‌‘दिल का जिगसॉ‌’ बना रिश्तों की नई सोच का मंच

देशभर से आए अग्रवाल युवक-युवतियों ने विवाह, जीवनसाथी व पारिवारिक अपेक्षाओं पर रखे विचार

    14-Jul-2026
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पुणे, 13 जुलाई (स्वप्निल बापट द्वारा)

 पारंपरिक तरीके से होने वाले मैरिज मीट से हटकर अनूठे ढंग से परस्पर संवादी सम्मेलन अग्रवाल समाज द्वारा खास तौर पर आयोजित किया गया, जहां शादी को देखने का एक बिल्कुल अलग नजरिया पेश करते हुए ‌‘दिल का जिगसॉ‌’ कार्यक्रम का रविवार (12 जुलाई) को शानदार समापन हुआ. यह कार्यक्रम अग्रवाल समाज (पूना) के लिए खासतौर से भारतीय जैन संघटना (बीजेएस) ने डिजाइन किया था, जिसके प्रायोजक प्रिस्टीन प्रॉपर्टीज (प्रीतम ईेशरचंद गोयल एंटरप्राइज) रहे. दिन भर चले इस कार्यक्रम में न सिर्फ पुणे बल्कि जालना, छत्रपति संभाजीनगर और यहां तक की बुरहानपुर और बंगलुरु से भी अग्रवाल समाज के 25 युवक और 25 युवतियां शामिल हुए.
अनेक कारणों से ‌‘शादी ही नहीं करनी‌’, ऐसा कहने वालों की संख्या पिछले कुछ समय में तेजी से बढ़ी है. इसी पृष्ठभूमि में आज की पीढ़ी का शादी को लेकर वास्तव में क्या कहना है और उन्हें शादी के बारे में किस तरह से विचार करना चाहिए, इसी मुख्य सूत्र को ध्यान में रखकर इस कार्यक्रम का आयोजन अग्रवाल समाज (पुणे) संस्था द्वारा किया गया था. भारतीय जैन संगठन (बीजेएस) ने इससे पहले जैन समाज के युवाओं के लिए ऐसे कार्यक्रम शुरू किए हैं. उसी तर्ज पर अग्रवाल समाज के युवाओं के लिए देश का यह पहला कार्यक्रम पुणे में संपन्न हुआ. विशेष बात यह है कि, यह पारंपरिक तरीके से होने वाला कोई वधू-वर सम्मेलन (मैरिज मीट) नहीं था, बल्कि अपने मन में शादी को लेकर चल रहे विचारों को व्यक्त करना और दूसरों के विचारों को समझना, इस पद्धति से इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई थी. रेलवे स्टेशन क्षेत्र के लेमन ट्री होटल में लगभग 11 घंटे से भी अधिक समय तक चले इस कार्यक्रम में अग्रवाल समाज के 25 युवक और 25 युवयां शामिल हुए थे. हमें शादी क्यों करनी है.. शादी और दिल का आपस में क्या संबंध है.. दिल का जिगसॉ (गळसीरु) यानी आखिरकार क्या होगा.. हमें वास्तव में कौन सी पहेली सुलझानी है.. ऐसे कई सवाल लेकर ये युवा हॉल में पहुंचे थे. कुछ लोगों के चेहरों पर थोड़े से अनजानेपन का तनाव भी था, तो कुछ के मन में उत्सुकता थी. मन में कई सवालों का तूफान उमड़ते रहने के बीच ही इस कार्यक्रम की शुरुआत हुई. और जब यह कार्यक्रम खत्म हुआ, तब यह कार्यक्रम खत्म ही न हो, ऐसा महसूस करते हुए, बल्कि हमें समय बहुत ही कम मिला, ऐसी मनःस्थिति में लगभग 7 घंटों की लंबी चर्चा और विचार- विमर्श के बाद इस कार्यक्रम के समापन समारोह में ये युवा शामिल हुए थे. समारोह के अवसर पर मंच पर अग्रवाल समाज (पुणे) के अध्यक्ष ईेशरचंद गोयल, उपाध्यक्ष विजय अग्रवाल, बीजेएस के संस्थापक शांतिलाल मुथा, एमडी कोमल जैन, द्वारका जालान, ‌‘आज का आनंद‌’ के संपादक आनंद अग्रवाल, दीपक बंसल, संजय (प्रिंस) अग्रवाल, मुकेश कानोडिया, हेमंत अग्रवाल आदि उपस्थित थे. इस कार्यक्रम का गंभीरता से लेकिन सटीक संचालन करनेवाली बीजेएस की एमडी कोमल जैन ने बताया कि शादी न करने की इच्छा होने के कई कारण हैं. एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि शादी का पुराना और पारंपरिक तरीका आधुनिक समय के अनुकूल नहीं है. इससे जनरेशन गैप के साथ-साथ कई अन्य समस्याएं भी पैदा होती हैं. इसके अलावा, ‌‘शादी का लड्डू‌’ की अवधारणा को समाज के सामने इतने डरावने रूप में पेश किया गया है कि शादी की उम्र के युवा शादी से ही दूर भागने की कोशिश कर रहे हैं. माता-पिता का एकमात्र स्वार्थ यही होता है कि उनके बच्चों का भला हो. लेकिन, दो पीढ़ियों के बीच संवाद की कमी के कारण, ‌‘शादी ही नहीं करनी है‌’जैसी मानसिकता बढ़ती जा रही है. इसके साथ ही, इस कार्यक्रम में उठने वाले कई अन्य मुद्दों पर भी चर्चा की गई. बीजेएस के संस्थापक शांतिलाल मुथा ने कहा कि, आज अग्रवाल समाज में नए क्रांति का बीज बोया गया है. हम इसी बात का आग्रह करते हैं कि माता-पिता को शादी के मुद्दे पर अपने बेटे या बेटी पर किसी भी तरह का दबाव नहीं डालना चाहिए. इसके विपरीत, आज की पीढ़ी शादी के फैसले लेने के लिए अधिक आत्मवेिशासी और आगे की सोच रखने वाली है. उन्हें उचित स्वतंत्रता दी जानी चाहिए. इसी उद्देश्य से, खुद को पहचानने के कार्यक्रम के रूप में ‌‘दिल का जिगसॉ‌’ का निर्माण किया गया है. अग्रवाल समाज (पुणे) के अध्यक्ष ईेशरचंद गोयल ने कहा, आजकल शादी तय करना बहुत ही कठिन हो गया है. समय बदल गया है, और सोचने का तरीका भी बदल चुका है. मोबाइल सहित अन्य कई कारणों से दो पीढ़ियों के बीच की दूरी बढ़ गई है. इसलिए, इस तरह के आयोजन की बहुत आवश्यकता थी. अग्रवाल समाज के लिए यह कार्यक्रम पहली बार आयोजित किया गया था, जो सभी के सहयोग से सफल रहा. अब हम इसी तरह के कार्यक्रमों को और बड़े पैमाने पर आयोजित करने का प्रयास करेंगे. ‌‘दिल का जिगसॉ‌’ कार्यक्रम की संकल्पना रखी जाने के साथ ही दैनिक आज का आनंद ने इस बेहद संवेदनशील और आत्मीय विषय को समाज तक पहुंचाने के लिए विशेष प्रयास किए थे. समापन समारोह में संपादक आनंद अग्रवाल ने अपने भाषण में अभिभावकों (माता-पिता) का दृष्टिकोण और भूमिका स्पष्ट की. उन्होंने कहा, पिछली पीढ़ियों ने बहुत संघर्ष देखा है. इसलिए, वैसी परिस्थिति हमारे बच्चों पर न आए, ऐसी हर माता-पिता की इच्छा होती है. इसी भावना के चलते माता-पिता शादी जैसे विषय में बहुत ध्यानपूर्वक कई चीजों को देखते हैं. हालांकि, उन्हें पेरेंटिंग का विशेष प्रशिक्षण दिए जाने की आवश्यकता है. अगली पीढ़ी प्रगतिशील सोच रख रही है, यह बहुत ही अच्छी बात है. उम्मीद है कि ‌‘दिल का जिगसॉ‌’कार्यक्रम में शामिल हुए युवक- युवतियों को अब विवाह की संकल्पना और खुद के बारे में भी स्पष्टता आ गई होगी. जिगसॉ (पहेली) तो सभी को पता होती है. दिमाग पर जोर देकर किसी सवाल या किसी पहेली का हल निकालना, इस प्रकार के मनोरंजन का आनंद कई लोगों ने बचपन से लिया होता है या फिर बड़े होने पर भी यह कई लोगों का शौक होता है. लेकिन, यह विषय केवल मनोरंजन तक ही सीमित नहीं है. हमारे जीवन में शादी से जुड़े सवाल भी इसी तरह किसी जिगसॉ जैसी एक बड़ी पहेली हो सकते हैं. उसे हमें खुद ही सुलझाना चाहिए. उसके लिए खुद को खुद की पहचान होनी चाहिए. कुछ सवालों के जवाब हमें सोच-समझकर तलाशने चाहिए. बेशक, इसके लिए केवल मोटी-मोटी किताबें ही पढ़नी पड़ें, ऐसा जरूरी नहीं है. विशेष रूप से तैयार किए गए खेलों, विभिन्न गतिविधियों और प्रश्नोत्तर सत्रों के माध्यम से कई महत्वपूर्ण बातें सामने आईं. शादी को लेकर खुद की क्या उम्मीदें हैं, हमें वास्तव में कैसा जीवनसाथी चाहिए, हमारे पारिवारिक संस्कार और हमारी विचारधारा कैसी है, तथा शादी करते समय कौन-कौन सी महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिए, इन सभी के साथ-साथ अन्य कई मुद्दों पर अग्रवाल समाज के इन युवक और युवतियों ने बेहद गंभीरता से चर्चा की. विशेष बात यह रही कि कार्यक्रम के समापन पर अंतिम दो घंटे इन सभी युवक-युवतियों के माता-पिता (अभिभावकों) को भी शामिल किया गया था. दिल का जिगसॉ के माध्यम से माता-पिता को यह प्रत्यक्ष रूप से सुनने का अवसर मिला कि उनके बेटे या बेटी ने दिनभर वास्तव में क्या विचार किया है. माता-पिता की उपस्थिति में ही विवाह को लेकर अपने विचार खुलकर व्यक्त करने की अनुमति देने वाले इस मंच पर कुछ माता-पिता ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त कीं. सहभागी युवा-युवतियों ने यह भावना व्यक्त की कि शादी करने का निर्णय माता-पिता या समाज के दबाव में आकर नहीं लेना चाहिए. इसके विपरीत, खुद को अपनी पहचान कराते हुए, अपनी अपेक्षाओं और समझौता करने की अपनी इच्छा के बीच तालमेल बिठाकर एक सही जीवनसाथी का चयन कैसे किया जा सकता है, इसी की सीख (शिक्षा) इस कार्यक्रम में मिली. इस विशेष कार्यक्रम में सम्मिलित अग्रवाल परिवारों के वेिशास और उत्साह ही इस पहल की सबसे बड़ी सफलता है. सभी के सहयोग ने इस कार्यक्रम की एक सार्थक और प्रेरणादायी शुरुआत की है. इस स्नेह, वेिशास और भरपूर समर्थन के लिए हम आभारी हैं, ऐसे शब्दों में अग्रवाल समाज (पुणे) एवं बीजेएस ने सभी का आभार व्यक्त किया.
 
 कार्यक्रम में खुद को भी समझने का अवसर मिला
 दिनभर चले इस कार्यक्रम में एक-दूसरे को जानने-पहचानने के साथ ही खुद को भी समझने का मौका मिला. तरह-तरह के खेल, रैपिड फायर और अलग-अलग परिस्थितियों (सिचुएशंस) पर अपने विचार रखने जैसी कई गतिविधियों के माध्यम से इन युवक-युवतियों ने विवाह की अवधारणा पर गंभीरता से चर्चा की. विवाह केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें दो परिवार, समाज, हमारी विचारधारा और भविष्य की राह सहित कई निर्णय शामिल होते हैं. इस बारे में भी इन युवक-युवतियों ने कुछ नया सुनने, सीखने और समझने का प्रयास किया.  
 
लाइफ पार्टनर चुनने की कला आजकल के जमाने में महत्वपूर्ण
 जीवनसाथी चुनने की कला आज के दौर में बहुत महत्वपूर्ण है. पैरेंट्स (माता-पिता) का दखल कैसे कम होना चाहिए..? पैरेंट्स को बच्चों को शादी के फैसले लेने का अधिकार कैसे देना चाहिए..? और बच्चों को किस तरह से अपना लाइफ पार्टनर ढूंढना चाहिए..? यहां सिर्फ पेरेंट्स की ही बातें नहीं, बल्कि बच्चों को भी किस तरह से पार्टनर ढूंढना चाहिए, ये सारी बातें बताई गई हैं. इसके तहत आपकी लाइफस्टाइल क्या है, आपकी पसंद-नापसंद क्या है, आपके वाइब्स मैच हो रहे हैं या नहीं, आपकी कंपैटिबिलिटी (आपसी तालमेल) मैच हो रही है या नहीं, पार्टनर को लेकर आपकी उम्मीदें क्या हैं, और आपके नेगोशिएबल व नॉन-नेगोशिएबल पहलू कौन से हैं. यानी आप किन बातों पर समझौता करना चाहते हैं और किन पर नहीं.इन सभी विषयों को लोगों को बहुत अच्छे तरीके से समझाया गया. - शांतिलाल मुथा, संस्थापक, भारतीय जैन संघटना (बीजेएस)  
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एक-दूसरे को समझने का मौका मिलता है

 मैं अपनी बेटी के लिए आई थी. यह जो कार्यक्रम रखा गया था, वह बहुत अच्छा था. इससे आपस में एक-दूसरे को समझने का मौका मिलता है, विचार मिलते हैं और एक-दूसरे के बारे में पता चलता है. एक-दूसरे के लिए यह बहुत ही अच्छा इवेंट था. - ममता अग्रवाल, वानवड़ी, पुणे

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कार्यक्रम में खुद को भी समझने का अवसर मिला
दिनभर चले इस कार्यक्रम में एक-दूसरे को जानने-पहचानने के साथ ही खुद को भी समझने का मौका मिला. तरह-तरह के खेल, रैपिड फायर और अलग-अलग परिस्थितियों (सिचुएशंस) पर अपने विचार रखने जैसी कई गतिविधियों के माध्यम से इन युवक-युवतियों ने विवाह की अवधारणा पर गंभीरता से चर्चा की. विवाह केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें दो परिवार, समाज, हमारी विचारधारा और भविष्य की राह सहित कई निर्णय शामिल होते हैं. इस बारे में भी इन युवक-युवतियों ने कुछ नया सुनने, सीखने और समझने का प्रयास किया. कार्यक्रम में समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला मेरा बेटा जैसे ही यहां आया, उसने मुझसे कहा, मम्मी, मुझे बहुत अच्छा लगा. समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला. वह सुबह से यहीं था, लेकिन जब शाम को कार्यक्रम खत्म हुआ और मैंने उससे फिर पूछा, तब भी उसने यही कहा, मम्मी, यह कार्यक्रम मुझे बहुत अच्छा लगा. - मीना गोयल, बिबवेवाड़ी
 

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इस कार्यक्रम में सहभागी होने की सलाह दूंगी
दिल का जिगसॉ एक बहुत ही शानदार अनुभव था. यह शो काफी सूझबूझ से भरा था और इसने हमें शादी को एक बिल्कुल नए नजरिए से देखना सिखाया. हमें यह सचमुच बहुत पसंद आया. यहां हम कई नए लोगों से मिले, बहुत से दोस्त बनाए और मैं हर किसी को इस कार्यक्रम में सहभागी होने की सलाह जशर दूंगी. - नेहा अग्रवाल, पुणे
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बच्चों को इससे अच्छा अनुभव मिला
 यह प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा. इससे बच्चों को अपनी पसंद की जीवनसाथी चुनने का मौका मिलेगा, इसमें कोई परेशानी नहीं होगी. बच्चों को इससे अच्छा अनुभव मिला है और उन्हें एक अच्छा लाइफ पार्टनर मिलेगा. इस इवेंट में अपनी पूरी जानकारी शेयर करना और एक-दूसरे से मिलना, उन्हें बहुत अच्छा लगा. - राजेंद्र गोयल, बिबवेवाड़ी

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कुल मिलाकर यह कार्यक्रम बहुत दिलचस्प रहा
इस कार्यक्रम में कुछ अलग-अलग हिस्से (स्निपेट्स) थे, जहां इन लोगों ने बहुत सोच-समझकर और खास गतिविधियां (क्यूरेटेड एक्टिविटीज) तैयार की थीं. जैसे ‌‘कचहरी‌’ जहां रैपिड फायर हो रहा था. इसके अलावा ‌‘क्लैन सर्चिंग‌’ जैसी भी कुछ गतिविधियां थीं, जिनमें हम सब अपनी पसंद और नापसंद को एक साथ मिलकर सबके सामने रख रहे थे. कुल मिलाकर यह सब बहुत दिलचस्प रहा. शादी के इस पूरे माहौल के बीच खुद के बारे में भी काफी कुछ जानने को मिला. तो, कुल मिलाकर यह बहुत ही अच्छा और बेहतरीन अनुभव था. - यश अग्रवाल, पुणे

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 इस क्रांतिकारी इवेंट के बहुत अच्छे नतीजे आएंगे
आज यह एक क्रांतिकारी इवेंट हुआ है. क्योंकि माता-पिता के तौर पर हम यही समझते थे कि जो हम कहें, वही सही है. बच्चों के साथ बातचीत न होना और उनकी बात समझने में खुद को कम समझना, यह भी होता था. लेकिन आज बच्चों की जो सोच है, वह खुली है. आज इस प्रोग्राम की वजह से बच्चों की सोच खुली है और मुझे लगता है कि यह सबसे बड़ी सकारात्मक बात हुई है. इससे बहुत अच्छे नतीजे आएंगे. - द्वारका जालान, वरिष्ठ समाजसेवी, पुणे
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 समाज के युवाओं में बहुत जबरदस्त क्लैरिटी है
अग्रवाल समाज में पहली बार हम इस तरह का कार्यक्रम कर रहे थे, और इसका रिस्पॉन्स काफी अच्छा रहा. चूंकि बदलाव की यह लहर बहुत जल्दी नहीं आती है, लेकिन फिर भी माता-पिता ने अपने बच्चों को भेजा. बच्चों ने भी इसमें बहुत बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. सच कहूं तो, आज के अग्रवाल समाज के युवाओं में बहुत जबरदस्त क्लैरिटी (स्पष्टता) है कि उन्हें अपनी जिंदगी में क्या चाहिए और क्या नहीं. बस जरूरत इस बात की है कि माता-पिता उनकी बात को सुनें. -कोमल जैन, एमडी, बीजेएस

 
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समाज के युवा प्रैक्टिकली बोलने में काफी आगे
मुझे सबसे अच्छी बात यह लगी कि आज अग्रवाल समाज के लड़के-लड़कियों ने इस कार्यक्रम में जो बातें कीं और अपने जो विचार रखे, उससे ऐसा लगा कि वे प्रैक्टिकली (व्यवहारिक रूप से) बोलने में काफी आगे थे. यह बात मुझे कोमल मैडम ने भी बताई कि अग्रवाल समाज के बच्चे - चाहे लड़के हों या लड़कियां - बोलने में एकदम साफ हैं और उन्होंने पूरे दिल से अपनी बातें रखी हैं. ऐसा मैंने पहले किसी और समाज में नहीं देखा, यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी. - ईेशरचंद गोयल, अध्यक्ष, अग्रवाल समाज पुणे
 
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