सिंधु महाकुंभ : एकता, संस्कृति और अध्यात्म का संगम

    28-Jul-2026
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मुंबई, 27 जुलाई (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)

 लद्दाख में आयोजित 30वीं सिंधु दर्शन यात्रा का सफल समापन राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक समरसता और भारतीय सभ्यता की गौरवशाली विरासत के प्रेरणादायी संदेश के साथ हुआ. सिंधु महाकुंभ के रूप में पहचान बना चुकी यह यात्रा हर वर्ष देशभर से श्रद्धालुओं, पर्यटकों, सांस्कृतिक प्रेमियों और साहसिक यात्रियों को पवित्र सिंधु नदी के तट पर एकत्रित करती है. सिंधु दर्शन यात्रा समिति द्वारा आयोजित इस यात्रा की शुरुआत वर्ष 1997 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने की थी. इसकी परिकल्पना समाजसेवी इंद्रेश कुमार ने की थी. तब से यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित न रहकर भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय एकता और विविधता में एकता का प्रतीक बन चुका है. लेह के समीप स्थित सिंधु घाट पर आयोजित सिंधु महोत्सव में देश के विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों ने लोकनृत्य एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं. हिमालय परिवार (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर मिश्रा के नेतृत्व में आयोजित इस यात्रा के दौरान हिमालयी संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण, कैलाश-मानसरोवर मार्ग को सुगम बनाने, भोटी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने तथा सीमावर्ती क्षेत्रों के साथ देश के भावनात्मक संबंधों को सुदृढ़ करने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी विचार-विमर्श किया गया. लद्दाख की प्राकृतिक सुंदरता और हिमालय की भव्य पर्वतमालाओं के बीच आयोजित यह महोत्सव अब साहसिक पर्यटन, फोटोग्राफी और आध्यात्मिक पर्यटन का भी प्रमुख आकर्षण बनता जा रहा है. देश-विदेश से आने वाले पर्यटक यहां संस्कृति, प्रकृति और अध्यात्म का अनूठा संगम अनुभव कर रहे हैं. इस अवसर पर हिमालय परिवार के महाराष्ट्र अध्यक्ष सुदीप साहा ने कहा कि विरल बहती सिंधु नदी के तट पर खड़े होकर यह अनुभव होता है कि यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय अस्मिता की सजीव धरोहर है. सिंधु दर्शन यात्रा देश के विभिन्न भागों को भावनात्मक रूप से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन चुकी है. उन्होंने कहा कि सिंधु महाकुंभ आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने तथा राष्ट्रभावना को सुदृढ़ करने का एक महत्वपूर्ण अभियान है.