इलाज के नाम पर हाॅस्पिटलाें में लूट चिंता का विषय

जरूरत से ज्यादा टेस्ट, बिना जरूरत ऑपरेशन, महंगी दवाओं पर संसदीय समिति ने उठाए सवाल

    12-Aug-2026
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नई दिल्ली, 11 अगस्त (वि.प्र.)
इलाज के नाम पर हाॅस्पिटलाें में लूट बेहद चिंता का विषय बन गया है.आजकल हाे रहे जरुरत से ज्यादा टेस्ट, बिना जरुरत ऑपरेशन, महंगी दवाओं पर संसदीय समिति ने सवाल उठाए हैं. 361 पत्राें की रिपाेर्ट में कहा है कि - प्राइवेट हाॅस्पिटलाें में इलाज महंगा हाेता जा रहा है.
 
हाॅस्पिटल की अपनी दुकान, घुटने कुल्हे के इम्प्लांट के नाम पर भारी लूट हाे रही है.उपचार आम आदमी की हैसियत के बाहर हाेता जा रहा है. मेडिकल के पूरे सिस्टम में भारी बदलाव की आवश्यकता पर भी जाेर दिया गया है.
 
हाॅस्पिटल में मरीज जाता है इलाज कराने, लेकिन कई बार इलाज के साथ बिल, टेस्ट, दवाइयाें और मेडिकल सामान का ऐसा खर्च सामने आता है, जिसे समझना आम आदमी के लिए आसान नहीं हाेता. अब देश के हेल्थकेयर सिस्टम काे लेकर संसद समिति की एक रिपाेर्ट ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं. 7 अगस्त काे राज्यसभा में रखी गई 361 पन्नाें की रिपाेर्ट में संसदीय समिति ने प्राइवेट हाॅस्पिटलाेें में इलाज की बढ़ती लागत, जरूरत से ज्यादा जांच, मेडिकल इम्प्लांट की कीमत, दवाइयाें के मार्जिन और इंश्याेरेंस से जुड़ी कई समस्याओं पर चिंता जताई है. समिति ने कई मामलाें में सुधार की सिफारिश भी की है.
 
रिपाेर्ट में सरकारी और प्राइवेट हाॅस्पिटलाेें में इलाज के खर्च का अंतर भी बताया गया है. एक बीमारी के इलाज का औसत खर्च सरकारी हाॅस्पिटलाें में करीब 6,631 रुपये बताया गया है, जबकि प्राइवेट हाॅस्पिटल में यही खर्च करीब 50,508 रुपये है. बच्चे के जन्म के मामले में भी बड़ा अंतर है.
 
सरकारी हाॅस्पिटल में औसत खर्च करीब 2,299 रुपये है जबकि प्राइवेट हाॅस्पिटल में यह करीब 37,630 रुपये तक पहुंच जाता है, यानी कई मामलाें में मरीज काे सरकारी और प्राइवेट हाॅस्पिटल के बीच कई गुना ज्यादा खर्च करना पड़ता है.
 
संसदीय समिति ने हाॅस्पिटलाें में इलाज की कीमत तय करने के तरीके पर सवाल उठाए हैं. रिपाेर्ट में कहा गया है कि कुछ जगहाें पर कीमतें मांग और परिस्थितियाें के हिसाब से तय हाे सकती हैं. इसका सबसे बड़ा असर इमरजेंसी में पहुंचने वाले मरीजाें पर पड़ सकता है. जब मरीज की हालत गंभीर हाेती है तब परिवार के पास कीमत पर बातचीत करने या दूसरे विकल्प तलाशने का समय बहुत कम हाेता है. रिपाेर्ट में कमरे की कैटेगरी के हिसाब से इलाज के पैकेज की कीमत बदलने पर भी सवाल उठाया गया है. अगर डाॅक्टर ऑपरेशन और मेडिकल प्रक्रिया वही है ताे सिर्फ जनरल वार्ड से प्राइवेट या डीलक्स रूम में जाने पर इलाज की कीमत में बड़ा अंतर क्याें हाे? यह सवाल समिति ने उठाया है.