जब देश का बड़ा हिस्सा अब भी अपनी युवा आबादी से मिलने वाले जनसांख्यिकीय लाभांश का जश्न मना रहा है, ताे वहीं केरल एक नए दाैर में प्रवेश कर चुका है. यह दाैर युवाओं का नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी का है. राज्य की नवनिर्वाचित यूडीएफ सरकार ने देश का पहला वरिष्ठ नागरिक विभाग बनाने की घाेषणा की है.
इसके साथ एक अर्ध-न्यायिक वरिष्ठ नागरिक आयाेग भी बनाया जाएगा. यह सिर्फ एक नई कल्याणकारी याेजना नहीं, बल्कि इस बात की स्वीकाराे्नित है कि कम जन्म दर व बड़े पैमाने पर पलायन के कारण बढ़ती बुजुर्ग आबादी बड़ी चुनाैती बन चुकी है.
भारत तेजी से जनसांख्यिकीय बदलाव के दाैर से गुजर रहा है. अनुमान है कि 2011 में 10 कराेड़ रही 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र की आबादी 2036 तक दाेगुनी से भी ज्यादा हाेकर 23 कराेड़ से अधिक हाे जाएगी. फिलहाल, दक्षिण भारत के राज्याें के साथ हिमाचल दक्षिण भारत के राज्याें के साथ हिमाचल प्रदेश और पंजाब में बुजुर्गाें की आबादी अपेक्षाकृत अधिक है. अनुमान है कि 2036 तक राज्याें के बीच यह अंतर और बढ़ जाएगा. अ्नटूबर-2025 में पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के एक अधिकारिक बयान के अनुसार,परिवार और संस्थागत सहयाेग,इन दाेनाें की कमी के कारण बुजुर्गाें की मुश्किलें लगातार बढ़ रही है. उन्हें कई तरह की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी और अन्य चुनातियाें से जूझना पड़ रहा है. भारत में सार्वजनिक स्थान और परिवहन अव्यवस्था भी काफी हद तक बुजुर्गाेर् के अनुकूल नहीं है.
इन समस्याओं के साथ एक नई चुनाैती भी जुड़ गई है. तेज से बदलती डिजिटल दुनिया और नई तकनीकाें काे अपनाना अधिकांश बुजुर्गाें के लिए आसान नहीं है. हालांकि, केंद्र सरकार ने अटल पेंशन याेजना और राष्ट्रीय वयाेश्री याेजना जैसी कई पहल शुरू की हैं,पर केरल की कहानी पूरे देश के लिए एक सीख है, क्योंकि उसने बुजुर्गाें पर विशेष ध्यान देने की दिशा में सबसे पहले कदम उठाए. लाेग खाड़ी देशाें में काम करन के गए और उससे जाे विदेशी धन (रेमिटेंस) आया, उससे आधुनिक घर बनाने और पढ़ाई-लिखाई में ताे मदद मिली, लेकिन इसने घराें काे खाली भी कर दिया.
आज केरल में हर पांच में से लगभग एक व्य्नित 60 वर्ष से अधिक उम्र का है, जाे देश के बड़े राज्याें में सबसे अधिक है. अनुमान है कि 2030 तक हर चार में से एक व्य्नित बुजुर्ग हाेगा. कम जन्म दर, बढ़ती औसतन आयु और कामकाजी लाेगाें के पलायन ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि कई जिलाें में बुजुर्ग दंपति या विधवाएं घराें में अकेली रह रही हैं. इस बदलाव की मानवीय कीमत साफ और दर्दनाक है.
कई बुजुर्ग पूरी तरह स्वयंसेवकाें पर निर्भर हैं. विधवाएं सीमित आय में अकेले जीवन बिताने काे मजबूर हैं. जबकि अवसाद और उम्र से जुड़ी बीमरियाें के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.
प्रवासन विशेषज्ञ एस इरुदया राजन ने सेंटर फ्राॅर डेवलपमेंट स्टडीज में अपने लंबे शाेध के दाैरान इस खामाेश संकट की ओर वर्षाें पहले ही ध्यान दिलाया था. संयु्नत परिवार टूट चुके हैं. माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकाें का भरण-पाेषण एवं कल्याण अनियम, 2007 माैजूद ताे है, पर इसे ठीक से लागू नहीं किया जाता है. केरल के नये संस्थान कल्याण याेजनाओं, कानूनी सुरक्षा व नीतिगत याेजना काे एक साथ जाेड़कर इस स्थिति काे बदलने का प्रयास कर रहे हैं.
यह पहल काफी हद तक जापान के अनुभव से प्रेरित है.
जापान बहुत पहले ही तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी (सुपर -एजिंग) की चुनाैती का सामना कर चुका है. तब वहां बुजुर्गाें काे बड़े संस्थानाें में रखने के बजाय सामुदायिक देखभाल, असिस्टेड लिविंग और घर पर देखभाल जैसी व्यवस्थाओं काे बढ़ावा दिया गया. केरल भी इसी दिशा में बढ़ रहा है.
वह घर पर देखभाल की व्यवस्था काे मजबूत करना चाहता है, ताकि बुजुर्ग अपने परिचित माहाैल और पड़ाेस में सम्मान के साथ जी सकें. नीति में फेमिनिज्म ऑफ एजिंग यानी बुजुर्ग आबादी में महिलाओं की संख्या पुरुषाें की तुलना में अधिक हाेने पर भी खास ध्यान दिया गया है. सेवानिवृत्त हाे चुके पेशेवराें के लिए प्रस्तावित स्किल बैंक उनके अनुभव और विशेषज्ञता का बेहतर उपयाेग सुनिश्चित कर सकता है, ताकि 60 वर्ष की उम्र के बाद उन्हें अनुपयाेगी न माना जाए. स्कूलाें में जागरुकता अभियान चलाकर अलग-अलग पीढ़ियाें के बीच रिश्ताें काे मजबूत करने की काेशिश की जा रही है. बेशक, केरल भी इस नई व्यवस्था काे लागू करने की चुनाैतियाें से अछूता नहीं है, क्योंंकि बुजुर्गाें के इलाज में विशेषज्ञ डाॅ्नटराें मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञाें की कमी और लगातार वित्तीय संसाधन जुटाना आसान नही हाेगा.अलगअलग सरकारी विभागाें के बीच बेहतर तालमेल बनाना भी प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा साबित हाेगा. फिर भी वह इस बात के लिए सराहना का पात्र है कि उसने बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्याओं काे केवल दया या कल्याण का विषय नहीं.
बल्कि शासन की मुख्य प्राथमिकता माना है.
यह प्रयाेग केरल की सीमाओं से परे भी मायने रखता है.
जैसे-जैसे दूसरे राज्याें में शहरीकरण बढ़ेगा, जन्म दर घटेगी और लाेगाें का पलायन बढ़ेगा, वैसे-वैसे वहां भी इसी तरह की सामाजिक चुनाैतियाें सामने आएंगी. उत्तर प्रदेश इसका एक उदाहरण है. फिलहाल, राज्य की आबादी अपेक्षाकृत युवा है. लेकिन अनुमान है कि 2011 में 7 प्रतिशत रही बुजुर्ग आबादी 2036 तक बढ़कर 12 प्रतिशत हाे जाएगी. इस चुनाैती काे देखते हुए राज्य सरकार ने आयुष्यमान ्नयाे वंदना कार्ड शुरू किया है. इसके तहत आयुष्यमान भारत प्रधानमंत्री जन-आराेग्य याेजना (एबी-पीएम जय) के अंतर्गत 70 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लाेगाें काे हर साल पांच लाख रुपये तक का मुफ्त और कैशलेस स्वास्थ्य बीमा मिलता है.
लेकिन, केवल स्वास्थ्य बीमा ही पर्याप्त नहीं है. बुजुर्गाें की समस्याएं इससे कहीं व्यापक हैं और उनके समाधान के लिए हर स्तर पर समग्र नीति और ठाेस प्रयास जरूरी हाेंगे.
- पत्रलेखा चटर्जी, वरिष्ठ पत्रकार