मुंबई, 27 जुलाई (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क) ठाकुरद्वार स्थित श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ ट्रस्ट के तत्वावधान मे आयोजित चातुर्मास श्री आदेश्वर भवन श्रीपति ज्वेल्स ई-विंग में विराजित साध्वी भव्य गुणा श्री ने कहा कि, जैनों के हर त्यौहार (पर्व) में एक तपश्चर्या होती है, जिनका लक्ष्य ‘जीओ और जीने दो’, ‘अहिंसा परमो धर्म’ होता है. जैनों की तपस्या सबसे कठीन मानी जाती है, क्योंकि उसमें कुछ भी खाना नहीं होता या कुछ तपस्याओं में यदि कुछ खाना होता है तो उसके भी नियम है. पानी उबाल कर ठंडा करके ही पीना होता है. कच्ची सब्जी का त्याग सूखी सब्जी या सूखा अनाज की सब्जी. रात्रि भोजन त्याग (चौविहार) चारों प्रकार के आहार यानि भोजन करना, पीना, खाना, स्वाद लेना का रात्री मे त्याग करना होता है. ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है. पर्व तिथि में हरी सब्जी नहीं खाते इस अवसर पर साध्वी शीतल गुणा श्री जी ने कहा कि, जैन लोग पर्व तिथि में ग्रीन सब्जी क्यों नहीं खाते. जैन समाज में 2, 5, 8, 11, 14, 15, 30 इन तारीखों में हरी सब्जी नही खाते. क्योंकि चंद्र हमारा एन्टिना है. इन तिथियों में पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण में बड़ा बदलाव आता है. इस समय पृथ्वी चंद्र और मन की स्थिति में बदलाव आने से उसका अधिक असर हमारे शरीर में 70% रहे हुए पानी पर होता है. सब्जी में भी 80% पानी होता है. समुद्र में जो ज्वार आता है, ऐसी ही स्थिति हमारे शरीर में भी होती है और हमारा मस्तक भी मदहोश हो जाता है. अग्नितत्व मंद होता है और वायुतत्व की बढ़ोतरी होती है, वो मस्तक पर आने से कितनी सारी विकृतियां पैदा होती है. सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियां होती है. इसलिये हरी सब्जी नहीं खाने से जलतत्व पर कंट्रोल किया जा सकता है. जैन शास्त्र के अनुसार सब्जी स्वादिष्ट होने से गन्ने में रोग पैदा होता है और जीवहिंसा भी होती है. अत: रोग, राग और पाप से बचने के लिये जैन लोग इस पर्व तिथि में हरी सब्जी नहीं खाते हैं.
कुछ उपवासों तथा तपस्याओं के बारे में दी विस्तार से महत्वपूर्ण जानकारी
चोविहार - किसी भी तपस्या में सूर्य छिपने के बाद से सूर्य निकलने तक कुछ भी न खाना होता है न पीना होता है, जिसे चौविहार कहते है. तिविहार में केवल पानी छोड़कर बाकी सब चीजों का त्याग होता है.
उपवास - तपस्या वाले दिन से पहले दिन भी रात्रि से त्याग (चौविहार) होना चाहिए तथा अधिकतर समय धर्मध्यान शास्त्र-श्रवण, स्वाध्याय आदि में बिताना चाहिए.
नवकारसी - सूर्य निकलने के बाद दो घड़ी यानी 48 मिनट तक मुंह में कुछ भी नहीं डालना.
पोरिसी (प्रहर) - सूर्य निकलने के बाद लगभग तीन घंटे तक मुंह में कुछ नहीं डालना.
एकासना - सिर्फ दिन में केवल एक बार ही, एक जगह ही बैठकर (बैठने के बाद उठना नहीं) खाना, पीना! पहले या बाद में उबला हुआ जल कितनी भी बार ले सकते हैं, वह भी सिर्फ दिन में.
बियासना - इसमें सिर्फ दिन में दो बार खा सकते है एक जगह बैठ कर बाकी एकासने की तरह, वह भी सिर्फ दिन में. एकलठाणा - इसमें पानी भी केवल एक बार भोजन के समय ही लेना होता है, बाकी एकासन की तरह.
आयम्बिल - दिन में एक ही बार एक जगह बैठकर उबला जल के साथ एक ही रूखे-सूखे अचित धान्य का सेवन करना यानी न नमक, न मिर्च, न घी, न मीठा. जैसे रुखी रोटी उबले हुए या भुने हुए चने, चावल, मुरमुरे आदि उबला जल पहले या बाद में कभी भी ले सकते हैं.
नीवी- ये भी आयम्बिल की तरह है फर्क इतना है कि इसमें रुखा धान्य पानी की जगह छाछ (मक्खन रहित लस्सी) के साथ लिया जाता है.
उपवास (व्रत) तिविहार उपवास - दिन भर में केवल उबला जल ही लेना.
चौविहार उपवास -जल भी न लेना. (इस तरह से बीज, पांचम, आठम, एकादशी, चौदस, पूनम को यथा शक्ति उपवास करते हैं. पौषध - ये भी उपवास की तरह है, अंतर-इसमें दिन-रात सामयिक के वेष में धर्मस्थान में ही रहा जाता है. संसार परिवार, व्यापार आदि से कोई संबंध नहीं रखा जाता. बिजली, पंखे, गादी आदि का प्रयोग नहीं करना होता. अट्ठारह पापों का त्याग कर धर्म-ध्यान, प्रवचन-श्रवण आत्मचिंतन आत्म-संशोधन में समय लगाया जाता है.
दिवस चरम पचक्खाण- सूर्यास्त से आधा घंटा पहले अगले दिन सूर्योदय तक के लिए भोजन व जल आदि का त्याग कर देना. अभिग्रह - मन में कोई संकल्प कर लेना यदि वो पूरा हो जाए तो भोजन ग्रहण करना वरना पूरे दिन-रात निराहार रहना. जैसे भोजन में चावल बने होगे तो भोजन करूंगा आदि कुछ नहीं अभिग्रह गुप्त रखा जाता है.
संवत्सरी पर्व - (पर्युषण महापर्व का अंतिम आठवा दिन) पर पौषध ज्यादातर जैन भाई-बहन करते है. ज्यादातर जैन साधु-साध्वी तो संवत्सरी वाले दिन मुंह में पानी की एक बूंद भी नहीं डालना चाहते, चाहे वृद्ध हो या बीमार.