भाेपाल, 26 जुलाई (वि.प्र.) सुप्रीम काेर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने शनिवार काे कहा कि भारत में अलगअलग विचाराें के लिए जगह लगातार कम हाेती जा रही है. उन्हाेंने कहा कि हालात ऐसे हाे गए हैं कि अपने अधिकाराें के लिए प्रदर्शन करने वाले छात्राें काे गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें जमानत भी नहीं मिलती. अगर जमानत मिल भी जाती है, ताे अदालतें ऐसी सख़्त शर्तें लगा देती हैं, जाे उनकी आजादी काे गंभीर रूप से सीमित कर देती हैं.
उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब काॅकराेच जनता पार्टी के लंबे प्रदर्शन के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान काे इस्तीफा देना पड़ा, जिसके बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी प्रदर्शन समाप्त करने की घाेषणा की गई. करीब एक महीने तक चले प्रदर्शन में 20 जुलाई काे संसद मार्च के दाैरान बड़े पैमाने पर हिंसा देखी गई थी, जिसमें कई प्रदर्शनकारी और कुछ पुलिसकर्मी घायल हुए थे.
जस्टिस भुइयां के बयान काे लेकर साेशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं और लाेग इसे भारत में असहमति की आवाजाें के सीमित किए जाने की तसदीक मान रहे हैं. दरअसल, जस्टिस भुइयां ने कहा कि ‘असहमति जताने के वैध तरीक़ाें काे भी अब अपराध’ बना दिया जाता है. उन्हाेंने आम ताैर पर जमानत न दिए जाने और जमानत देने के बाद भी सेल्फ-सेंसरशिप लगाए जाने के चलन पर चिंता की. उन्हाेंने गंगा के बीच नाव पर इफ्तार पार्टी करने वाले कुछ युवाओं काे जमानत न दिए जाने पर भी सवाल उठाया. जस्टिस भुइयां राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय, भाेपाल में आयाेजित पांचवें जस्टिस जी.पी. सिंह स्मृति व्याख्यान में बाेल रहे थे. उन्हाेंने कहा कि भारत के विश्वविद्यालय ऐसे स्थान हाेने चाहिए जहां छात्र इन सभी मुद्दाें पर आलाेचनात्मक साेच और शाेध कर सकें, न कि उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए. जस्टिस भुइयां ने कहा कि अपने विचार व्यक्त करने और शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने का अधिकार नागरिकाें की बुनियादी स्वतंत्रता है. बहस और असहमति लाेकतंत्र की आत्मा हैं.
उन्हाेंने कहा, दुर्भाग्य से अब वैध गतिविधियाें काे भी अपराध बना दिया जाता है. पर्यावरण के बिगड़ते हालात एक सच्चाई हैं उसके खिलाफ अपनी पीड़ा जाहिर करने वाले लाेगाें काे ऐसे खदेड़ा जाता है, जैसे वे अपराधी हाें. अपने कैंपस में विराेध करने वाले छात्राें काे गिरफ्तार किया जाता है और उन्हें 30-40 दिन जमानत भी नहीं मिलती.