कल दाेपहर, जब काॅकराेच जनता पार्टी आंदाेलनकारियाें ने संसद की ओर कूच किया, ताे सत्ता के नशे में चूर सरकार ने-जाे किसी भी किस्म का विराेध सहना ताे एक तरफ,असहमति तक बर्दाश्त नहीं करती अपने अहंकार में उन युवाओं पर हाथ उठाया जिन्हाेंने सिर्फ उपवास किया था, धरना दिया और अपनी बात रखी थी. बीती दाेपहर हुई ध्नका-मु्नकी, लाठीचार्ज, खून बहना और आंसू गैस के दृश्य भुलाना मुश्किल हाेगा. यह उस घटनाक्रम का नतीजा था जाे शनिवार सुबह, 18 जुलाई काे शुरू हुआ था, जब इस आंदाेलन से जुड़े सबसे जाने-माने चेहराें में से एक, साेनम वांगचुक काे पुलिस ने बेहद कमजाेर व बेबुनियाद कारणाें के आधार पर वहां से हटाया. शनिवार और रविवार काे उनकी गैर-माैजूदगी में भी जंतर-मंतर पर विराेध प्रदर्शन अनवरत जारी रहा.
तथापि, अगर इस हिंसा के पीछे मकसद आंदाेलन काे ताेड़ना था, ताे पिछले कुछ दिनाें ने इसके उलट साबित कर दिखाया. इससे काेई फर्क नहीं पड़ता कि आंदाेलन किसने शुरू किया. अब इसका नेतृत्व काैन कर रहा, या वहां माैजूद सभी हर मुद्दे पर सहमत हैं. या नहीं. मायने यह रखता है कि युवाओं ने इतनी बड़ी संख्या में आकर सामूहिक राेष जताया. यह किसी एक चेहरे, नाम या पार्टी से कहीं बड़ी बात है. अपने आप में लाेकंतत्र की जबरदस्त लहर है. मैंने अपने सामने यह हाेते देखा, पहले शनिवार काे और फिर आज मैं 18 जुलाई काे जंतर- मंतर पर उपवासरत छात्राें के साथ एकजुटता दिखाने गया था. पहले इसलिए नहीं जा सका कि दिल्ली से बाहर, अपने गृह राज्य में कुछ जरूरी और न टाली जा सकने वाली प्रतिबद्धताओं में व्यस्त था. जब उस सुबह साेनम वांगचुक काे हिरासत में लेने की खबर मिली, ताे कुछ पल के लिए साेचा कि ्नया ऐसे समय में विराेध स्थल पर जाना उचित हाेगा. मैंने साेचा कि अवश्य ही माहाैल मायूसी भरा हाेगा. फिर खुद काे याद दिलाया कि एकजुटता दिखाने का असली औचित्य ताे तभी है, जब आंदाेलन काे डराने या हाैसला ताेड़ने की काेशिश की जा रही हाे.
जंतर-मंतर पर मैंने जाे देखा, वह मेरी कल्पना से बिल्कुल अलग था. मायूसी और थकावट के बजाय, दृढ़ संकल्प और हिम्मत व्याप्त देखी. माहाैल आशा, नैतिक विश्वास और सामूहिक मकसद के असाधारण भाव से कवरेज था. ये सब युवा काॅकराेच जनता पार्टी के बैनर तले इकठ्ठा थे. ऐसा नाम जाे विद्राेह दर्शाता है. जब तंत्र के सबसे ऊंचे ओहदाें में से एक की ओर से देश के बेराेजगार युवाओं की तुलना के लिए काॅकराेच जैसे अपमानजनक शब्द का प्रयाेग किया गया, ताे युवाओं ने इस ताने काे बताैर पहचान अपना लिया.
सामाजिक आंदाेलनाें के समाजशास्त्र का अध्ययन करने, पढ़ाने और उनमें शामिल हाेने के पीछे मनाेस्थिति का अध्ययन दशकाें तक करने के बाद, मैं इस विराेध का विश्लेषण अकादमिक और राजनीतिक दाेनाें नजरियाें से किए बिना नहीं रह सका. क्योंकि इसमें वे कई खूबियां थीं जिसकी तलाश नव सामाजिक आंदाेलनाें के सिद्धांतकार लाेकतांत्रिक संबंधाें में करते हैं. सिर्फ लिखित सामग्री बांटने वाले या वर्ग-हिताें के आधार पर हाेने वाले पारंपरिक आंदाेलनाें के उलट, यह जनांदाेलन लाेकतंत्र की जगह संवैधानिक नैतिक व नागरिकता की गरिमा बहाल करने के बारे में भी उतना ही था. एलेन टुलेन का तर्क कि ऐसे आंदाेलन समाज की दशा तय करने के लिए आखिरी उपाय हाेते हैं. यानी उन मूल्याें काे परिभाषित करना, जिनके साथ लाेग जीना चाहते हैं. यह मुहिम ठीक उसे परिभाषित करती ताे लगी जाे ये युवा हासिल करना चाह रहे. अल्बर्टाे मेलुची की अंतर्दृष्टि कि ऐसे अवसराें पर ताकत संगठनात्मक अनुक्रम के बजाय सामूहिक पहचान व साझा अर्थाें से चलित हाेती है, वह यहां साफ दिखी कि कैसे अजनबी लाेग एक साझे मकसद हेतु साथी बन गए. फिर भी, मेरे मन में जाे बात सबसे ज्यादा बनी है.
उसका संबंध ढांचे के बारे में अधिक न हाेकर उस बिंदु पर है जाे इस पहली बड़ी लामबंदी ने अपने बारे में साबित किया और यहां बीते कुछ दिनाें में हुआ दमन जानेअनजाने, इस आंदाेलन का सबसे मजबूत सबूत बन गया.
इतनी बड़ी संख्या मेंं लाेगाें का इकठ्ठा हाेना, हुजूम में भी इतना जुड़ाव पर्याप्त सकून है कि यह आंदाेलन मात्र प्रभाव बनने के लिए किया गया दिखावटी विराेध नहीं.
इसके स्वरूप में असल शिकायताें और सच्ची प्रतिबद्धता से उपजी झलक है. न कि यह जिसकी उम्मीद सरकारें अ्नसर करती हैं कि ्नया यह आंदाेलन क्षणिक चिंगारी है जाे जल्द बुझ जायेगी. सबसे बड़ी बात यह है कि जिस सुबह इसके सबसे जाने- पहचाने चेहरे काे जाती हिरासत ले दर्शा जाया गया, तब भी समूह ने न काेई गल्ती की न ही बिखरा, बल्कि अपनी जगह शांति और संयम के साथ बनाए रखी. जाे यह परिप्नवता, ताे दृढ़ संकल्प दर्शाती है. वे खूबियां जिन्हें असर युवाओं से जाेड़कर नहीं देखा जाये. इसने अ्नसर दिया कि आंदाेलन मुख्य नेता के बिना भी चल सकता है. आंदाेलन जाे शनिवार सुबह अपने सबसे प्रमुख चेहरे काे जाती हिरासत लेकर ले दर्शा जाया गया. खाेने के बाद भी सप्ताहांत पर डटा रहा और फिर साेमवार काे संसद तक मार्च कर सका.
क्योंकि इस सवाल का जवाब देने का संकल्प कर रखा था कि ्नया टिके रहना किसी एक व्य्नित पर निर्भर है. एकत्र हाेने की भावना इसलिए इतनी व्यापक हाे गई कि इसने नागरिकाें के बहुत बड़े काे की नब्ज छुआ. हर काेई अपनीअपनी चिंताओं की वजह से आया, यहां कि उन्हें अपनी चिंताओं हेतु साझा भाषा मिली. - मनाेज कुमार झा