लाेग सुन भी लें ताे भी समझ कहां पाते हैं! समझेंगे ताे वही जाे वे समझ सकते हैं. शब्द सुन लेंगे, लेकिन अर्थ कहां से आएंगे. चिल्लाते रहे संत पलटू-बहुरि न ऐसा दांव! फिर नहीं ऐसा दांव है. मत चूकाे. नहीं फिर मानुष हाेना. क्या ताकै तू ठाढ़. लेकिन कितने लाेग हैं जिनका कुल धंधा इतना ही है तमाशबीन! जिनकाे कुल काम इतना है कुतूहल. जिनके जीवन में कुतूहल से गहरी कभी काेई चीज नहीं हाेती. जिज्ञासा भी नहीं, मुमुक्षा की ताे बात ही मत पूछाे.
ये तीन तल हैं- कुतूहल, जिज्ञासा, मुमुक्षा. दुनिया में साै में से निन्यानबे प्रतिशत लाेग कुतूहल से जीते हैं. रास्ते पर झगड़ा हाे रहा है, फाैरन भीड़ लग जाएगी. तुम किसलिए वहां खड़े हाे? तुम वहां क्या कर रहे हाे? दाे आदमी लड़ रहे हैं, लड़ने दाे. अगर काेई खड़ा न हाे ताे शायद वे लड़ें भी नहीं. मजा ही क्या आएगा लड़ने का, काेई देखने वाला तक नहीं! काैन हारा काैन जीता, काैन पिटा काैन कुटा-कुछ पता भी नहीं चलेगा.
थाेड़ा शाेरगुल करके देख कर काेई नहीं आता, अपने-आप चले जाएंगे. लेकिन भीड़ खड़ी है और भीड़ बड़ी उत्सुकता से देख रही है कि अब हुआ कुछ, अब हुआ कुछ, अब हाेता ही है कुछ, मुफ्त का तमाशा काैन नहीं देखना चाहता! दुख ताे तब हाेता है जब कुछ नहीं हाेता, कि दाेनाें चले जाते हैं बिना लड़ाई-झगड़ा किए.
लुई फिशर ने अपने संस्मरणाें में लिखा है कि मैं जब पहली दफा चीन गया, ताे मैंने चीज के एक गांव में एक अजीब तमाशा देखा. स्टेशन पर उतरा, दाे आदमियाें में बड़ी तीन-पांच हाे रही थी, बड़ी गालीगलाैज हाे रही थी. ऐसा कि दाैड़-दाैड़ पड़ते थे एक-दूसरे के ऊपर कि अब गर्दन दबा देंगे, कि खाेपड़ी खाेल देंगे, लट्ठ उठ गए. और भीड़ खड़ी देख रही. यह इतनी देर चलता रहा कि लुई फिशर ने अपने दुभाषिए से पूछा कि माजरा क्या है, यह झगड़ा शुरू कब हाेगा? शाेरगुल ताे बड़ा बच रहा है, चिल्ल-पाें ताे बड़ी जाेर से हाे रही है, डंडा भी उठ जाता है, डंडा घूम भी जाता है; मगर न ताे काेई किसी काे मारता, न काेई किसी काे चाेट पहुंचाता.
उस दुभाषिए ने कहा कि आपकाे मालूम नहीं है यहां का रिवाज्. चीनी रिवाज यह है कि जाे आदमी पहले मारेगा, वह हार गया. मतलब उसने अपना धैर्य खाे दिया.
साे ये एक-दूसरे काे उकसा रहे हैं और भीड़ खड़ी यह देख रही है कि काैन हारता है. हारने का मतलब चीन में बिलकुल उल्टा. हारने का मतलब यह कि काैन पहले अपना धीरज खाेता है. जैसी ही एक आदमी अपना धीरज खाे देगा और दूसरे काे मार बैठेगा, लाेग कहेंगे. गया काम से.फ बस भीड़ छंट जाएगी कि हार गया.
मगर कुछ भी हाे, चीन हाे कि भारत हाे, रिवाज कुछ भी हाे, भीड़ इसलिए खड़ी हाेती है कि देख लें और जब कभी कुछ नहीं हाेता ताे लाेग इस उदासी में जाते हैं कि अरे बेकार समय गंवाया, नाहक खड़े रहे, कुछ भी न हुआ! हाे जाते दाे-दाे हाथ, खिंच जाते लट्ठ, थाेड़ा जिंदगी में मजा आ जाता! खून में थाेड़ी गति आ जाती. थाेड़ी हृदय में धड़कन आ जाती. थाेड़ा मुर्दापन कम हाे जाता.
कुतूहल, सिर्फ कुतूहल यहां भी लाेग आ जाते हैं बहुत कुतूहल से कि क्या हाे रहा है, क्या माजरा है, क्या मामला है? कुछ लाेग, निन्यानबे प्रतिशत है इनकी संख्या, कुतूहल से जीते हैं.