भायंदर, 9 अगस्त (आ. प्र.)
पुण्यसम्राट गुरुदेव श्री विजय जयंतसेन सूरेीशरजी म. सा. के शिष्य व गच्छाधिपति श्री नित्यसेन सूरेीशरजी म. सा. व आचार्य श्री जयरत्न सूरेीशरजी म. सा. के आज्ञानुवर्ती समता गुणरसिक, प्रखर प्रवचनकार मुनिराज श्री निपुणरत्न विजयजी म. सा. आदि ठाणा का मुंबई के भायंदर में चातुर्मास प्रवेश भव्य तरीके से हुआ. यह पहला चातुर्मास होने से संघ में जबरदस्त उत्साह है. श्री थराद त्रिस्तुतिक जैन संघ, भायंदर (मुंबई) द्वारा आयोजित ‘मग्गदयाणं चातुर्मास’ मंगल प्रवेश में शामिल हुए हजारों भक्तों के साथ जापान से आए 81 जापानियों ने भायंदर वासियों का दिल जीत लिया. जापान से आये सभी श्रद्धालु गुरुदेव पुण्यसम्राट श्रीमद् जयंतसेनसूरीश्वरजी से प्रभावित हैं और उनके शिष्य मुनिराज श्री निपुणरत्न विजयजी म. सा. से जुड़े हुए हैं. इस अवसर पर महिलाओं ने भारतीय संस्कृति के अनुरूप पोशाक पहनी थी और अपने सिर को पूरी तरह ढका हुआ था. पुरुषों ने कुर्ता पायजामा पहना था व सभी जिनशासन का ध्वज लहरा रहे थे,और पूरी चातुर्मास प्रवेश यात्रा में चप्पलें नहीं पहनी थीं. यह लोग पिछले कई सालों से प्रवेश और नवकार मंत्र की आराधना करने गच्छाधिपति जयंतसेन सूरेीशरजी की निश्रा में आते हैं. प्रवेश शोभायात्रा 52 जिनालय से प्रारंभ हुइ जहां मुनि भगवंतों ने बावन जिनालय में विराजमान आचार्य पुण्यरत्न सूरेीशरजी म. सा. को वंदन किया व नवकार पोर्शनाथ जिनालय-गुरुमंदिर दर्शन करते हुए चातुर्मास स्थल नूतन थराद भवन जयंतगिरि के अग्रवाल ग्राउंड में धर्मसभा हुई जहां पूज्य श्री का प्रवचन एवं चातुर्मास में होने वाली अनुष्ठानों की घोषणा हुई. मुनि श्री के 25 वर्षीय संयम जीवन का यह द्वितीय स्वतंत्र चातुर्मास है. यह जापानी श्रावक अपने खर्चे से चातुर्मास प्रवेश में आए और अपने खर्चे से ही ठहरे. सभी केवल सफेद वस्त्र पहने थे. जापानी पुरुष महात्मा के पीछे ही चले और जापानी बहनें साध्वीजी भगवंत के पीछे ही चलीं. अपने हाथों में जैन धर्म के झंडे दो घंटों तक पकड़ रखे थे. शोभा यात्रा के अवसर पर 5 साल से लेकर 70 साल तक की जापानी श्राविकाओं ने लगातार अपना सिर ढका हुआ रखा. सुबह आठ बजे 52 जिनालय की परिक्रमा में जापानी लोग भगवान के दर्शन कर रहे थे, तब हर भगवान के सामने 2-5 सेकंड खड़े होकर अहोभावपूर्वक दर्शन करते थे. साढ़े आठ बजे शोभायात्रा शुरू हुई और 11 बजे तक चली, लेकिन वे आगे-पीछे नहीं हुए. प्रवचन सभा दोपहर दो बजे तक चली, तब तक एक भी जापानी अपनी जगह से नहीं हिला और आपस में बातचीत भी नहीं की. इसके पश्चात जापानियों ने गुरु वंदन किया. यह सभी जापानी शुद्ध शाकाहारी हैं ही, साथ में नवकार महामंत्र के आराधक भी हैं. जापानियों ने श्री निपुणरत्न विजयजी महाराज को कमली ओढ़ाने और ग्रंथ भेंट करने का चढ़ावा लिया और जापान में आकर चातुर्मास करने की भावना व्यक्त की लेकिन वो संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने भारत में जहां श्री निपुणरत्न विजयजी चातुर्मास करें वहां का लाभ, शिविर, गुरुकुलवास का लाभ देने की विनती की.
जापान में रहने वाली तुलसीबेन को आचार्यश्री का अनुग्रह श्री जयंतसेन सूरीजी ने जापान में रहनेवाली तुलसी बहन को दीक्षा न देते हुए कहा था कि तुम जापान में जैन धर्म और अहिंसा का प्रचार करो. नवकार महामंत्र का जाप करो. शुरुआत में तुलसी बहन 15-16 घंटे नवकार जाप करती थीं. आज भी रोज कुछ घंटे जाप करती हैं, प्रतिक्रमण सूत्र करती हैं और पढ़ाती हैं. तुलसी बेन ने जैन धर्म का प्रचार करने के लिए शादी भी नहीं की. एक अनुमान के अनुसार 5000 जापानियों ने मांसाहार छोड़ दिया है. जापानी जैन उच्च शिक्षित हैं और विभिन्न क्षेत्रों में बहुत आगे हैं.