नई दिल्ली, 18 अगस्त (वि.प्र.)
देश में फांसी की माैजूदा व्यवस्था बरकरार रहेगी. यह टिप्पणी मंगलवार काे एक याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम काेर्ट ने की. अदालत ने माैत के लिए जहरीले इंजे्नशन या गाेली मारने जैसे तरीकाें के मांग वाली याचिका खारिज कर दिया. काेर्ट ने कहा-याचिका में अपनी मांग के समर्थन में ठाेस आधार नहीं है. केंद्र सरकार चाहे ताे विशेषज्ञाें की समिति बनाकर इस मुद्दे पर विचार कर सकती है.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि फिलहाल ऐसा काेई आधार नहीं है, जिसके कारण फांसी काे असंवैधानिक घाेषित किया जाए.
याचिका में फांसी काे क्रूर, अमानवीय और दर्दनाम बताया गया था. इसकी जगह जहरीले इंजेक्शन, गाेली मारने जैसे चार वैकल्पिक तरीकाें से माैत की सजा देने की मांग की गई थी. काेर्ट ने यह भी कहा कि याचिका खारिज करने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में संवैधानिक समीक्षा का रास्ता बंद हाे गया है.
अगर ठाेस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभवजन्य सबूत सामने आते हैं, ताे इस मुद्दे की दाेबारा जांच की जा सकती है.
काेर्ट ने कहा- केंद्र सरकार विशेषज्ञाें की समिति बनाकर माैजूदा फांसी की व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कर सकती है. समिति यह जांच सकती है कि क्या काेई वैकल्पिक तरीका अनावश्यक पीड़ा कम करने और दाेषी की गरिमा बनाए रखने में बेहतर है.
वरिष्ठ वकील ऋषि मल्हाेत्रा ने 2017 में यह याचिका दायर की थी. उन्हाेंने बताया था कि फांसी की प्रक्रिया में 40 मिनट से ज्यादा लग सकते हैं, जबकि गाेली मारने में कुछ मिनट और जहरीले इंजेक्शन में करीब 5 मिनट लगने का दावा किया गया. याचिका में सीआरपीसी की धारा 354(5) काे असंवैधानिक घाेषित करने की मांग की गई थी. इसी धारा के तहत माैत की सजा पाए दाेषी काे गर्दन से तब तक लटकाया जाता है, जब तक उसकी माैत न हाे जाए.
याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले जीवन और गरिमा के अधिकार के खिलाफ बताया गया.
मल्हाेत्रा ने यह भी कहा था कि माैत की सजा पाए कैदी काे फांसी और जहरीले इंजेक्शन में से काेई एक तरीका चुनने का विकल्प मिलना चाहिए. 2018 में केंद्र ने माैजूदा व्यवस्था का बचाव किया था.
गृह मंत्रालय ने हलफनामे में कहा था कि फांसी से माैत तेज और आसान हाेती है और इससे कैदी की पीड़ा अनावश्यक रूप से नहीं बढ़ती.