गुरु का इतना ही अर्थ है, जाे खुद पार हाे गया, वही तुम्हें चेतायेगा. अगर दस लाेग यात्रा पर गए हाें, जंगल हाे घना, खतरा हाे, ताे क्या करते हैं. नाै साे जाते हैं, एक जागता है. क्याेंकि खतरा आएगा ताे जाग रहा है वही जगा सकेगा. तब उसकी नींद का वक्त आता है, तब वह दूसरे काे जगा देता है - अब तुम जागाे, अब मैं साे जाता हूं. एक ताे जागता हुआ चाहिए, नहीं ताे खतरा आएगा, पता ही नहीं चलेगा, नींद में ही सब घट जाएगा.
गुरु का अर्थ है- जाे स्वयं जागा हुआ है, वह तुम्हारी नींद में उपयाेगी हाेगा. तुम बार-बार साे जाओगे. नींद में बार-बार घड़ा सीधा हाे जाएगा. बार-बार तुम भूलाेगे.
बार-बार तुम चुक जाओगे. ऐसा हुआ, एक सूफी फकीर हुआ. उसका असली नाम किसी काे पता नहीं, लेकिन जिस नाम से जाना जाता है, वह है नस्साज-खैर नमाज फकीर था. एक वृक्ष के नीचे ध्यान कर रहा था-स्वस्थ! एक आदमी गुलाम की तलाश में निकला था. गुलाम खरीदना था और एक मजबूत गुलाम चाहिए था. इस आदमी काे झाड़ के नीचे इतना स्वस्थ बैठा देखकर और फकीर, फटे कपड़े उसे लगा कि यह काेई भागा हुआ गुलाम है. किसी का गुलाम है, भाग गया है, यहां जंगल में छिप रहा है.
आदमी मजबूत दिखता है, काम का है. उस आदमी ने जाकर पूछा कि क्या तुम भागे हुए गुलाम ताे नहीं? नस्साज ने आंखें खाेली और कहा, तुम ठीक ही कहते हाे. भागा हुआ हूं और गुलाम हूं. उसका मतलब था कि परमात्मा से भाग गया हूं, और वही ताे मेरी गुलामी हाे गई.
वह आदमी प्रसिद्ध हुआ यही ताे मुसीबत है, संसारी और फकीर की भाषा में कहीं मेल नहीं बैठता.
नस्साज ने कहा कि ठीक कहते हाे, भागा हूं और गुलाम हूं. उस आदमी ने कहा, ठीक वक्त पर मिल गए, मैं भी एक गुलाम की तलाश में हूं. मैं तुम्हारा मालिक हाेने काे तैयार हूं. मेरे पीछे आ जाओ. तुम्हें मालिक की खाेज है? उस गुलाम ने कहा, बड़े गजब के आदमी हाे! यही ताे मेरी खाेज है, मालिक काे खाेज रहा हूं.
वह आदमी उसे घर ले गया और उसने कहा, मैं हुआ तुम्हारा मालिक, तुम हुए मेरे गुलाम! और जाे काम मैं बताऊं, वह कराे. उसने कहा, यही ताे मैं चाहता था कि काेई बतानेवाला मिल जाए कि क्या करूं, क्या न करूं. अपने किए ताे सब अनकिया हुआ जा रहा है. खुद कर-करके ताे फंस गया हूं. तुम भले मिले.
थाेड़ा शक उस आदमी काे हाेना शुरू हुआ कि या ताे यह आदमी पागल है और या फिर कहीं कुछ भूल-चूक हाे रही है. कहीं भाषा का भेद है. पर उसने साेचा कि अपने काे प्रयाेजन भी क्या, वह आदमी राजी है, ठीक्.
और मुफ्त मिल गया. बिना कुछ दिए-लिए! और आदमी तगड़ा स्वस्थ! उसने उससे काम लेना शुरू कर दिया. वह आदमी इतना भला पाया, उस संसारी आदमी ने, इस फकीर काे, उसने इसका नाम खैर रख दिया. खैर यानी अच्छा, भला. फिर उसने इसे जाे उसका खुद का काम था कपड़े बुनावाई का वह उसे सिखाया. ताे उसका दूसरा नाम हाे गया-नस्साज्. नस्साज यानी कपड़ा बुननेवाला.
खैर-नस्साज उसका नाम हाे गया. दस साल बीत गए, उसने बड़ी सेवा की इस मालिक की. उसने इतनी सेवा की और इतना सम्मान दिया और इतना श्रम किया कि इस मालिक काे भी चाेट लगने लगी भीतर कि मैं बड़ा शाेषण कर रहा हूं. एक पैसा मैंने इस आदमी पर खर्च नहीं किया है, जाे इसकी वजह से बड़ी धन-दाैलत आ गई है. और मैं शाेषण कर रहा हूं. अब वक्त आ गया है कि मैं इस मुक्त कर दूं. ताे उसने इसे बुलाया और कहा कि बहुत हाे गया.
तुम बड़े काम के साबित हुए, लेकिन मुझे मन में खटकता है कि मैं शाेषण कर रहा हूं. उस खटकन काे अब और ज्यादा नहीं सहा जा सकता. अब मैं तुम्हें मुक्त करता हूं.
अब तुम अपने मालिक हुए.
नस्साज ने कहा, बड़ी कृपा कि तुमने मुझे मेरा मालिक बना दिया! और बहुत कुछ सीखने काे मिला. तुम्हारे पास दास हाेने की कला सीखने काे मिली. और अब परमात्मा से फासला नहीं है. क्याेंकि गुलाम हाेना जब से मैंने जान लिया, अहंकार टूट गया. अहंकार टूटा कि गुलामी मिटनी शुरू हाे गई. और देखाे, तुम तक मुझे मुक्त किए दे रहाे हाे! मैं ताे मुक्त हाे गया, लेकिन अब तुम्हारे संबंध में क्या खयाल है? तुम कब तक गुलाम बने रहाेगे?