युवावस्था में धर्माचरण कर जीवन सफल बनाएं : अभिषेक मुनिजी

    19-Aug-2026
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गुरुवार पेठ, 18 अगस्त (आ. प्र.)
श्री गोड़ीजी पार्श्वनाथ जैन मंदिर स्थित भक्तियोगाचार्य यशोविजयसूरीजी म. सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि, मुझे आपकी दृष्टि को बदलना है; आपके मन को बदलना है जिससे कि आप पूर्ण आनंद में रह पाएं. अगर आपके मन में प्रभु बस गए, प्रभु का प्रेम बस गया, मन पूर्ण हो गया, तो फिर आपको सब पूर्ण ही दिखेगा. मन पूर्ण हो जाए, तब पूरी दुनिया पूर्ण दिखती है. किसी का दोष आपको दिखता है, वह आपकी दोष-दृष्टि के कारण दिखता है. आप बड़े प्रबुद्ध हैं इसलिए औरों में जो राग-द्वेष-अहंकार हैं, वे सब आपको दिखते हैं, लेकिन प्रबुद्धता का यह उपयोग सही नहीं है. अपने भीतर झांकोगे तब आप को दिखेगा कि औरों में तो एकाध दोष है, मुझ में तो सब दोष भरे हुए हैं. मन पूर्ण हो जाए फिर आप घटनाओं के प्रति सर्वस्वीकार में रहते हैं. अभी तो आप पहले से निश्चित करते हैं कि यह घटना ऐसे ही घटित होनी चाहिए. फिर घटना आप की अपेक्षा से अलग घटित हो, तो आप नाराज हो जाते हैं. अगर जैसी भी घटना घटित हो, उसे आप स्वीकार कर लें, तो क्या होगा? आप सदैव आनंद में रहेंगे. कोथरुड़, 18 अगस्त (आ. प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, कोथरुड, पुणे में विराजित गुरु सुमति शिष्य, उपप्रवर्तक, तप दिवाकर गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी म. सा. ने बताया कि, जब वृद्धावस्था आती है तो शरीर कमजोर पड़ जाता है और पहले जैसी शक्ति नहीं रहती. बुढ़ापा और बीमारियां जीवन को कठिन बना देती हैं, इसलिए परमात्मा ने संदेश दिया है कि, जब तक बुढ़ापा नहीं आया, जब तक शरीर रोगों से नहीं घिरा और जब तक इंद्रियां कमजोर नहीं हुईं, तब तक धर्म का आचरण कर लेना चाहिए. बचपन और बुढ़ापे के बीच की अवस्था अर्थात युवावस्था जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है. इस अवस्था में जो व्यक्ति स्वयं को संभाल लेता है, उसका जीवन सफल हो जाता है, जबकि जो व्यक्ति इस समय भटक जाता है, उसका जीवन दिशाहीन हो सकता है. बचपन नादान है, बुढ़ापा लाचार है, लेकिन जवानी में कुछ न किया तो जिंदगी बेकार है. युवावस्था में व्यक्ति के भीतर आत्मवेिशास और सामर्थ्य प्रबल होता है. उस समय उसे लगता है कि वह जीवन में बहुत कुछ कर सकता है. इसी सामर्थ्य को धर्म, सदाचार और संयम की दिशा में लगाना चाहिए. धर्म ही जीवन को सही दिशा प्रदान करता है और आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त करता है. मनुष्य प्रायः यह विचार नहीं करता कि उसके घर में आने वाला धन नैतिकता और ईमानदारी से अर्जित हुआ है या अनैतिक तरीके से. धन से अधिक महत्वपूर्ण उसकी शुद्धता और कमाई का नैतिक मार्ग है. जब तक मनुष्य के भीतर संतुष्टि का भाव नहीं आता, तब तक सच्चे आनंद की अनुभूति संभव नहीं है.