सुंदरबन इलाके में जब सागर की लहरें धीरे-धीरे दलदली मिट्टी पर आती हैं. नमक और तूफान की तीव्रता से बंधा तट कांपता है, वहां बचपन की मासूमियत भी खतरे में पड़ जाती है. यहां गांवाें में, घर की दीवारें धंसती मिट्टी पर टिकी हैैं.
इस संकट में सबसे अधिक प्रभावित हाेती हैं लड़कियां जिनकी उम्र के सबसे खूबसूरत यानी खेल, पढ़ाई और बचपन की जिज्ञासाओं से लबालब हाेते हैं. वे सब जलवायु आपदाओं, गरीबी और सामाजिक असमानताओं के दबाव में जल्दी ही विवाह की आग में झाेंक दी जाती हैं.
गाेसाबा द्वीप की गलियाें में एक 14 वर्षीय लड़की, अर्जू बागदाेस सुबह के अंधेरे में अपने छाेटे-छाेटे पैराें से खारे पानी में छलकते पानी काे चीरते हुए भागती है. अपने साथ केवल कुछ कपड़ाें का बंडल लिए हुए. सूरज की पहली किरणाें से पहले ही वह अपनी जीवन यात्रा में उस माेड़ पर पहुंच चुकी हाेगी. जहां उसके बचपन काे हमेशा के लिए त्याग दिया जाएगा. विवाह की रस्में साधारण हाेती हैैं. काेई भव्य दावत नहीं. बस कुछ रिश्तेदार उधार ले गई साड़ी और एक जीवन जिसे आजाद महसूस करने का माैका कभी नहीं मिलेगा.
यह जलवायु संकट की अदृश्य कीमत है, जिसे समाज और व्यवस्था ने लड़कियाें की मासूमियत के रूप में वसूल लिया.
हालिया सर्वेक्षण इस संकट की गंभीरता काे उजागर करते हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 में पाया गया कि पश्चिम बंगाल में 20-24 वर्ष की उम्र की लगभग 42 प्रतिशत महिलाएं 18 वर्ष की उम्र से पहले ही विवाहिता हाे चुकी थी. जाे राष्ट्रीय औसत 23.3 प्रतिशत का लगभग दाेगुना है. सुंदरबन के द्वीपाें में गाेसाबा ब्लाॅक खासकर बाल विवाह के लिए चिन्हित है. जहां किशाेरियाें काे घर का बाेझ घटाने काे विवाह करने काे मजबूर किया जाता है. यहां के ग्रामीण रात में किए जाने वाले विवाहाें की कहानियां फुसफुसाते हैं, जाे अ्नसर बिना पंजीकरण अधिकारी काे नजर से दूर अनदेखी रह जाती हैं. यूनिसेफ के अनुमान के अनुसार भारत के बाल विवाहाें में पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी 13-15 प्रतिशत है और इस डेल्टा के द्वीप-गाेसाबा से लेकर बसंती, काकद्वीप और नामखाना तक-हर साल सैकड़ाें किशाेरियाें काे विवाह के बंधन में बांधते हैं.
सरकारी हस्तक्षेप माैजूद है, लेकिन वे सतह तक ही सीमित है. साल 2023 में अधिकारियाें ने दावा किया कि 1,500 बाल विवाहाें काे राेका गया और लगभग 900 एफआईआर दर्ज की गईंर्. लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि अधिकांश विवाह अब भी रिकाॅर्ड में नहीं आते. इस क्षेत्र में बाल विवाह भूख, कर्ज व अनिश्चितता से निपटने की कठाेर रणनीति है. जलवायु परिवर्तन इस चक्र काे और तेज करता है.
पश्चिम बंगाल बाल अधिकार संरक्षण आयाेग के अध्ययन से पता चलता है कि पिछले दशक में 55 प्रतिशत से अधिक घराें ने अंडरएज विवाहाें में वृद्धि दर्ज की है. टेरेस डेस हाेमस के सर्वेक्षण में खुलासा हुआ कि पत्थर प्रतिमा और गाेसाबा के 90 प्रतिशत लाेग पिछले दस वर्षाें में सीधे जलवायु आपदाओं का सामना कर चुके हैैं, जिससे फसल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हुई है. ऐसे क्षेत्र में किशाेरियाें की जल्दी शादी आर्थिक बचाव की रणनीति बन जाती है. प्रवास से जाेखिम और बढ़ जाता है. केवल 17 प्रतिशत प्र्रवासी परिवार अपने साथ पति-पत्नी काे ले जाते हैं और सिर्फ 7 प्रतिशत बच्चे काे ले जाते हैं, जिससे नाबालिगाें की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती हैं. रिपाेर्टें बताती हैं कि बालिकाएं विवाह, जबरन श्रम, मानव तस्करी और विवाह प्रवासन से जुड़ी बढ़ती घटनाओं का सामना कर रही हैं.
मैदान के आंकड़े भले ही अधूरे हाेें. लेकिन परिणाम स्पष्ट हैं. लड़के परिवार की मदद करने के लिए स्कूल छाेड़ देते हैं. लड़कियां घरेलू श्रम, जल्दी गर्भधारण, स्वास्थ्य जाेखिम और सीमित गतिशीलता के चक्र में फंस जाती हैं . सर्वेक्षण के मुताबिक 73.3 प्रतिशत विवाहित लड़कियां अन्य जिलाें में पलायन करती हैं. अ्नसर अजनबी समुदायाें में बिना यह सुनिश्चित किए कि उनके पति की मंशा या पृष्ठभूमि सुरक्षित भी है. गरीबी और सामाजिक हाशिए पर रहने वाले समुदाय इस संकट काे और गहरा कर देते हैैं. अनुसूचित जाति/ जनजाति के लाेगाें के घराें में 44 प्रतिशत बाल विवाह की दर दिखती है. केनिंग के चिन्मय रे कहते हैं. कन्याश्री जैसी याेजनाएं इन द्वीपाें तक नहीं पहुंच पाती. प्रशासनिक बाधाएं, कड़ा दस्तावेजीकरण और राजनीतिक उपेक्षा हाशिए पर रहने वाले परिवाराें काे लाभ नहीं दिलाती. प्रवर्तन की कमी बच्चाें काे असुरक्षित छाेड़ देती है और पीड़िताें काे मदद नहीं मिलती.
टेरेसडेस हाेमस के सर्वेक्षण के अनुसार सुंदरबन की दाे तिहाई बालिकाएं अपनी शादी काे पिछले आपदाओं सेें जाेड़ती हैं.
काेविड-19 लाॅकडाउन ने इन समस्याओं काे और बढ़ा दिया.
स्कूल बंद हाेने से सुरक्षा की जगहें छिन गईं और बच्चे घराें में सीमित हाे गए. जहां गरीबी कर्ज और निराशा जीवित रहने की दिशा तय करती है. पठानखली गांव की 14 वर्षीय कल्याणी गेधन ने स्कूल छाेड़ दिया. अपनी किताबें फटे कपड़े में बांधकर क्योंकि उसकी मां फसल की विफलता के कर्ज चुकाने में संघर्ष कर रही थी. मथुपुर ढेला की 16 वर्षीय प्रिया जाना ने 2024 के तूफान में अपना घर खाे दिया. खारे पानी ने खेताें काे बर्बाद कर दिया. विकल्पाें की कमी के कारण उसके माता-पिता ने उसके विवाह का निर्णय लिया.
स्कूल तटबंधाें के साथ-साथ टूटते है. माैसुनी काेऑपरेटिव स्कूल, द्वीप का एकमात्र माध्यमिक विद्यालय, चिंता बढ़ाने वाली ड्राॅपआउट दर का गवाह हैं. प्र्रधानाध्यापक विनय शि बताते है कि पिछले दाे वर्षाें में 14-18 वर्ष के लगभग 15-20 प्रतिशत छात्र स्कूल छाेड़ चुके है. तुफानाें,गरीबी और जिम्मेदारियाें के दबाव में. मत्स्य और आजीविका विशेषज्ञ डाॅ. अनिमेष राय कहते हैं. आय बढ़ी नही.नावें कम हैं और बाल विवाह दरवाजे पर खड़ा है. - अमरेंद्र किशाेर