जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए. उनका तीर्थ-प्रवर्तन भगवान महावीर से 250 वर्ष पूर्व हुआ था. सौ वर्ष की आयु में श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को सम्मेद शिखर (पारसनाथ पहाड़ी) पर इन्होंने परिनिर्वाण प्राप्त किया. भगवान महावीर के समय तक उनकी परंपरा अविच्छिन्न थी. भगवान महावीर के माता- पिता भगवान पार्श्वनाथ के शिष्य थे. अहिंसा और सत्य की साधना को समाजव्यापी बनाने का श्रेय भगवान पार्श्व को ही जाता है. भगवान पार्श्व समाज में अहिंसक परंपरा के उन्नयन द्वारा बहुत लोकप्रिय हुए थे. इसकी जानकारी हमें ‘पुरिसा दाणीय’ (पुरुषादानीय) विशेषण के द्वारा मिलती है. भगवान महावीर भगवान पार्श्व के लिए इस विशेषण का सम्मानपूर्वक प्रयोग करते थे. एक बार राजकुमार पार्श्व गंगा के किनारे घूमने निकले. वहां एक तापस पंचाग्नि तप कर रहा था. चारों दिशाओं में अग्नि जल रही थी. ऊपर से सूर्य का प्रचंड ताप आ रहा था. पार्श्व वहां आकर रुके. उन्हें जन्म से अवधिज्ञान (एक प्रकार का अतींद्रिय ज्ञान) प्राप्त था. उस दिव्य ज्ञान से उन्होंने लक्कड़ में जल रहे सर्प-युगल को जान लिया. उन्होंने तापस से कहा, ‘यह क्या? इस जल रहे लक्कड़ में सांप का एक जोड़ा है. वह जलकर भस्म हो जाएगा.’ लक्कड़ को बाहर निकाला गया. सांप का जोड़ा अधजला हो चुका था. उसे देखकर सब आश्चर्यचकित रह गए. राजकुमार पार्श्व ने उन्हें नमस्कार मंत्र सुनाया. वह सर्प -युगल मर कर देव-रूप में उत्पन्न हुआ. बाद में वह सर्प-युगल धरणेंद्र-पद्मावती के नाम से पार्श्वनाथ के परम उपासक बने. प्राचीन काल में अहिंसा को इतना सुसंबद्ध रूप देने का यह पहला उदाहरण है. पार्श्वनाथ का धर्म बिल्कुल सीधासादा था. इसमें उन्होंने चार संयम बताए -
अहिंसा : किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से कष्ट न पहुंचाना या उसकी हत्या न करना.
सत्य : हमेशा सच बोलना और कपट या झूठ का त्याग करना.
अस्तेय : बिना दी गई या बिना अनुमति के किसी की वस्तु न लेना (चोरी न करना)
अपरिग्रह : संसार की वस्तुओं और संपत्ति के प्रति मोह-माया या लालच न रखना.
उन्होंने इन चारों संयम को सामाजिक जीवन के नियमों के साथ जोड़ दिया. इस कारण जो संयम पहले ऋषि-मुनियों के आचरण तक ही सीमित थे, अब वही नियम आम जनों और समाज के बीच व्यवहार में आ गए. पार्श्व मुनि ने एक महत्वपूर्ण कार्य यह किया कि अपने नवीन धर्म के प्रचार के लिए समाज में संघ बनाए. बौद्ध साहित्य का अध्ययन करने से भी इसका पता चलता है कि बुद्ध के समय समाज में जो संघ विद्यमान थे, उन सब में जैन साधु और साध्वियों के संघ सबसे बड़े थे. जैन परंपरा के अनुसार चातुर्धाम धर्म के प्रथम प्रवर्तक भगवान अजितनाथ और अंतिम प्रवर्तक भगवान पार्श्वनाथ हैं. जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर से लेकर तेईसवें तीर्थंकर तक चातुर्याम धर्म का उपदेश चला. - आचार्य महाप्रज्ञ