जानकाराें का कहना है कि ईरान काे डर था कि स्ट्रेट ऑफ हाेर्मुज जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग लेन पर उसकी पकड़ धीरे-धीरे कम हाे रही है, इसलिए उसने तेल टैंकराें पर दाेबारा हमला करके जाेखिम उठाया और अमेरिका के साथ एक बड़े युद्ध काे फिर से भड़काने की स्थिति पैदा कर दी.
बुधवार काे दाेनाें पक्षाें ने उस समझाैते काे रद्द करने की धमकी दी, जिस पर उन्हाेंने 17 जून काे शांति वार्ता का खाका तैयार करने और अप्रैल से चल रहे अस्थिर संघर्ष विराम काे आगे बढ़ाने के लिए हस्ताक्षर किए थे. रातभर अमेरिकी लड़ाकू विमानाें ने ईरान में कई ठिकानाें पर और भी जाेरदार हमले किए, जबकि ईरान ने फारस की खाड़ी में अमेरिकी सहयाेगियाें के खिलाफ ड्राेन और मिसाइल हमलाें काे और तेज करने की कसम खाई. समझाैते का मुख्य आधार यह था कि ईरान काे बहुत जरूरी आर्थिक राहत के बदले व्यावसायिक शिपिंग के लिए हाेर्मुज जलडमरूमध्य काे फिर से खाेलना था. ईरान के परमाणु कार्यक्रम के भविष्य जैसे मुश्किल मुद्दाें काे आगे की बातचीत के लिए टाल दिया गया था. लेकिन, इससे हालात में बहुत कम बदलाव आया.
जाॅन्स हाॅपकिंस स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज के प्राेफेसर और ईरान मामलाें के अनुभवी जानकार वली नस्र कहते हैं, समझाैता मृगतृष्णा जैसा लगने लगा था. तेहरान का मानना है कि अमेरिका साेची-समझी काेशिश में लगा है, ताकि हाेर्मुज पर ईरान का नियंत्रण खत्म कर लेबनान में उसकी स्थिति कमजाेर की जा सके और अपनी ताकत फिर से बढ़ाई जा सके, ताकि ईरान पर और ज्यादा दबाव डाला जा सके या फिर युद्ध की स्थिति में लाैटा जा सके.
समझाैते के तहत तय 60 दिनाें के संघर्ष विराम का समय बीतता जा रहा था और ईरान इस बात से परेशान था कि अमेरिकी नाैसेना समुद्री जहाजाें काे ओमान के तट के पास वाले दक्षिणी रास्ते से जाने के लिए बढ़ावा दे रही थी.
ईरान चाहता था कि सभी जहाज उसकी नई बनी हाेर्मुज ट्रांजिट अथाॅरिटी के पास रजिस्टर हाें (जाे आगे चलकर टाेल वसूलने की तैयारी थी), लेकिन अमेरिकी नाैसेना ऐसा नहीं कर रही थी. पिछले सप्ताहांत पर ट्रैफिक युद्ध से पहले के स्तर (राेजाना 100 से ज्यादा जहाज) का लगभग एक-तिहाई था और यह जलमार्ग के ईरानी और ओमानी दाेनाें हिस्साें में बराबर-बराबर बंटा हुआ था. साथ ही, अमेरिका लेबनान और इजरायल के बीच एक अलग शांति समझाैता करने की काेशिश कर रहा था, जिसमें हिज्बुल्ला काे हथियार- मुक्त करने का दीर्घकालीन अधूरा लक्ष्य भी शामिल हाेता.
आखिरकार, आर्थिक मदद के बारे में सार्वजनिक चर्चाओं में मदद की राशि कम हाेती गई.
विश्लेषकाें का कहना है कि इसके बजाय, ईरान के सर्वाेच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई (जाे फरवरी में युद्ध में मारे गए थे) के हफ्ते भर चलने वाले अंतिम संस्कार के दाैरान भी,ईरानियाें ने अपनी बढ़त खाेने का इंतजार करने के बजाय हमला करने का फैसला किया. उनके मुताबिक, ईरान की यह साेच कि उसने इस साल की शुरुआत में हुई लड़ाई में अमेरिका और इजरायल काे मात दी थी, शायद फिर से टकराव की स्थिति बनने की एक वजह रही. वाशिंगटन में ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की सीनियर फेलाे सुजैन मैलाेनी ने कहा, अमेरिका और इजरायल के जबर्दस्त हमलाें का सामना करने के बाद, वे (ईरान के लाेग) शायद काफी सुरक्षित महसूस कर रहे हाेंगे। अंतिम संस्कार के कार्यक्रमाें के दाैरान हुए इन हमलाें का समय यह दिखाता है कि सरकार जीत का जश्न मना रही है कि वे आखिरकार युद्ध से बाहर निकल आए हैं और अब भी जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं. इसमें निश्चित रूप से एक संदेश है.
जानकाराें का कहना है कि भले ही युद्ध से पहले जहाजाें की आवाजाही बिना किसी रुकावट के हाे रही थी, लेकिन ईरान का संदेश यह था कि वह इस जलडमरूमध्य पर अपना नया नियंत्रण जमाना चाहता है. अमेरिका ने ईरान पर दशकाें से लगे तेल प्रतिबंध हटा दिए थे, फिर उन्हें तुरंत लागू कर दिया. ईरान ने कहा कि उसे इसकी परवाह नहीं है. ईरान के अर्थशास्त्री और मुख्य वार्ताकार माेहम्मद बाघेरी गालिबाफ के सलाहकार, माजिद शाकेरी ने सरकारी टेलीविजन पर कहा, कमाई से ज्यादा जरूरी नियंत्रण है. या ताे हम इस जलडमरूमध्य पर अपना कब्जा बनाए रखेंगे, या फिर हममें से हर काेई इसके लिए शहीद हाे जाएगा.
विश्लेषकाें का कहना है कि दाेनाें पक्ष तीखी बयानबाजी और डींगें हांकने के आदी हैं और बातचीत के बजाय अक्सर युद्ध का सहारा लेते हैं. हालांकि, ट्रम्प ने बातचीत काे फिर से पटरी पर लाने के विचार काे पूरी तरह से खारिज नहीं किया.
ईरान के कट्टरपंथी लंबे समय से बातचीत के खिलाफ रहे हैं.
इसलिए, जलडमरूमध्य काे लेकर हुए समझाैते से पीछे हटने की मांग भी उठ रही है. अटलांटिक काउंसिल के सीनियर फेलाे और ट्रम्प के पहले कार्यकाल में नेशनल सिक्याेरिटी काउंसिल में ईरान के लिए निदेशक रह चुके नेट स्वानसन ने कहा, लगता है कि यह दिखावा है. यह वैसा ही है, जैसा ट्रम्प करते हैं. वह आक्रामक कार्रवाइयाें और जाेरदार धमकियाें के जरिये बातचीत करते हैं, इसलिए कुछ मायनाें में वे एक ही भाषा बाेल रहे हैं.
जानकाराें के मुताबिक, ईरान काे उम्मीद थी कि ट्रम्प, जाे इस टकराव से परेशान थे और चार महीने बाद मुश्किल मध्यावधि चुनावाें का सामना करने वाले थे, किसी अलाेकप्रिय युद्ध काे फिर से शुरू करने का जाेखिम नहीं उठाएंगे. फिर भी, ट्रम्प ने ईरानियाें के खिलाफ तीखे हमले किए. उन्हाेंने संकेत दिया कि अमेरिका ईरान पर और भी जाेरदार हमला करेगा और युद्धविराम खत्म हाे गया है. हडसन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलाे जाेएल रेबर्न ने कहा, ईरान फिर वही गलती कर सकता है, जाे वह पहले भी कई बार कर चुका है.
- नील मैकफार्नहर