देश का ‘वाेटर’ बनने में भी मुश्किलें क्यों बढ़ रहीं?

    21-Jul-2026
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SOCHVICHAR
 
भारत निर्वाचन आयाेग ने फाॅर्म-6 काे लेकर जाे नया बदलाव किया है, वह विवादाें काे न्याैता दे सकता है. यह फाॅर्म पहली बार मतदाता बनने वाले आवेदक भरते हैं, जिसमें अब माता-पिता से जुड़ी एसआईआर की जानकारी भी देनी हाेगी. इसके बिना उनका ऑनलाइन आवेदन स्वीकार्य नहीं हाेगा. आयाेग का कहना है कि इससे मतदाता सूची अधिक पारदर्शी बन सकेगी. बेशक, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि मतदाता सूची में काेई भी व्य्नित बिना किसी ‘प्रमाण’ के शामिल न हाेने पाए और इसी का आधार विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) काे बनाया गया है, लेकिन बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए इस तरह का बदलाव चुनाव आयाेग की छवि खराब कर सकता है.
 
यहां 1982 का पारवूर (केरल) विधानसभा उप-चुनाव बताैर सबक याद किया जा सकता है. उस चुनाव में पहली बार इले्नट्राॅनिक वाेटिंग मशीन (ईवीएम) का इस्तमेाल किया गया था, करीब 50 मतदान केंद्राें पर यह प्रयाेग किया गया था, लेकिन बाद में सुप्रीम काेर्ट ने न सिर्फ उचित कानूनी प्रावधानाें का पालन न करने के कारण आयाेग काे फटकार लगाई, बल्कि उन सभी केंद्राें पर दाेबारा मतपत्राें से मतदान कराने पड़े.जाहिर है, सही काम करने के लिए भी कानून का पालन अनिवार्य है. कानून अपने हाथ में लेने से आलाेचना का माैका मिल जाता है, जिससे साख का सवाल खड़ा हाे सकता है. कानून के पालन से ही लाेकतंत्र मजबूत हाेता है, इसलिए प्रहरी संस्थाओं के इसके विपरीत काम करने काे, भले ही वह सही मंशा से किया गया हाे, काेई सही नहीं ठहरा सकता. एसआईआर पर पहले से जल्दबाजी में काम करने के आराेप लगते रहे हैं और आयाेग ने समय रहते सुधार कर स्थितियाें काे संभालने का जतन भी किया है, हालांकि, ऐसी ऐसी नाैबत आनी ही नहीं चाहिए थी, क्योंकि सर्वाेच्च संस्थाओं से यही अपेक्षा रहती है कि वे पूरी याेजना के साथ क्रियान्वयन शुरू करेंगे और विवाद के हर माैके काे समय से पहले खत्म कर देंगे. निस्संदेह, फाॅर्म-6 में जाे भाग जाेड़ा गया है, उसका मंतव्य सही है. नए मतदाता के रूप में नाम जुड़वाने के लिए अपने माता-पिता का नाम वर्ष 2000 के बाद जारी गहन पुनरीक्षण वाली मतदाता सूची में पता करके उनके पार्ट नंबर, विधानसभा क्षेत्र का नाम, बूथ संख्या और मतदाता क्रमांक का विवरण पेश करने से यह सुनिश्चित हाे सकेगा कि आवेदक सही मायने में मतदाता के रूप में नाम जुड़वाने का पात्र है. अगर ऐसा नहीं किया गया, ताे अपात्र भी किसी न किसी तरह से अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज करा सकता है, जिससे एसआईआर का फायदा निष्फल हाे जाएगा, पर प्रक्रियागत चूक आयाेग की मंशा पर फिर भारी पड़ती दिख रही है.
 
वास्तव में, माैजूदा विवाद की जड़ एसआईआर ही है.
 
इस प्र्रक्रिया काे लेकर बीते कुछ वर्षाें में जाे विवाद हुए हैं. उसके मुख्तत: तीन पहलू हैं. पहला, बिहार से जुड़ा है, जहां इसे असांविधानिक बताते हुए सर्वाेच्च न्यायालय तक में अर्जी दायर की गई थी. असाेसिएशन फाॅर डेमाेक्रेटिक रिफाॅर्म (एडी आर)ने ड्राॅफ्ट सूची पर सवाल उठाया था और कहा था कि तीन कराेड़ से ज्यादा मतदाताओं, विशेष रूप से वंचित समुदायाें के वाेटराें काे एसआईआर की सख्त शर्ताें के कारण मतदान से बाहर किया जा सकता है.यह आयाेग की एक बड़ी गलती थी, जिसे 6 जुलाई, 2025 काे अखबाराें में यह विज्ञापन छपवाकर सुधारा गया कि इन मतदाताओं काे एसआईआर प्रक्रिया में काेई दस्तावेज जमा कराने की जरूरत नहीं है. उनके लिए सिर्फ फाॅर्म भरना ही काफी हाेगा. इसके बाद ही वहां ड्राफ्ट सूची बन पाई. दूसरा पहलू एसआई आर के दूसरे चरण से जुड़ा है. बिहार में यह प्रक्रिया पूरी करने के बाद चुनाव आयाेग ने छत्तीसगढ़, गाेवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल के साथ-साथ तीन केंद्रशासित क्षेत्राें (अंडमान और निकाेबार, लक्षद्वीप और पुडुचेरी) में इसकी शुरुआत की यहां द्निकत यह हुई कि बिहार में स्कूली सत्र की शुरुआत में यह प्रक्रिया पूरी की गई थी, जबकि अन्य राज्याें काे यह सुविधा हासिल नहीं हुई. उन दिनाें स्कूली परीक्षाएं चल रही थी. नतीजनतन, शिक्षकाें पर पाठ्यक्रम पूरा करने, परीक्षा संपन्न कराने अथवा काॅपियां जांच करने की जिम्मेदारी ताे थी ही, घर-घर जाकर मतदाताओं काे जांचने की जवाबदेही भी आयद कर दी गई. यही दबाव कई बीएलओ पर भारी पड़ा और उन्हाेंंने खुदकुशी तक कर ली. इस चूक ने राजनीतिक पार्टियाें काे हमलावर हाेने का माैका दिया. हालांकि, बाद में एसआईआर की समय-सीमा बढ़ाई गई, लेकिन तब तक आयाेग की छवि काे नुकसान पहुंच चुका था.
 
तीसरे पहलू के रूप में पश्चिम बंगाल की चर्चा लाजिमी है. यहां भी ड्राफ्ट सूची जल्द तैयार करने का दबाव था.
 
नतीजतन, राज्य में हटाए गए करीब 27 लाख वाेटराें की अपील के निराकरण तक का व्नत नहीं मिला और उन्हें मतदान प्रक्रिया से ही बाहर रहना पड़ा. भारतीय लाेकतंत्र की यह खूबसूरती है कि यहां हर वयस्क नागरिक काे ताे देने का अधिकार है. ऐसे में, लाखाें वाेटराें काे चुनाव-प्रक्रिया से यूं बाहर कर देना आयाेग की कार्यशैली काे विवादाें में ले आया. माैजूदा तनाव की वजहें इन्ही तीन पहलुओं में छिपी हैं. आलाेचक मानते हैैं कि गरीब, विशेषकर ग्रामीण इलाकाें के वैध मतदाता एसआईआर के कारण मताधिकार से वंचित हाे सकते हैं.जाे हमारे लाेकतंत्र के लिए घातक हाे सकता है. फाॅर्म-6 में माता-पिता के एसआईआर की जानकारी दर्ज करने की अनिवार्यता यही मुश्किलें खड़ी करेगी, जिसका नुकसान अंतत: भारतीय लाेकतंत्र काे हाे सकता है. इस प्रकरण ने नागरिकता के सवालाें काे भी जिंदा कर दिया है, जिसकाे लेकर एसआईआर की शुरुआत से विवाद हाेता रहा है. ्नया चुनाव आयाेग नागरिकता का प्रमाण ताे नहीं मांग रहा, या गृहमंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में दखल ताे नहीं दे रहा? यह समझना हाेगा कि नागरिकता तय करने का अधिकार सिर्फ गृह मंत्रालय काे है निर्वाचन आयाेग सिर्फ उन मामलाें में प्रमाण मांग सकता है. या जांच कर सकता है,जिनके खिलाफ पहली नजर में संदेह उभरता हाे. सुप्रीम काेर्ट का 1995 का फैसला भी यही कहता है.
- ओ पी रावत