हाल ही में सर्वाेच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवादाें के एक चिंताजनक पक्ष पर गंभीर चिंता व्यक्त की है. न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने माैखिक रूप से टिप्पणी की कि वैवाहिक विवादाें के दाैरान पति या पत्नी द्वारा एक-दूसरे के नियाेक्ता अथवा वरिष्ठ अधिकारियाें काे शिकायत-पत्र भेजने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. न्यायालय ने कहा कि ऐसी शिकायताें के परिणामस्वरूप कई बार संबंधित व्यक्ति की नाैकरी चली जाती है या उसका सेवा-जीवन गंभीर रूप से प्रभावित हाेता है.
न्यायालय के अनुसार, तलाक का मुकदमा लड़ना एक अलग बात है, किंतु किसी व्यक्ति की आजीविका और पेशेवर प्रतिष्ठा काे संकट में डाल देना कहीं अधिक गंभीर है. यदि किसी व्यक्ति की नाैकरी ही समाप्त हाे जाए, ताे इसका प्रतिकूल प्रभाव भरण पाेषण (मेंटेनेंस) जैसे वैधानिक दायित्वाें पर भी पड़ सकता है.
पिछले पांच दशकाें में विभिन्न उच्च न्यायालयाें और सर्वाेच्च न्यायालय ने अनेक अवसराें पर यह स्पष्ट किया है कि वैवाहिक विवादाें के दाैरान पति या पत्नी द्वारा एक-दूसरे के नियाेक्ता अथवा वरिष्ठ अधिकारियाें के समक्ष अप्रमाणित अथवा मानहानिकारक शिकायतें करना केवल व्यक्तिगत प्रतिशाेध का माध्यम नहीं है, बल्कि इससे संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा, सेवा-जीवन और आजीविका पर भी गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. न्यायालयाें ने समय-समय पर ऐसे आचरण काे मानसिक क्रूरता के दृष्टिकाेण से परखा है तथा परिस्थितियाें के अनुसार इसे वैवाहिक संबंध-विच्छेद का आधार भी माना है. इस संबंध में सबसे प्रारंभिक और उल्लेखनीय निर्णयाें में से एक ‘शकुंतला कुमारी बनाम ओम प्रकाश घई’ (दिल्ली उच्च न्यायालय, 1980) का है.
इस मामले में अलग रह रही पत्नी ने लाेकसभा सचिवालय काे, जहां उसका पति कार्यरत था, पत्र लिखकर उस पर दुर्व्यवहार तथा अन्य गंभीर आराेप लगाए. न्यायालय ने पाया कि यदि पत्नी का उद्देश्य केवल भरण-पाेषण प्राप्त करना था, ताे उसके लिए यह कहना पर्याप्त था कि उसे भरण-पाेषण नहीं मिल रहा है. इसके लिए पति तथा उसके परिवार के विरुद्ध गंभीर आराेप लगाने की आवश्यकता नहीं थी. न्यायालय ने इस प्रकार की शिकायताें के प्रभाव पर टिप्पणी करते हुए कहा, ‘नियाेक्ता के समक्ष इस प्रकार की असत्य शिकायत करना निस्संदेह मानसिक क्रूरता है. इससे कर्मचारी की अपने नियाेक्ता की दृष्टि में प्रतिष्ठा धूमिल हाेती है तथा उसके सेवा-जीवन और पदाेन्नति की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. स्वाभाविक रूप से इसका उसके मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है और उसकी मानसिक शांति भंग हाेती है.’ प्रश्न केवल इतना नहीं है कि न्यायालयाें ने इस प्रकार के आचरण काे मानसिक क्रूरता क्याें माना. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि व्यक्तिगत संबंधाें में उत्पन्न विवाद किस प्रकार उस सीमा तक पहुंच जाते हैं, जहां व्यक्ति न्याय की अपेक्षा दूसरे काे अधिकतम क्षति पहुंचाने का माध्यम खाेजने लगता है. जब संघर्ष का उद्देश्य समाधान के स्थान पर दूसरे व्यक्ति की प्रतिष्ठा, आजीविका अथवा पेशेवर जीवन काे प्रभावित करना बन जाए, तब यह केवल वैवाहिक विवाद नहीं रह जाता, बल्कि मानवीय संबंधाें के नैतिक पतन का भी संकेत देता है. इसी संदर्भ में राॅबर्ट हाेगन का ‘सामाजिक-विश्लेषणात्मक सिद्धांत’ महत्वपूर्ण दृष्टिकाेण प्रस्तुत करता है. उनके अनुसार व्यक्ति केवल अपनी एक पहचान नहीं बनाता, बल्कि समाज भी उसके व्यवहार और कार्य के आधार पर उसके प्रति एक धारणा विकसित करता है. यही धारणा समय के साथ उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार बनती है. इसलिए जब व्यक्तिगत संबंधाें का संघर्ष किसी व्यक्ति की पेशेवर प्रतिष्ठा काे लक्ष्य बनाता है, ताे उसका प्रभाव केवल वर्तमान विवाद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वर्षाें में अर्जित विश्वास और सामाजिक स्वीकार्यता पर भी पड़ता है.
ऐसी परिस्थितियाें में सबसे बड़ी विडंबना यह हाेती है कि आराेपाें की सत्यता का परीक्षण बहुत बाद में हाेता है, जबकि उनके आधार पर बनने वाली सामाजिक धारणा तत्काल अपना प्रभाव छाेड़ने लगती है. कार्यस्थल पर पहुंचा व्यक्तिगत विवाद व्यक्ति काे ऐसी स्थिति में खड़ा कर देता है, जहां उसे उन घटनाओं के लिए भी संकाेच, असहजता और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है जिनका उसके पेशेवर दायित्वाें से काेई संबंध नहीं हाेता. वह स्वयं काे असहाय अनुभव करता है, क्याेंकि एक ओर न्यायिक प्रक्रिया अपनी गति से चल रही हाेती है, वहीं दूसरी ओर उसके सहकर्मी, वरिष्ठ अधिकारी और सामाजिक परिवेश उसके बारे में अपनी-अपनी धारणाएं बनाने लगते हैं. यही कारण है कि ऐसी शिकायताें का प्रभाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहरे मनाेवैज्ञानिक स्तर पर भी पड़ता है. यहीं व्यक्तिगत संबंधाें की मर्यादा का सबसे कठिन परीक्षण भी हाेता है.
अपने अधिकाराें की रक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाना भी प्रत्येक व्यक्ति का वैधानिक अधिकार है.किंतु जब संघर्ष का उद्देश्य न्याय प्राप्त करने के स्थान पर दूसरे व्यक्ति काे अधिकतम सामाजिक, आर्थिक या पेशेवर क्षति पहुंचाना बन जाए, तब वह अधिकाराें के प्रयाेग से आगे बढ़कर प्रतिशाेध की मानसिकता का रूप लेने लगता है. किसी भी सभ्य समाज में यह अपेक्षा की जाती है कि संबंध समाप्त हाे सकते हैं, परंतु मानवीय मर्यादा समाप्त नहीं हाेनी चाहिए. व्यक्तिगत विवाद चाहे कितने ही गहरे क्याें न हाें, वे हमें इस स्तर तक नहीं ले जाने चाहिए कि हम किसी व्यक्ति की वर्षाें की मेहनत से अर्जित प्रतिष्ठा और आजीविका काे ही संघर्ष का सबसे आसान लक्ष्य बना दें.
-डाॅ. ऋतु सारस्वत