कोथरुड, 9 अगस्त (आ.प्र.)श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, कोथरुड में विराजित गुरु सुमति शिष्य उपप्रवर्तक, तप दिवाकर गुरुदेवश्री अभिषेक मुनि जी म.सा. ने आचार्य सम्राट श्री आनंद ऋषि जी म.सा. के पावन जन्मोत्सव के निमित्त आयोजित ‘गुरु आनंद सप्ताह’ के अंतर्गत धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि महापुरुषों का जीवन स्वयं साधनामय होता है. महापुरुषों के जीवन-प्रसंग जब हमारे सामने आते हैं, तो उनके निमित्त से जप, तप, सेवा एवं विभिन्न धार्मिक गतिविधियों का आयोजन होता है. महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर मनुष्य के जीवन में भी सद्कार्यों का संचार होता रहता है. कार्यक्रम के दौरान तप महोदधि गुरुवर्या श्री विभाश्री जी म.सा. एवं साध्वी डॉ. आभाश्रीजी म.सा. के मार्गदर्शन में गुरु आनंद चालीसा एवं गुरु आनंद प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की. गुरुदेव ने कहा इंसान पाप करता है, लेकिन पापी कहलाना पसंद नहीं करता. ज्ञानीजन निरंतर समझाते हैं कि पाप से बचने का प्रयास करो, लेकिन केवल समझाने मात्र से यदि सभी समझ जाते, तो बांसुरी बजाने वाले भगवान श्रीकृष्ण महाभारत होने ही नहीं देते. इसलिए केवल धर्म की बातें सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारने का पुरुषार्थ भी आवश्यक है. गुरुदेव ने श्रद्धालुओं को धर्म, ध्यान एवं आत्मसाधना की प्रेरणा देते हुए कहा कि सामायिक और प्रतिक्रमण हमारी साधना के मूल आधार हैं. इनके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन का आत्मावलोकन कर सकता है तथा अपने दोषों को पहचानकर उनमें सुधार का प्रयास कर सकता है. इस अवसर पर उपप्रवर्तकश्री आशीष मुनिजी म.सा. ने कहा परमात्मा ने मनुष्य जन्म, धर्मश्रवण, श्रद्धा और संयम में पुरुषार्थइन चारों को दुर्लभ बताया है. उन्होंने श्रद्धा की व्याख्या करते हुए कहा कि श्रद्धा का अर्थ मात्र वेिशास नहीं है. जहां वेिशास और अवेिशास की स्थिति ही समाप्त हो जाए, वही वास्तविक श्रद्धा है. गुरु आनंद सप्ताह के अंतर्गत श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, कोथरुड में हर्षोल्लास के साथ रक्तदान शिविर, नेत्र शिविर एवं दंत शिविर का आयोजन किया गया. इन सेवा गतिविधियों में गौतम लब्धि फाउंडेशन एवं भारतीय जैन संघटना का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ. शिविर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं एवं समाजजनों ने सहभागिता कर सेवा कार्यों को सफल बनाया.