बन दुखी होने से प्रतिरोधक शक्ति भी कम हो जाती है

    19-Aug-2026
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osho 
पश्चिम में दाे विचारक हुए हैं, लेंगे और विलियम जेम्स. उन्हाेंने एक सिद्धांत विकसित किया था, जेम्सलेंगे सिद्धांत. वह उलटी बात कहता है सिद्धांत, लेकिन बड़ी महत्वपूर्ण आमताैर से हम समझते हैं कि आदमी भयभीत हाेता है, इसलिए भागता है. जेम्स लेंगे कहते हैं, भागता है, इसलिए भयभीत हाेता है. आमताैर से हम समझते हैं, आदमी प्रसन्न हाेता है, इसलिए हंसता है. जेम्स लेंगे कहते हैं, हंसता है, इसलिए प्रसन्न हाेता है. और उनका कहना है कि अगर यह बात ठीक नहीं है, ताे आप बिना हंसे प्रसन्न हाेकर बता दीजिए! या बिना भागे भयभीत हाेकर बता दीजिए! असल में भय और भागना दाे चीजें नहीं हैं. भय मन है और भागना शरीर है. प्रसन्नता और हंसी दाे चीजें नहीं हैं. प्रसन्नता मन है और हंसी शरीर है. और शरीर और मन एक-दूसरे काे तत्क्षण प्रभावित करते हैं, नहीं ताे शराब पीकर आपका मन बेहाेश नहीं हाेगा. शराब ताे जाती है शरीर में, मन कैसे बेहाेश हाेगा? शराब मजे से पीते रहिए. शरीर काे नुकसान हाेगा, ताे हाेगा. मन काे काेई नुकसान नहीं हाेगा. लेकिन मन तत्क्षण बेहाेश हाे जाता है.
और जब आपका मन दुखी हाेता है, ताे शरीर भी रुग्ण हाे जाता है.
 
अब ताे शरीरशास्त्री कहते हैं कि जब मन दुखी हाेता है, ताे शरीर की रेसिस्टेंस, प्रतिराेधक शक्ति कम हाे जाती है. अगर मलेरिया के कीटाणु ैले हुए हैं, ताे जाे आदमी मन में दुखी है, उसकाे जल्दी पकड़ लेंगे, और जाे मन में प्रसन्न है, उसकाे नहीं पकड़ेंगे. आप जानकर हैरान हाेंगे कि प्लेग ैली हुई है, सबकाे पकड़ रही है, और डाॅक्टर दिनरात प्लेग में काम कर रहा है, उसकाे नहीं पकड़ रही. कारण क्या है? डाॅक्टर अति प्रसन्न है अपने काम से. वह जाे सेवा कर रहा है, उससे आनंदित है. उसे प्लेग काेई बीमारी नहीं है, एक प्रयाेग है. उसे प्लेग जाे है, वह काेई खतरा नहीं है, बल्कि एक चुनाैती है, एक संघर्ष है, जिसमें वह जूझ रहा है. वह प्रसन्नचित्त है, वह आनंदित है, वह बीमार नहीं पड़ेगा. क्याें? क्याेंकि शरीर की प्रतिराेधक शक्ति, रेसिस्टेंस, जब आप प्रसन्न हाेते हैं, तब ज्यादा हाेती है, जब आप दीन, दुखी, पीड़ित हाेते हैं भीतर, ताे कम हाे जाती है.कीटाणु भी बीमारियाें के आप पर तब तक हमला कर सकते, जब तक आप दरवाजा न दें, कि आओ, मैं तैयार हूं. और जब आप इतने प्रसन्नता से भरे हाेते हैं, ताे चाराें तरफ आपके एक आभा हाेती है, जिसमें कीटाणु प्रवेश नहीं कर सकते.
 
चाैबीस घंटे में बीमारी पकड़ने के घंटे अलग हैं. और अब आदमी के भीतर की जाे खाेज हाेती है, उससे पता चलता है कि चाैबीस घंटे में कुछ समय के लिए आप पीक आवर में शिखर पर हाेते हैं अपनी प्रसन्नता के. काेई क्षण में चाैबीस घंटे में एक दा आप बिल्कुल नादिर, नीचे, आखिरी अवस्था में हाेते हैं. उस आखिरी अवस्था में ही बीमारी आसानी से पकड़ती है. और शिखर पर कभी बीमारी नहीं पकड़ती.