शिवाजीनगर, 9 अगस्त (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)
श्रीमंत दगडूसेठ हलवाई सार्वजनिक गणपति ट्रस्ट और सुवर्णयुग तरुण मंडल की ओर से चातुर्मास के अवसर पर आयोजित कीर्तन महोत्सव में परभणी-मानवत के वारकरी भूषण ह.भ.प. उमेश महाराज दशरथे ने कहा कि ऊंचाई पर पहुंचा हुआ व्यक्ति अपनी सफलता व ऊंचाई का रहस्य किसी को नहीं बताता, क्योंकि वह नहीं चाहता कि कोई उसकी योग्यता या बराबरी तक पहुंचे. लेकिन संतों का जीवन ही एकमात्र ऐसा अपवाद है, जो यह चाहते हैं कि वे जिस ऊंचाई पर हैं, वहां पूरा समाज पहुंचे. इस महोत्सव का आयोजन श्रीमंत दगडूसेठ हलवाई सार्वजनिक गणपति ट्रस्ट और सुवर्णयुग तरुण मंडल द्वारा किया गया है. ह.भ.प. उमेश महाराज दशरथे ने कहा दर्शनशास्त्र (तत्वज्ञान) क्या सिखाता है? किसी भी कर्म का फल केवल वह क्रिया नहीं देती, बल्कि उस कर्म के प्रति जो आसक्ति होती है, वही फल का कारण बनती है. ‘यह मैंने किया’ का जो अहंकार हृदय में होता है, वही मनुष्य को दुख देता है. श्रीमद्भागवत के एकादश स्कंध में एक गीत आता है. मनुष्य को जहां आसक्ति होती है, वही दुख का कारण बनती है. लेकिन हम क्या करते हैं? कर्म में आसक्ति ही नहीं रखते. उदासीन (अनासक्त) भाव से कर्म करते हैं, जिससे वह कर्म हमें बांधता नहीं.