहीं दिया- आयु का विज्ञान. और विज्ञान भी नहीं वेद-विधायक. औषधि तो नकारात्मक है. बीमारी हो तो औषधि का उपयोग है. बीमारी न भी हो तो भी आयुर्वेद का उपयोग है. क्योंकि वह केवल जीवन का विज्ञान है. वह सिर्फ बीमारी की फिक्र नहीं करता कि बीमारी हो तो औषधि देकर मिटा दो. बीमारी न भी हो, तो जीवन को कैसे गुणनफल करो, जीवन को कैसे बढ़ाओ !
 
पूरब और पश्चिम की दृष्टि में ये फर्क है. पश्चिम फिक्र करता है कांटा निकाल लेने की. पूरब फिक्र करता है फूल को भी रख देने की. पश्चिम फिक्र करता है दुख निकाल लो, पूरब फिक्र करता है आनंद को जन्माओ. दुख को निकाल लेना काफी नहीं है. दुख भी न हो जीवन में तो भी जरूरी थीड़ी' है कि आनंद हो. कितने लोग हैं जिनके जीवन में दख नहीं है. लेकिन इससे क्या आनंद होता है? बल्कि सच्चाई यह है कि जिनके जीवन में दुख नहीं है उनको ही पता चलता है कि जीवन बिल्कुल व्यर्थ है. जिनके जीवन में दुख है उनको तो अभी आशा लगी रहती है कि कुछ उपाय करेंगे, दुख मिटायेंगे, कल सब ठीक हो जायेगा. जिनके जीवन में दुख नहीं रहा, वे एकदम चौंक के पूछते हैं, अब क्या करें? दुख भी नहीं रहा जिसको मिटाते वह भी नहीं रहा मिटाने की दौड़ भी समाप्त हो गई, कोई कष्ट नहीं है, लेकिन आनंद भी नहीं है. उनका जीवन बड़ी उदासी से, बड़ी ऊब से भर जाता है. जीवन राख राख हो जाता है. उसमें से सारी आशा और आनंद का अंगार बड़ा जाता है. तम चकित हो जाओगे देखकर कि भिखारी के कदमों में भी तुम्हें गति मालूम होती है हो सकती है- क्योंकि उसको कहीं पहुंचना है, कुछ दुख मिटाना है, कुछ तकलीफ ठीक करनी है, सम्राट के पैर बिल्कुल ही बोझिल हो जाते हैं. न कहीं पहुंचने को, न कुछ पाने को, जो पहुंचना था पहुंच चुके, जो पाना था पा लिया, अब? अब एक इतना बड़ा प्रश्न बनके खड़ा हो जाता है. अब सिर्फ घसीटते हैं. अब सिर्फ मौत की राह देख रहे हैं कि अब आये, कब छुटकारा दिला दे.
 
दुख का न हो जाना आनंद नहीं है. दुख का न हो जाना आनंद के होने के लिए जरूरी शर्त हो सकती है, आवश्यक हो सकता है. पर्याप्त नहीं है.