फ्रेड्रिक नीत्शे में भी बुद्ध जैसी प्रतिभा थी !

    25-Jul-2026
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Osho
 
खयाल रखना, पागल हाेने के लिए भी थाेड़ी प्रतिभा चाहिए. तुमने कमी किसी बुद्धू काे पागल हाेते देखा? किसी जड़बुद्धि काे तुमने पागल हाेते देखा ? ताे किसी काे पागल हाेते देख कर जड़बुध्दि भी प्रसन्न हाेता हाेगा कि अहा, हम ही धन्यभागी हैं ! जरूर पिछले जन्म में कुछ पुण्य-कर्म किए हाेंगे, तभी ताे परमात्मा ने जड़बुद्धि बनाया है! नहीं ताे देखाे क्या हालत हाे रही है ! तुम यह जानते हाे कि दुनिया में जाे भी श्रेष्ठतम प्रतिभा के लाेग हुए हैं, उनमें से बहुताें काे पागल हाेना पड़ा है ? क्याें? प्रतिभा में खतरा है, क्याेंकि जब तुम प्रतिभा के शिखर छूते हाे ताे गिरने का डर है. ्रेड्रिक नीत्शे पागल हाेकर मरा. लेकिन चिमनभाई देसाई पाेरबंदर वाले, अगर मुझे चुनाव करना हाे कि चिमनभाई देसाई हाेना कि ्रड्रिक नीत्शे, मैं ्रेड्रिक नीत्शे हाेना पसंद करूंगा.
 
मुझे अगर चुनाव करना हाे कि महात्मा गांधी हाेना कि ्रेड्रिक नीत्शे, मैं ेड्रिक नीत्शे हाेना पसंद करूंगा, पागल हाे कर मर जाना बेहतर है, मगर मुंह पर मिट्टी का तेल थाेपने काे मैं राजी नहीं. यह पागल हाेने से भी बदतर बात हाे गयी. आखिर ्रेड्रिक नीत्शे अपनी प्रतिभा की ऊंचाइयाें के कारण पागल हुआ.बच सकता था पागल हाेने से. काश उसकाे ध्यान की कला मिल जाती ताे वह बुद्धत्व काे उपलब्ध हाेता ! ्रेड्रिक नीत्शे में वही क्षमता थी जाे बुद्ध में थी. मैंने दाेनाें काे बहुत बारीकी से छाना बीना है. उसमें वही सूझबूझ है.
उसमें वही अंतर्दृष्टि है, वही पैनापन, वही निखार, वही तेज है- जाे बुद्ध में है. थाेड़ी ज्यादा ही, कम नहीं.
 
बस चूक हाे गयी ताे एक कि उसे भीतर जाने का काेई उपाय न मिले. और प्रतिभा इतनी थी कि बाहर से राजी न हुई. जल्दी ही उसे बाहर जाे था वह सब व्यर्थ दिखाई पड़ने लगा और भीतर जाने का मार्ग मालूम नहीं. इस दुविधा में पागल हुआ. मगर यह पागल हाेना साैभाग्यपूर्ण ्रेड्रिक नीत्शे दूसरे जन्म में बुद्ध हाेगा ही. मगर महात्मा गांधी काे बहुत जन्म लग जाएंगे. शायद चाैरासी काेटि याेनियाें में भटकें ताे भी अगर बुद्ध हाे जाएं ताे चमत्कार. क्याेंकि वे चरखा अगर कातते ही रहे, कातते ही रहे, कातते ही रहे, ताे क्या कराेगे ? चरखा ही कातते रहे ताे बस चरखा ही हाे जाएंगे.
 
विसेंट वानगाॅग ने आत्महत्या की- पश्चिम के बहुत बड़े चित्रकार ने. इन दाे साै वर्षां में पश्चिम में उसके मुकाबले में काेई चित्रकार नहीं हुआ.और आत्महत्या क्याें की ? क्याेकि बाहर का जाे भी चित्रण करना था, चित्रण हाे चुका. एक चित्र काे बनाने में, अंतिम चित्र काे बनाने में एक वर्ष लगाया- सूर्याेदय के चित्र काे बनाने में. वह उसकी जीवन भर की आकांक्षा थी कि एक ऐसा सूर्याेदय बना जाऊं, जैसा कभी किसी ने न बनाया हाे. और जब वह पूरा हाे गया ताे उसने गाेली मार ली. सूर्याेदय बनाने में पागल भी हुआ, एक साल पागल रहा, क्याेंकि चाैबीस घंटे सूर्य की सारी कलाओं का अध्ययन कर रहा था, ्रांस में जहां सूरज सब से ज्यादा तेजी से चमकता है, चाैबीस घंटे सूरज काे देखते-देखते उसका सिर भन्नाने लगा. मगर चित्र बना गया. जिस दिन चित्र बन गया, उस दिन उसने गाेली मार ली. पत्र लिखा अपने भाई काे, कि मेरा काम पूरा हाे गया, अब ताे कुछ और चित्र बनाने काे बचा नहीं. काश इस आदमी काे ध्यान का पता हाेता ताे एक नई दुनिया मिल जाती चित्र बनाने की, जिसका कभी अन्त नहीं हाेता है ? बाहर की दुनिया की सीमा है, भीतर की दुनिया की काेई सीमा नहीं है. लेकिन अगर मुझे चुनाव करना हाे चरखा कातने में और विंसेंट वानगाॅग के चित्र बनाने में ताे मैं विसेंट वानगाॅग हाेना पसंद करूंगा; िफर चाहे एक साल पागल हाे जाऊं और िफर चाहे आत्महत्या क्याें न करनी पड़े. इस आत्महत्या में भी गरीब है. इस पागलपन में भी प्रतिभा की घाेषणा है.