पारंपारिक विवाह संस्था को नई दिशा देता ‌‘दिल का जिगसॉ‌’

    15-Jul-2026
Total Views |

bfsB 
समाज में कुछ घटनाएं समाचार बनती हैं, कुछ आयोजन चर्चा का विषय बनते हैं, लेकिन कुछ पहलें ऐसी होती हैं जो समय के साथ सामाजिक परिवर्तन की आधारशिला बन सकती हैं. पुणे में अग्रवाल समाज (पुणे) और भारतीय जैन संघटना (बीजेएस) द्वारा आयोजित ‌‘दिल का जिगसॉ‌’ ऐसा ही एक सफल प्रयोग हुआ .इसे केवल युवक-युवतियों का परिचय सम्मेलन या आधुनिक मैरिज मीट मान लेना इसकी मूल भावना के साथ अन्याय होगा. दरअसल, यह विवाह से पहले स्वयं को समझने, संवाद स्थापित करने और रिश्तों को परिपक्व दृष्टि से देखने का एक सामाजिक प्रयोग रहा. देश में विवाह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है. सदियों से परिवार इसके केंद्र में रहा है. लेकिन पिछले एक दशक में समाज तेजी से बदला है. कैरियर की प्राथमिकताएं बदली हैं, महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी है, युवाओं की आकांक्षाओं का भी विस्तार हुआ है. डिजिटल दुनिया ने रिश्तों की परिभाषा बदल दी है और सबसे महत्वपूर्ण, नई पीढ़ी ने हर निर्णय में अपनी भागीदारी को अनिवार्य माना है. ऐसे में यदि विवाह की पारंपरिक व्यवस्था में कम्युनिकेशन का अभाव रहेगा, तो टकराव स्वाभाविक है. यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में युवा विवाह से बचना चाहते हैं या उसे टालना चाहते हैं. इसे केवल आधुनिकता का प्रभाव कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. इसके पीछे असफल वैवाहिक जीवन के बढ़ते उदाहरण, सामाजिक दबाव, अवास्तविक अपेक्षाएं, कैरियर की चुनौतियां और संवादहीन पारिवारिक वातावरण जैसी अनेक वजहें हैं. दुर्भाग्य यह है कि समाज ने इन प्रश्नों को गंभीरता से समझने के बजाय अक्सर युवाओं को ही कटघरे में खड़ा कर दिया. रविवार को होटल लेमन ट्री में आयोजित ‌‘दिल का जिगसॉ‌’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि इसने प्रश्न पूछने का साहस दिया. यहां किसी पर विवाह करने का दबाव नहीं था, न ही जीवनसाथी चुनने की जल्दबाजी. यहां युवाओं से पहले यह पूछा गया कि वे स्वयं कौन हैं, उनके जीवन के मूल्य क्या हैं, वे रिश्तों से क्या अपेक्षा रखते हैं और वे स्वयं किसी रिश्ते को निभाने के लिए कितने तैयार हैं. वस्तुतः विवाह की सबसे बड़ी तैयारी जीवनसाथी ढूंढ़ना नहीं, बल्कि स्वयं को समझना है. यह सरल सत्य अक्सर हमारी सामाजिक व्यवस्था में सबसे अधिक उपेक्षित रहता है. इस कार्यक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष अभिभावकों की भागीदारी रही. हमारे परिवारों में विवाह के निर्णय पर माता-पिता की भूमिका स्वाभाविक है. लेकिन भूमिका और नियंत्रण के बीच एक बहुत महीन रेखा होती है. बदलते समय में कई परिवार इस संतुलन को बनाए रखने में असफल रहे हैं. परिणामस्वरूप संवाद की जगह दबाव ने ले ली और वेिशास की जगह पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ने लगी. ‌‘दिल का जिगसॉ‌’ ने इस दूरी को कम करने का प्रयास किया. कार्यक्रम के अंतिम चरण में जब माता- पिता ने अपने बच्चों के विचार सीधे सुने, तब संभवतः दोनों पीढ़ियों ने पहली बार एक-दूसरे को समझने का प्रयास किया. यही किसी भी स्वस्थ समाज की पहली शर्त है. यह भी उल्लेखनीय है कि इस कार्यक्रम ने विवाह को केवल भावनात्मक या पारिवारिक विषय नहीं माना, बल्कि उसे मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और व्यवहारिक दृष्टि से समझने का प्रयास किया. आज आवश्यकता केवल विवाह कराने की नहीं, बल्कि विवाह के लिए मानसिक रूप से तैयार समाज बनाने की है. रिश्ते परिचय से नहीं, समझ से बनते हैं. संवाद के बिना वेिशास नहीं बनता और वेिशास के बिना कोई भी रिश्ता लंबे समय तक नहीं टिक सकता. इस दृष्टि से ‌‘दिल का जिगसॉ‌’ केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संवाद, आत्म पहचान और पारिवारिक संवेदनशीलता का ऐसा मंच है, जिसकी आवश्यकता आज शायद पहले से कहीं अधिक है. यदि समाज इस प्रयोग को आगे भी करता रहेगा और इसे फार्मल आयोजन के बजाय सामाजिक आंदोलन का स्वरूप देता है और इसमें साइकोलॉजिस्ट, फैमिली काउंसलर, शिक्षाविदों तथा अनुभवी दंपतियों को भी जोड़ता है, तो यह पहल आने वाले समय में विवाह संस्था को नई ऊर्जा देने का माध्यम बन सकती है. कभी-कभी परिवर्तन बड़े आंदोलनों से नहीं, बल्कि सही समय पर पूछे गए कुछ ईमानदार सवालों से शुरू होता है. ‌‘दिल का जिगसॉ‌’ ने वही सवाल पूछने का साहस किया है. अब उत्तर केवल युवाओं को नहीं, पूरे समाज को देना है. इस क्रांतिकारी पहल के लिए भारतीय जैन संगठन (बीजेएस) के संस्थापक शातिलाल मुथा, एमडी कोमल जैन तथा अग्रवाल समाज के अध्यक्ष ईश्वरचंद गोयल तथा उनकी समस्त कार्यकारिणी को अनेकों साधुवाद. - सुरेश परिहार उपसंपादक, आज का आनंद  
 
देशभर के समाजों के लिए अनुकरणीय मॉडल

जीवनशैली, विचारधारा, व्यक्तिगत सीमाएं, समझौते की क्षमता, अपेक्षाएं, संवाद और भावनात्मक परिपक्वता जैसे विषयों पर चर्चा यह संकेत देती है कि अब विवाह केवल पारिवारिक निर्णय नहीं, बल्कि साझेदारी का निर्णय बन चुका है. यदि इस दृष्टिकोण को समाज स्वीकार करता है तो भविष्य में वैवाहिक संबंध अधिक स्थिर और संतुलित हो सकते ह्‌ैं‍. हालांकि, किसी भी सामाजिक प्रयोग का मूल्यांकन केवल उसकी लोकप्रियता से नहीं किया जा सकता. उसकी सफलता इस बात से तय होगी कि क्या इससे युवाओं के निर्णय अधिक परिपक्व होते हैं, क्या परिवारों में संवाद बढ़ता है और क्या वैवाहिक जीवन की गुणवत्ता में सकारात्मक बदलाव दिखाई देता है. यदि आने वाले वर्षों में इस पहल से जुड़े परिवारों में बेहतर समझ, अधिक संतुलित रिश्ते और कम वैवाहिक तनाव देखने को मिलते हैं, तो यह कार्यक्रम केवल अग्रवाल समाज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशभर के समाजों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बन सकता है.