शिवाजीनगर, 10 अगस्त (आ.प्र.) श्रीमंत दगडूसेठ हलवाई सार्वजनिक गणपति ट्रस्ट और सुवर्णयुग तरुण मंडल की ओर से चातुर्मास के अवसर पर आयोजित कीर्तन महोत्सव में ‘काला का कीर्तन’ करते हुए जगद्गुरु कृपांकित डॉ. पंकज उर्फ चेतनानंद महाराज पुणेकर ने कहा कि, जीवन सत्य की खोज है, और इस सत्य को खोजने के लिए ‘स्थितप्रज्ञा’ की आवश्यकता होती है. विकारों से रहित शुद्ध बुद्धि को ही ‘प्रज्ञा’ कहा जाता है. जब इस प्रज्ञा से ‘मैं’ का भाव (अहंकार) दूर हो जाता है, तब मनुष्य में स्थितप्रज्ञा का निर्माण होता है. जैसे ही यह स्थितप्रज्ञा आपके भीतर आती है, भगवान पांडुरंग आपको दर्शन देते हैं . चेतनानंद महाराज पुणेकर ने कहा कि आप अपनी इंद्रियों को लालच और जलन (ईर्ष्या) में डालते हैं. घर में जो विचार या संस्कार उत्पन्न होते हैं, वही संतान में भी आते हैं. हमें अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में लाना होता है. आपकी मुक्ति का सबसे बड़ा विरोधी आपका अपना कर्म है. अग्नि ज्ञान का प्रतीक है. शरीर को ज्ञान रूपी अग्नि में तपाकर समाप्त किए बिना जीव और ब्रह्म का मिलन नहीं होगा. श्रीमंत दगडूसेठ हलवाई सार्वजनिक गणपति ट्रस्ट और सुवर्णयुग तरुण मंडल की ओर से इस महोत्सव का आयोजन किया गया. उस समय ट्रस्ट के ट्रस्टी और मंडल के पदाधिकारी उपस्थित थे.
कर्म, ज्ञान और भक्ति हमें परमात्मा तक ले जाते हैं !
कर्म, ज्ञान और भक्ति ये तीनों ही मार्ग हमें एक ही परमात्मा तक ले जाते हैं. ईश्वर एक ही है जहां हमें पहुंचना है, लेकिन उस तक पहुंचने के माध्यम कई हैं. पहला कर्म का मार्ग है, दूसरा ज्ञान का मार्ग है और तीसरा भक्ति का मार्ग है. इन तीनों ही मार्गों का विस्तार से वर्णन हमें श्रीमद्भगवद्गीता और ज्ञानेश्वरी में देखने को मिलता है. यह मार्गदर्शन ह.भ.प. डॉ. जयवंत महाराज बोधले ने अपने कीर्तन में किया.