शुद्धि के िबना सिद्धि संभव नहीं है पहली तो बात यह होगी कि प्रभु प्रिज हैं. अर्थात प्रभु भी प्रिय हैं, संसार भी प्रिय है. फिर Comparative Degree -प्रियतर है. प्रभु संसार से ज्यादा प्रिय हैं; लेकिन अभी भी संसार प्रिय तो है ही और फिर Superlative Degree- प्रियतम है. सिर्फ प्रभु ही प्रिय हैं; प्रभु के सिवा दूसरी कोई व्यक्ति, दूसरा कोई पदार्थ मुझे प्रिय नहीं. जब प्रभु हमारे लिए प्रिय या प्रियतर नहीं; बल्कि प्रियतम बन जाए, उनके प्रति हमारे मन में तीव्र अनुराग हो, तभी हम प्रभु के प्रेम को झेल सकते हैं और जब प्रभु का प्रेम हम झेलते हैं, प्रभु से प्रभावित हो जाते हैं, तब फिर घटनाओं से हम प्रभावित नहीं होते. प्रभु-प्रभावितता अर्थात् आनंद; घटना-प्रभावितता अर्थात् पीड़ा है. आप पहले से निश्चित कर लेते हो कि यह घटना अच्छी और यह घटना बुरी और फिर बुरी घटना घटित हो, तो आप नाराज हो जाते हो. पर इस तरह तो आपके आनंद का नियंत्रण आपने दूसरों के (घटनाओं के) हाथ में दे दिया. जो भी घटना घटे, अगर आप प्रेम से घटना का स्वीकार कर लो, तो फिर आनंद ही आनंद है.