अधिकतर लोग नकल से जीते हैं

    31-Jul-2026
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oshophilosophy
आमताैर से ताे आदमी यूं जीते हैं कि कहाे अपने से जीते ही नहीं, भीड़भाड़ में जैसा और सब लाेग करते हैं, वे भी करते रहते हैं, नकल से जीते हैं. किसी ने नया मकान बनाया, बस वैसा ही मकान तुम्हें बनाना है, चाहे कर्ज लेना पड़े.
 
किसी ने नये कपड़े पहने, वैसे ही कपड़े तुम्हें पहनने हैं.राेटरी क्लब में, लायंस क्लब में लाेग करते क्या हैं? यही देखने जाते हैं कि काैन क्या पहने हुए है. मंदिराें में जैसे विज्ञापन चलता है ! तुम लाख अखबाराें में विज्ञापन दाे, उसका काेई ायदा नहीं है.
एक महिला काे कपड़े पहना कर मंदिर पहुंचा दाे, पर्याप्त पूरे गांव में चर्चा हाे जायेगी.
 
सारी महिलाएं दीवानी हाे जायेंगी. सारे पतियाें के गले में ांसी लग जायेगी.अमेरिका की एक कंपनी जिन चीजाें काे बेचना चाहती, उनका विज्ञापन नहीं देती थी. लाेगाें का ाेन नंबर और उनकी डायरेक्टरी में से देख कर उनका पता निकाल कर, उनके नाम व्यक्तिगत पत्र लिख देती थी.
 
पत्र हाेता पति के नाम और पत्र के ऊपर लिखा हाेता- ‘प्राइवेट, कृपा करके काेई और न खाेले.’ स्वभावत: पत्नी खाेलेगी ही. सुनिश्चित. इसकी गारंटी समझाे. अन्यथा हाे ही नहीं सकता. और उसके भीतर विज्ञापन, और कुछ भी नहीं.
विज्ञापनदाता भी आते हैं, सेल्समैन भी आते हैं, ताे जब पति दफ्तर चला जाता है.
 
देखते रहते हैं कि कब पति दफ्तर निकले कि वे दरवाजे पर दस्तक दें, घंटी बजाएं. क्याेंकि पत्नी काे राजी कराे, बस िफर सब ठीक है, िफर पति की क्या बिसात है? पत्नियां एक-दूसरे की साड़ियां देख-देख कर साड़ियां खरीदने पहुंच जाती हैं. यूं ैशन चलते हैं. लाेग एक-दूसरे काे देख-देख कर जी लेते हैं. यह काेई जीना नहीं है.