धर्म आचरण बुढ़ापे का नहीं, जीवन के हर क्षण का विषय : श्री अभिषेक मुनिजी म.सा.

    16-Aug-2026
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कोथरुड, 14 अगस्त

श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजमान गुरु सुमति शिष्य उपप्रवर्तक, तप दिवाकर गुरुदेवश्री अभिषेक मुनि जी म.सा. ने संघ संरक्षक गुरुदेव स्वामी श्री फूलचंदजी म.सा. के दीक्षा शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक आराधना के अंतर्गत धर्मसभा को संबोधित किया. गुरुदेव ने धर्म की महिमा बताते हुए कहा अरिहंत भगवंतों ने जीव को धर्माचरण की प्रेरणा देते हुए फरमाया है कि जब तक बुढ़ापा शरीर को पीड़ित न करे, जब तक शरीर में व्याधियां उत्पन्न न हों और जब तक इंद्रियां कमजोर न हो जाएं, तब तक धर्म का आचरण कर लेना चाहिए. उन्होंने वर्तमान मनुष्य की मानसिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज मनुष्य यह मान बैठा है कि धर्म, सामायिक, प्रतिक्रमण और ध्यान करना बुढ़ापे का काम है. जब किसी से पूछा जाता है कि सामायिक या प्रतिक्रमण कब करना चाहिए, तो उसका सहज उत्तर होता है बुढ़ापे में. मानवीय जीवन की अवस्थाओं का वर्णन करते हुए गुरुदेव ने कहा कि यद्यपि जीवन प्रत्येक क्षण परिवर्तनशील है, फिर भी सामान्य रूप से मनुष्य जीवन की तीन अवस्थाएं मानी गई हैं- बचपन, जवानी और बुढ़ापा. बचपन आता है और चला जाता है, जवानी भी आती है और चली जाती है, लेकिन बुढ़ापा जब आता है तो व्यक्ति के जीवन को अंतिम पड़ाव की ओर ले जाता है. इसलिए धर्माराधना के लिए भविष्य का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि वर्तमान समय को ही सार्थक बनाना चाहिए. दादा गुरुदेव स्वामीश्री फूलचंदजी म.सा. के जीवन पर प्रकाश डालते हुए गुरुदेव ने कहा कि मात्र 12-13 वर्ष की लघु आयु में उन्होंने अपने पिता एवं भाई के साथ दीक्षा ग्रहण कर ली थी. इतनी छोटी आयु में संयम जीवन अंगीकार कर उन्होंने अपने जीवन को कठोर साधना, तप, त्याग और आत्मसंयम से साधा तथा जिनशासन के उज्ज्वल नक्षत्र बने. ऐसे महान संत के दीक्षा शताब्दी वर्ष को तप, जप, साधना एवं आराधना के साथ श्रद्धा और हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाएगा. इस अवसर पर उपप्रवर्तकश्री आशीष मुनिजी म.सा. ने कहा कि मनुष्य संसार की वास्तविकता को समझते हुए भी उन सांसारिक पदार्थों और संबंधों का मोह नहीं छोड़ना चाहता, जिन्हें एक दिन उसे छोड़ना ही पड़ेगा. जीवन का अधिकांश समय तनाव, संघर्ष और परेशानियों में व्यतीत हो जाता है, फिर भी अंतर में त्याग की भावना जागृत नहीं होती. उन्होंने कहा जीवन की क्षणभंगुरता को समझकर समय रहते आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना ही मानव जीवन की सार्थकता है. धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने गुरुदेव के संदेश को श्रद्धापूर्वक श्रवण किया तथा दादा गुरुदेवश्री फूलचंदजी म.सा. के दीक्षा शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित आराधना में उत्साहपूर्वक सहभागिता की.