34 वर्ष की उम्र में संजय कुमार ने वह कर दिखाया है, जिसने उन्हें अमेरिका के बड़े वैज्ञानिकाें की फेहरिस्त में शामिल कर दिया. उन्हाेंने ब्रेन ट्यूमर सेल्स के फैलने के कारणाें पर शाेध की है और अब वे इसका सफल इलाज ढूंढने में जुटे हैं. कैलिफाेर्निया की बर्कले यूनिवर्सिटी के इस शाेधकर्ता ने अपने अब तक के शाेध से न केवल इस संस्थान बल्कि व्हाइट हाउस काे भी प्रभावित किया है. काेशिका यांत्रिकी और जैव पदार्थाे पर शाेध करने वाले इस युवा काे अमेरिका के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ (एनएचआई) की ओर से यह सम्मान दिया जाएगा.
ताकि जारी रहे शाेध : वे जिस पुरस्कार के लिए चुने गए हैं. उसके लिए करीब 600 शाेधकर्ताओं ने आवेदन किया था. जिसमें चुने गए 31 लाेगाें में बायाेइंजीनियरिंग के असिस्टेंट प्राेफेसर 35 वर्षीय कुमार भी एक हैं. एनएचआई के डायरे्नटर एलियस ए जेरहाेउनी ने बताया कि यह पुरस्कार अपने करियर की प्रारंभिकत अवस्था में बेहतर काम करने वाले शाेधकर्ताओं काे दिया जाता है, कुमार ने अपने प्रारंभिक शाेध में सेल मैकेनिज्म के क्षेत्र में नए तथ्याें काे खाेजा है. अब उन्हें पांच साल में 15 लाख डाॅलर राशि दी जाएगी ताकि वे अपनी रिसर्च जारी रख सके. अकसर जीस-टी-शर्ट पहनने वाले कुमार के दिन की शुरुआत व्यायाम से हाेती है, जिसका अंदाजा उनके गठीले शरीर काे देखकर लगाया जा सकता है.
बेहतरीन शिक्षक भी हैं : वे बर्कले मेंएक शाेधकर्ता के साथ बेहतरीन शिक्षक के रूप में भी जाने जाते हैं. इसी साल मई माह में उन्हें बायाेइंजीनियरिंग ऑनर साेसायटी ने आउटस्टैंडिंग टीचिंग अवाॅर्ड दिया है. इसका चुनाव उनकी कक्षा और साथी सदस्याें के वाेटाें से किया जाता है. वे छात्राें से दाेस्ताें की तरह पेश आते हैं. अल सुबह अपनी दिनचर्या प्रारंभ कर देने वाले कुमार का एक लैब भी है जिसे उन्हाेंने द कुमार लेबाेरेटरी नाम दिया है, जहां वे देर रात तक काेशिकाओं के अध्ययन में जुटे रहते हैं.
पहली ्नलास ने दिखाया रास्ता : 2005 में बर्कले से जुड़ने से पहले कुमार ने 2 साल एनआईएच के रिसर्च फैलाे के रूप में काम किया. इस दाैरान वे हाॅर्वर्ड मेडिकल स्कूल के बच्चाें के अस्पताल में काम करते रहे,जहां उन्हाेंने नर्व सेल्स की संरचना पर यांत्रिकी बल के प्रभाव का अध्ययन किया.