युवाओं के छात्र आंदाेलन काे राजनीतिक धार मिली

    24-Jul-2026
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sochvichar
 
काॅकराेच आंदाेलन ही मैं इसे कहूंगा. इस आंदाेलन ने हमें चाैंका दिया है. इसका मतलब साफ है कि युवाओं में गुस्सा बढ़ता जा रहा है. वे निराश हैं, तकलीफ में है और इंसाफ मांग रहे हैं, मगर उनकी आवाज काे अनसुना किया जा रहा है. सवाल सिर्फ शिक्षा मंत्री धमेंद्र प्रधान के इस्तीफे का नहीं है, सवाल अब सरकार के इकबाल और उसकी जवाबदेही का हाे गया है. यह आंदाेलन अब कुछ लाेगाें के हाथाें से निकलकर आम जनता का हाे गया है.
 
इस आंदाेलन की आवाज में अब लाेकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी अपनी आवाज मिला दी है. वह छात्राें पर हुए पुलिसिया अत्याचार के विराेध में अचानक प्रधानमंत्री आवास के सामने जाकर धरने पर बैठ गए, वैसे, राहुल नीट पेपर लीक पर लगातार आवाज बुलंद करते रहे हैं. काेटा और देहरादून में वह छात्राें से रूबरू हुए, मगर उनके इस हस्तक्षेप ने सरकार की परेशानी और बढ़ा दी है. शरद पवार और दूसरे नेता भी अब छात्राें की भीड़ में शामिल हाे रहे हैं.
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी ने मंगलवार की सुबह एनडीए की बैठक में अपने संबाेधन के जरिये छात्राें काे यह संदेश देने की काेशिश की कि उनके हिताें के प्रति सरकार सजग है और पेपर लीक के लिए जिम्मेदार लाेगाें के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई हाेगी. हालांकि, छात्राें का गुस्सा आज का नहीं है. हर बार जब पेपर लीक हुआ. ताे छात्र सड़क पर उतरे और हर बार उनकी बाताें काे सुना नहीं गया. उन्हें बदले में मिलीं लाठियां,यह सब कुछ दिल्ली से बाहर हाे रहा था. मीडिया ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया. ऐसे में, गुस्सा खदबदाता रहा. जब प्रधान न्यायाधीश ने अपनी एक टिप्पणी में काॅकराेच शब्द का प्रयाेग किया और पांच दिन मेंं दाे कराेड़ से ज्यादा लाेग काॅकराेच जनता पार्टी से जुड़ गए, ताे यह एक असामान्य घटना थी. इसका साफ अर्थ था कि जमीन पर कुछ हाे रहा था, जिसकी हवा हम लाेगाें काे नहीं थी.
 
जब जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन का ऐलान हुआ और शुरू में भीड़ नहीं जुटी, ताे लगा कि यह काेई बुलबुला था, जाे फट गया. फिर साेनम वांगचुक की एंट्री. ने हवा काे थाेड़ा बदला, आंदाेलन काे थाेडी नैतिक आभा दी, लेकिन जब 17वें दिन उनकी तबियत खराब हाेने की खबर आई, ताे हवा बदलने की फिर आहट आई और विस्फाेट हुआ, जब उन्हें जबरन उठा लिया गया. संसद मार्च ने सबकाे गलत साबित किया, लेकिन यहां से अब आगे ्नया? ्नया यह जेपी आंदाेलन साबित हाेगा, जिसने इंदिरा गांधी की सरकार पलट दी या फिर अन्ना का आंदाेलन, जिसने यूपीए सरकार की जड़ाें में मट्ठा डाल दिया? हर आंदाेलन की अपनी तासीर हाेती है और एक सीमा, क्योंकि वह अपने व्नत से नाराज लाेगाेंं का आवेश हाेता है, जाे इंसाफ की पुकार करता है. इंदिरा गांधी के समय में छात्राें में आवेश था, बढ़ती बेराेजगारी व महंगाई से नाराजगी थी. उनका आंदाेलन गुजरात से शुरू हुआ और बाद में भारत छाेड़ाे आंदाेलन के नायक जय प्रकाश नारायण ने बुढ़ापे में इसकाे लीड किया. इंदिरा गांधी अपने अहंकार व असुरक्षा बाेध में इसकाे नहीं समझ पाईं और आपातकाल लगाकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली.
 
अन्ना आंदाेलन की तुलना में काॅकराेच आंदाेलन कई मामले में काफी भिन्न है. एक, अन्ना और जेपी आंदाेलन की कमान मजबूत हाथाें में थी. केजरीवाल के साथ सिविल साेसायटी के नामी-गिरामी लाेग थे, जिनकी देश भर में प्रतिष्ठा थी. उनके साथ एक पूरी टीम थी और एक चेन ऑफ कमांड थी. अन्ना चेहरा थे, लेकिन केजरीवाल उस आंदाेलन के रचयिता थे. ऐसा काॅकराेच आंदाेलन के बारे में नहीं कह सकते. इस आंदाेलन की नेतृत्व क्षमता पर गहरे सवाल हैं.
 
दाे, काॅकराेच आंदाेलन की वैसी तैयारी नहीं दिखती, जैसी अन्ना आंदाेलन में थी. केजरीवाल ने आंदाेलन शुरू करने के पहले काफी हाेमवर्क किया था. लाेकपाल बिल काे लेकर काफी सलाह-मशविरा किया गया था और साथ ही आंदाेलन के पहले काॅलेजाें, विश्वविद्यालयाें व सिविल साेसायटी के लाेगाेंं से मिलकर उन्हें भराेसे में लेकर आंदाेलन शुरू किया गया था. इस आंदाेलन में तैयारी की कमी साफ दिखती है. काॅकराेच आंदाेलन अन्ना आंदाेलन की तुलना में कहीं ज्यादा स्वत: स्फूर्त है.
 
 
तीन, काॅकराेच आंदाेलन एक व्य्नित विशेष काे टार्गेेट कर रहा है. यह शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़ा हुआ है, जबकि अन्ना आंदाेलन व्य्नित की जगह सिस्टम पर हमले कर रहा था. वह व्यवस्था पर सीधे प्रहार कर रहा था.
उसकाे बदलने की बात कर रहा था.
 
चार, अन्ना आंदाेलन ने सिर्फ सवाल खड़े नहीं किए, बल्कि उसने समाधान देने की भी काेशिश की. उसका तर्क था, भ्रष्ट्राचार से निपटने के लिए लाेकपाल कानून बनना चाहिए और उसकी जद में प्रधानमंत्री तक काे हाेना चाहिए.
 
लेखपाल बिल अन्ना आंदाेलन का सबसे विवादास्पद पहलू था. बुद्धिजीवी वर्ग इस मसले पर काफी बंटा हुआ था. एक तबके काे लग रहा था कि संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री के ऊपर एक सुपरमैन काे आराेपित किया जा रहा है.
 
पांच, काॅकराेच अांदाेलन एक ऐसे समय में अस्तित्व में आया है, जब समाज में अस्तित्व में आया है, जब समाज में विचारधारा के स्तर पर जबरदस्त ध्रुवीकरण है.
 
माहाैल ज्यादा विषा्नत और आक्रामक है. अन्ना आंदाेलन के समय ऐसा नहीं था. सरकार ज्यादा संवेदनशील थी. उसने जंतर-मंतर हाे या फिर रामलीला मैदान, आंदाेलनकारियाें से संवाद बनाए रखा था और उनकी मांगाें पर सहानुभूतिपूर्वक विचार हाे रहा था, जरूरी कदम भी उठाए गए थे.
 
छह. अन्ना आंदाेलन काे मुख्यधारा के मीडिया, खासकर टीवी ने बहुत बड़ा कर दिया था. मीडिया का ऐसा समर्थन आज अनुपस्थित है. जब युवा सड़काें पर उतर गए, भीड़ बेतहाशा बढ़ गई, ताे आंदाेलन काे कवर करना मजबूरी हाे गई. - आशुताेष, वरिष्ठ पत्रकार