कोथरुड़, 10 अगस्त (आ. प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, कोथरुड, पुणे में विराजित गुरु सुमति शिष्य, उपप्रवर्तक, तप दिवाकर गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी म. सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि,‘धर्म’ शब्द में बड़ा आकर्षण और गहन अर्थ निहित है. हमारे जीवन में धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. मनुष्य ने जब से जन्म लिया है, तब से ही वह किसी न किसी धर्म, संस्कार और मान्यता से जुड़ा रहता है. भगवान महावीर स्वामी ने धर्म-व्याख्या करते हुए कहा कि, सर्वप्रथम धर्म को जानो, समझो और अपनी प्रज्ञा एवं बुद्धि से उसकी समीक्षा करो. विचार करो कि आत्मा के लिए क्या हितकर है और क्या अहितकर. जो आत्मा के लिए श्रेयस्कर है, उसी धर्म का पालन करो. संसार में अनेक धर्म एवं मत हैं और प्रत्येक व्यक्ति अपनी- अपनी मान्यताओं के अनुसार उनका पालन करता है, लेकिन धर्म का वास्तविक उद्देश्य आत्मकल्याण और आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ना है. हमारे मन में कौन-कौन से विचार गतिमान हैं, इसे परमात्मा जान सकते हैं अथवा व्यक्ति स्वयं अपने अंतर्मन को देखकर समझ सकता है, लेकिन सामाजिक, व्यावहारिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक जीवन जीने में वाणी एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है. वाणी के माध्यम से मनुष्य अपने व्यवहार और व्यक्तित्व को प्रकट करता है. जो जीव धर्म से जुड़ जाता है, वह अनंत जन्मों से संचित कर्मराशि को निर्जरित करने का निरंतर प्रयास करता रहता है. धर्म केवल मान्यता नहीं, बल्कि आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करने की दिशा में किया जाने वाला जागरूक पुरुषार्थ है.