अभी तक बुद्धाें का काेई समाज नहीं पैदा हुआ

    30-Jul-2026
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Osho
 
यह धारणा है लाेगाें की, कि पहले का आदमी बहुत ऊंचा था, पहुंचा हुआ था, पवित्र था, धार्मिक था; आज का आदमी पापी, कलयुगी! तुम्हें पहले के आदमी के संबंध में कुछ पता नहीं. तुम्हारे पास कुछ कहानियां आ गई हैं, उन्हीं कहानियाें के आधार पर तुम पुराने आदमी का हिसाब लगा लेते हाे.
 
जैसे, तुम बुद्ध काे जानते हाे और बुद्ध के हिसाब से तुम साेचते हाे कि सारे लाेग बुद्ध जैसे थे! तुम राम काे जानते हाे, तुम साेचते हाे राम जैसे सारे लाेग थे! ताे फिर रावण कहां से आया? और अगर बुद्ध जैसे ही सब लाेग थे ताे बुद्ध पर पत्थर किसने मारे? बुद्ध पर पागल हाथी किसने छाेड़े? बुद्ध पर चट्टानें किसने सरकाईं? बुद्ध काे ज़हर किसने दिया? आदमी सदा ऐसा रहा है, लेकिन कठिनाई यह है कि जैसे ही यह बीसवीं सदी समाप्त हाे जाएगी- दाे हजार साल के बाद, अ ब स का ताे कुछ पता नहीं रहेगा, लेकिन कुछ नाम रह जाएंगे- रामकृष्ण का, रमण का, कृष्णमूर्ति का- नाम रह जाएंगे. और लाेग साेचेंगेः आहा... कैसा सतयुग था! बस ऐसा ही आदमी सदा रहा है. पीछे ताे कुछ स्वर्ण नाम याद रह जाते हैं. लेकिन वे स्वर्ण नाम ताे इक्के-दुक्के हैं; उनसे समाज नहीं बनता.
 
अभी तक बुद्धाें का काेई समाज दुनिया में नहीं पैदा हुआ है. सच ताे यह है कि हम हजाराें साल बुद्ध की याद ही इसलिए करते हैं कि वे अनूठे थे, अकेले थे. अगर बहुत बुद्ध हाेते ताे काैन याद करता उनकी? याद्दाश्त ही यह बताती है कि वे बिल्कुल अनूठे थे और सारे लाेग उनसे विपरीत रहे हाेंगे.
 
अंधेरी रात में तारे खूब चमक के दिखाई पड़ते हैं; उजाली रात में उतने नहीं चमकते. तारे वहीं के वहीं हैं. और दिन में भी तारे आकाश में हाेते हैं, कहीं जाते नहीं. कहां जाएंगे? पाकिस्तान जाएंगे कि हिंदुस्तान जाएंगे? वहीं के वहीं. लेकिन सूरज की राेशनी में खाे जाते हैं. रात बड़ी अंधेरी रही हाेगी, जिसमें बुद्ध का तारा चमका. अगर ऐसा समाज रहा हाेता, जहां सभी लाेग पुण्यात्मा थे, बुद्ध का तारा कैसे चमकता? दिन की तरह हाेती बात.बुद्ध खाे गए हाेते.
 
पांच हजार साल हाे गए हैं, हम कृष्ण काे भूले नहीं हैं. क्याें? इसलिए कि कृष्ण ऐसे हाेंगे जैसे हजाराें-हजाराें कांटाें में एक गुलाब का फूल खिले. उसे भूला नहीं जा सकता. लेकिन अगर हजाराें गुलाब के फूल हाें, गुलाब के फूलाें की खेती हाे रही हाे, अगर सबके हाेठाें पर बांसुरी हाे जीवन की और सबके पैराें में घुंघरू बंधे हाें आनंद के और सबके कंठ से गीत फूट रहा हाे- काैन कृष्ण काे याद रखेगा? अगर हरेक के पास जीवन नृत्य कर रहा हाे, रास रचा हाे, काैन कृष्ण काे याद करेगा? उनकी याद ही इसीलिए हर गई है! इसलिए यह भूलकर मत साेचना कि तुम कलियुग में रह रहे हाे.