देशभर में विभिन्न छात्र आंदोलनों, प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई की घटनाओं ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर छात्रों के संवैधानिक अधिकार क्या हैं? आंदोलन की कानूनी सीमाएँ क्या हैं? पुलिस कब कार्रवाई कर सकती है? गिरफ्तारी की स्थिति में छात्रों के अधिकार क्या होते हैं? और शिक्षकों की क्या जिम्मेदारी बनती है? इन्हीं महत्वपूर्ण सवालों पर एड. बी.एस.धापटे ने अपनी राय व्यक्त की. प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश
प्रश्न- क्या छात्रों को आंदोलन करने का कानूनी अधिकार प्राप्त है?
उत्तर- बिल्कुल, भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार देता है. संविधान के अनुच्छेद 19(1) (र), 19(1)(ल) और 19(1)(ल) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण एवं निरस्त्र सभा करने तथा संगठन बनाने का मौलिक अधिकार सुनिश्चित किया गया है. इसका अर्थ है कि छात्र, शिक्षक या कोई भी नागरिक सरकार की नीतियों अथवा जनहित के किसी मुद्दे पर शांतिपूर्ण आंदोलन कर सकता है. हालांकि यह अधिकार पूर्णतः असीमित नहीं है. यदि सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, यातायात या अन्य नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं, तो सरकार उचित और कानूनी प्रतिबंध लगा सकती है. आंदोलन करते समय कानून का पालन, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और पूर्ण अहिंसा बनाए रखना आवश्यक है. सर्वोच्च न्यायालय ने हिमत लाल के. शाह बनाम पुलिस आयुक्त तथा मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामलों में भी स्पष्ट किया है कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित है, लेकिन उसका प्रयोग कानून की सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए.
प्रश्न- आंदोलन के दौरान किन परिस्थितियों में छात्रों पर आपराधिक मामला दर्ज हो सकता है?
उत्तर- सिर्फ आंदोलन में भाग लेना किसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता. यदि प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण है, तो केवल वहाँ मौजूद होने के आधार पर किसी छात्र के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता. लेकिन यदि प्रदर्शन के दौरान अवैध जमाव बनता है, पुलिस के वैध आदेशों का उल्लंघन होता है, सरकारी कार्य में बाधा डाली जाती है, हिंसा होती है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है या सरकारी कर्मचारियों पर हमला किया जाता है, तो भारतीय न्याय संहिता (भारतीय न्याय संहिताबीएनएस) की संबंधित धाराओं के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत भूमिका को देखता है. केवल भीड़ में मौजूद होना किसी को स्वतः अपराधी नहीं बना देता. जांच एजेंसी को यह सिद्ध करना होता है कि संबंधित व्यक्ति की वास्तविक भूमिका क्या थी और क्या वह किसी हिंसक गतिविधि में शामिल था.
प्रश्न- यदि किसी छात्र की गिरफ्तारी होती है, तो उसके कानूनी अधिकार क्या हैं?
उत्तर- गिरफ्तारी की प्रक्रिया भी पूरी तरह कानून से नियंत्रित होती है. पुलिस किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय गिरफ्तारी का कारण बताने, गिरफ्तारी का विधिवत अभिलेख तैयार करने, उसके परिजनों को सूचना देने तथा निर्धारित समय के भीतर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए बाध्य है. यदि मामला जमानती है, तो आरोपी को कानून के अनुसार जमानत प्राप्त करने का अधिकार भी है. यदि गिरफ्तार व्यक्ति नाबालिग छात्र है, तो उसके मामले में किशोर न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम लागू होगा. ऐसे छात्र के साथ किसी वयस्क अभियुक्त जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता. सर्वोच्च न्यायालय ने डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के ऐतिहासिक निर्णय में गिरफ्तारी के दौरान पुलिस द्वारा पालन किए जाने वाले दिशा-निर्दे शों को अनिवार्य बनाया है. इसलिए गिरफ्तारी को सजा नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया का एक हिस्सा माना जाता है.
प्रश्न- क्या पुलिस को आंदोलन के दौरान लाठीचार्ज करने का अधिकार है?
उत्तर-पुलिस का प्राथमिक दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना है. यदि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए या हिंसा फैलने लगे, तो पुलिस भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग कर सकती है. लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है. कानून कहता है कि बल प्रयोग केवल आवश्यकता पड़ने पर, न्यूनतम स्तर पर और अंतिम विकल्प के रूप में किया जाना चाहिए. यदि प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण हो, तो बिना पर्याप्त कारण सीधे लाठीचार्ज करना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं माना जाएगा. सर्वोच्च न्यायालय ने रामलीला मैदान प्रकरण बनाम भारत संघ के गृह सचिव तथा अनिता ठाकुर बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य मामलों में स्पष्ट किया है कि पुलिस कार्रवाई अनुपातिकता के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए. अर्थात जितनी आवश्यकता हो, उससे अधिक बल प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए.
प्रश्न- छात्रों और शिक्षकों को आंदोलन करते समय किन कानूनी सावधानियों का पालन करना चाहिए?
उत्तर- लोकतंत्र में आंदोलन एक वैध और प्रभावी माध्यम है, लेकिन उसका संचालन पूरी तरह संवैधानिक और शांतिपूर्ण होना चाहिए्.छात्रों और शिक्षकों को आवश्यक होने पर संबंधित प्रशासन से अनुमति लेनी चाहिए, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करनी चाहिए, पुलिस प्रशासन के साथ सहयोग करना चाहिए और किसी भी प्रकार की हिंसक गतिविधि से दूर रहना चाहिए. कुछ लोगों की हिंसा पूरे आंदोलन की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगा सकती है और निर्दोष छात्रों को भी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है.शिक्षकों की जिम्मेदारी केवल छात्रों का नेतृत्व करना नहीं, बल्कि उन्हें संविधान, कानून, मौलिक अधिकारों और कानूनी दायित्वों के प्रति जागरूक करना भी है.लोकतंत्र में विरोध का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि उस अधिकार का प्रयोग दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हुए किया जाए. यही संवैधानिक संस्कृति और लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहचान है.